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वायु प्रदूषण: जरूरी है तालमेल

बीएस संपादकीय /  October 04, 2022

हर वर्ष जाड़े के मौसम में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है। उसे नियंत्रित करने के लिए किए जाने वाले उपायों को संहिताबद्ध करने वाले ग्रेडेड रिस्पॉन्स ऐक्शन प्लान (ग्रेप) में कुछ अहम परिवर्तन किए गए हैं ताकि इसे और अधिक असरदार बनाया जा सके। इनमें सबसे अधिक उल्लेखनीय है हवा के खराब हो जाने के बाद प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाने के बजाय अधिक सक्रियता दिखाते हुए पहले ही उपचारात्मक उपाय अपनाने पर जोर।

ये अग्रिम कदम भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा विकसित अग्रिम चेतावनी प्रणाली तथा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा जताए गए पूर्वानुमानों द्वारा निर्देशित होंगे। इसके अतिरिक्त प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की सीमा का निर्धारण अब हवा में पीएम2.5 या पीएम 10 पर्टिकुलेट मैटर के घनत्व के बजाय एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई सूचकांक के आधार पर किया जाएगा।

एक्यूआई सूचकांक को हवा की गुणवत्ता का अच्छा संकेतक माना जाता है क्योंकि यह उन अधिकांश प्रदूषक तत्त्वों को ध्यान में रखता है जो फेफड़ों के माध्यम से मनुष्य की रक्तवाहिनियों में प्रवेश कर सकते हैं और श्वसन संबंधी तथा अन्य बीमारियों का कारण बन सकते हैं। ग्रेप में एक और बदलाव है एक स्रोत विभाजन प्रणाली की प्रस्तुति जिसके माध्यम से यह निर्धारित करने में मदद मिलेगी कि कब किस प्रदूषक तत्त्व ने प्रदूषण बढ़ाने में कितना योगदान किया।

ऐसा करने से हालात और स्रोत के आधार पर जरूरी कदम उठाए जा सकेंगे। बहरहाल, एनसीआर के आसपास के राज्यों में फसल अवशेष अर्थात पराली जलाने से उठने वाला धुआं अक्टूबर से मध्य नवंबर तक प्रदूषण का स्तर बढ़ाने में बहुत अधिक योगदान करता है। यह अभी भी चिंता का विषय है। आसपास के राज्यों को इस मोर्चे पर कदम उठाने की जरूरत है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि वे इस दिशा में पर्याप्त कदम उठा रहे हैं।

अगर दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो इस वर्ष सितंबर के दूसरे पखवाड़े में अकेले पंजाब में फसल अवशेष जलाने की 192 घटनाएं हो चुकी हैं। इस वर्ष पराली जलाने की घटनाएं और बढ़ सकती हैं क्योंकि देर से हुई बारिश के कारण धान की फसल प्रभावित हुई है। इससे रबी फसल की बोआई के लिए समय और कम हुआ है। जाहिर है ऐसे में खेतों में बचेखुचे अवशेषों को जलाकर खेतों को अगली फसल के लिए जल्दी तैयार करने का प्रयास किया जाएगा। इस मसले से निपटने के लिए सुविचारित और परिणामोन्मुखी रणनीतियां अपनाए जाने की आवश्यकता है।

इन सब बातों के बीच इस वर्ष एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन की संभावना की एक और वजह है। दिल्ली सरकार ने स्थानीय स्तर पर होने वाला प्रदूषण रोकने के लिए 15 बिंदुओं वाली एक योजना की घोषणा की है। उसके ये कदम भी ग्रेप के तहत उठाए जाने वाले कदमों के पूरक के रूप में काम करेंगे।

एक्यूआई की निरंतर निगरानी के लिए ग्रीन वार रूम की स्थापना की गई है ताकि कचरे को जलाने पर रोक लगाने और डीजल संचालित बिजली जनरेटरों पर नियंत्रण कायम करने, निर्माण गतिविधियां रोकने, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों का शहर में प्रवेश रोकने आदि की रणनीतियां बनाई जा सकें या स्कूल बंद करने अथवा घर से काम करने की सलाह जारी करने को लेकर नीति तैयार की जा सके। सरकारी अधिकारियों और स्वयंसेवकों की कई टीम बनाई गई हैं ताकि संभावित प्रदूषकों पर नजर रखी जा सके और उपचारात्मक उपाय अपनाए जा सकें। इससे भी अहम बात यह है कि प्रदूषण के आधिक्य वाले चिह्नित इलाकों में ऐंटी-स्मॉग गनों की सेवा ली जा रही है।

बहरहाल इन तमाम उपायों की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि पड़ोसी राज्य कितना सहयोग करते हैं। अगर इनमें से कोई भी राज्य कमी दिखाता है तो अन्य राज्यों का अच्छा काम विफल हो जाएगा। एनसीआर की वायु गुणवत्ता प्रबंधन के आयुक्त और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को वायु प्रदूषण के खिलाफ समन्वित लड़ाई सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभानी होगी।

 
Keyword: एनसीआर, वायु प्रदूषण, रिस्पॉन्स ऐक्शन प्लान (ग्रेप),
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