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गोवा और मणिपुर में संख्या के लिहाज से स्थिर सरकार

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  March 22, 2022

मणिपुर और गोवा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की निर्णायक जीत से इन दोनों राज्यों की राजनीति में स्थिरता आएगी। स्पष्ट नतीजों का एक असर यह होगा कि छोटे दलों के लिए राजनीतिक मोल-भाव की गुंजाइश कम हो जाएगी। इन दोनों राज्यों में दल-बदल एक बड़ी समस्या रही है। गोवा में भाजपा की स्पष्ट जीत का लाभ मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत को मिला है। पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद सावंत को छह घंटे के भीतर राज्य की कमान सौंपी गई थी। वर्ष 2017 में राज्य विधानसभा की 40 सीटों में भाजपा को महज 13 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस से संख्या बल में कम रहने के बावजूद भाजपा राज्य में सरकार गठन में सफल रही थी। कांग्रेस की सुस्ती और नितिन गडकरी और पर्रिकर की सक्रियता की बदौलत भाजपा सत्ता पर काबिज हो गई। पर्रिकर ने समर्थन के बदले महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी (एमजीपी) के रामकृष्ण 'सुदिन' धवलीकर और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई से कुछ वादे किए थे। पर्रिकर के निधन के बाद एमजीपी और गोवा फॉरवर्ड पार्टी ने सावंत को समर्थन दिया और इसके बदले उन्हें उप-मुख्यमंत्री का पद दिया गया। गोवा में एक समय 12 सदस्यीय मंत्रिमंडल था और दो उप मुख्यमंत्री थे। मगर एक सप्ताह बाद ही कांग्रेस के 10 विधायक भाजपा में शामिल हो गए जिससे पार्टी के कुल विधायकों की संख्या 27 हो गई। सरदेसाई के समर्थन की दरकार समाप्त हो जाने के बाद सावंत ने उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया।

अब सावंत को सरदेसाई की जरूरत पहले से भी कम रह गई है। नतीजे आने के कुछ ही घंटों के भीतर एमजीपी ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर डाली। सरदेसाई की सोच यह रही होगी कि ऐसा कर उनकी पार्टी को राज्य मंत्रिमंडल में एक या दो मंत्री पद मिल जाएंगे। यह थोड़ी हैरानी की बात है क्योंकि चुनाव में अंतिम समय तक एमजीपी भाजपा के विरोधी दलों के साथ चुनाव लड़ रही थी। एमजीपी ने तृणमूल कांग्रेस के साथ राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ा था। बिना शर्त समर्थन दिए जाने के प्रस्ताव का कई भाजपा विधायकों ने जमकर विरोध किया। यह समझना कठिन नहीं है कि उन्होंने विरोध क्यों किया। सरकार में बाहरी लोगों को पद मिलने से भाजपा के खाते में पद कम रह जाएंगे। धवलीकर ने चुनाव नतीजे आने के बाद अपने सुर बदल लिए। उन्होंने कहा, 'हमारी पार्टी और भाजपा स्वाभाविक सहयोगी हैं। जब भाजपा ने राज्य में अपनी शुरुआत की थी उस समय हमने पार्टी के साथ मिलकर काम किया था और अपनी तरफ से पूर्ण सहयोग दिया था। हमारे संबंध काफी पुराने रहे हैं। आज भी नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस और भाजपा के अन्य नेताओं के साथ हमारे अच्छे संबंध रहे हैं।' धवलीकर ने चुनाव में भाजपा की धुर आलोचकों में एक का समर्थन किया था।

मणिपुर में भाजपा ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचा कर जनाधार हासिल किया है। 2017 में राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और उसे 28 सीटें हासिल हुई थीं। मगर बाजी भाजपा के हाथ लगी। नैशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) सहित कुछ 'मित्र दलों' की मदद से भाजपा सरकार बनाने में सफल रही। एनपीपी एक क्षेत्रीय दल है जो पड़ोसी राज्य मेघालय में कोनराड संगमा के नेतृत्व में गठबंधन सरकार चला रही है। भाजपा का जनाधार जैसे बढ़ता गया वैसे ही मणिपुर में कांग्रेस से लोग निकलते रहे। इनमें कांग्रेस की राज्य इकाई के प्रमुख एवं विष्णुपुर से छह बार विधायक रह चुके गोविनदास कोंथूजाम का नाम प्रमुख है। गोविनदास पिछल वर्ष अगस्त में भाजपा में शामिल हो गए थे। मगर सरकार पर अनिश्चितता की तलवार लटकती रही क्योंकि एनपीपी को लगा कि हुकुम का इक्का उसके पास है और वह जब चाहे सरकार का तख्तापलट कर सकती है।

इस बार ऐसा कोई खतरा नहीं है। भाजपा 60 सदस्यीय मणिपुर विधानसभा में 32 सीटें हासिल करने में सफल रही है। एक दूसरी गौर करने लायक बात यह है कि एनपीपी सात सीटें जीतकर दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और कांग्रेस को उसने पीछे छोड़ दिया है। इस उपलब्धि के बाद अब संगमा पूर्वोत्तर की राजनीति में एक बड़ा नाम बन गए हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने मणिपुर में विपक्ष के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। पार्टी ने स्वयं को पूर्वोत्तर में राष्ट्रीय दलों के एक विकल्प के रूप में पेश किया है और इस पूरे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी रखने वाले दल का दावा पेश किया है। अरुणाचल प्रदेश में भी पार्टी की थोड़ी उपस्थिति है। एनपीपी ने विवादित सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) या नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) जैसे विषयों पर अपना रुख स्पष्ट किया है। तो क्या हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि एनपीपी अब और आक्रामक हो जाएगी और केंद्र सरकार का यह अधिक विरोध करना शुरू कर देगी?

फिलहाल तो मेघालय में भाजपा और एनपीपी सहयोगी हैं। हालांकि इसके बावजूद मणिपुर में एनपीपी ने भाजपा के खिलाफ प्रचार किया और भाजपा के बागी उम्मीदवारों को सीटों की भी पेशकश की थी। राज्य में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह एनपीपी को सरकार में शामिल नहीं करना चाहेंगे। यह स्थिति थोड़ी दिलचस्प हो सकती है। एनपीपी सरकार में शामिल नहीं की जाती है तो भाजपा के अधिक प्रतिनिधि सरकार का हिस्सा होंगे मगर एनपीपी शामिल हुई तो सरकार के अंदर ही एक विपक्ष खड़ा हो जाएगा।

इस चुनाव का साफ मतलब है कि छोटे दल भाजपा को अपनी शर्तों पर सरकार चलाने के लिए नहीं कह पाएंगे। मगर इसका एक मतलब यह भी है कि भाजपा विपक्ष की अधिक परवाह नहीं करेगी। गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए भाजपा का रुख खतरनाक हो सकता है।

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