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उत्तर प्रदेश: कोविड संकट में झूठ या डेटा में हेरफेर

ओमकार गोस्वामी /  May 21, 2021

'राज्यों को अपने यहां के आंकड़े पारदर्शी तरीके से बताने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, 15 मई, 2021

भारत का सबसे बड़ा एवं सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश कोविड-19 संक्रमण के पुष्ट मामलों में चौथे स्थान पर है। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, 9 फरवरी से लेकर 17 मई, 2021 के बीच उत्तर प्रदेश में 10 लाख से भी अधिक कोविड संक्रमण मामले दर्ज किए गए। इस अवधि में 9,125 संक्रमितों की मौत होने की भी बात कही गई है।

इन आंकड़ों को देखकर मैं थोड़ा परेशान हो रहा था। दरअसल ये आंकड़े उत्तर प्रदेश के बारे में हमारी पूरी समझ से कशमकश करते नजर आए। इस राज्य के अस्पतालों एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की खराब हालत, इसके निष्क्रिय जिला प्रशासन, राज्य के अधिकतर नागरिक मास्क पहनने की भी जहमत नहीं उठाते हैं, बनारस के श्मशान घाटों पर शव जलाने वाले भी अप्रैल के अंत एवं मई की शुरुआत में बड़ी संख्या में शव आने की बात करते रहे हैं। जलाने के लिए सूखी लकडिय़ां नहीं मिलने पर शवों को गंगा नदी में बहा दिए जाने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। ये सभी बातें उत्तर प्रदेश के सरकारी आंकड़ों को चुनौती देती नजर आती हैं।

इसके बावजूद मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि इन आंकड़ों में आखिर क्या गड़बड़ी है? कोविड19इंडिया डॉट ऑर्ग वेबसाइट पर दर्ज इन आंकड़ों को डाउनलोड नहीं किया जा सकता है, लिहाजा मुझे भारत और सबसे ज्यादा प्रभावित पांच राज्यों- महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, उत्तर प्रदेश एवं तमिलनाडु के आंकड़े एक-एक कर दर्ज करना पड़ा। जब मैंने 9 फरवरी से 17 मई तक के आंकड़ों के आधार पर एक एक्सेल शीट तैयार की तो यूरेका वाला पल सामने आने लगा।

किसी शख्स को आधिकारिक तौर पर तभी कोविड-संक्रमित माना जाता है जब आरटी-पीसीआर या रैपिड ऐंटीजन जांच में इसकी पुष्टि हो चुकी हो। कोविड इलाज से संबंधित दिशानिर्देशों के मुताबिक, इन जांचों के पहले भरे गए सभी फॉर्म समुचित सरकारी एजेंसियों को सौंप दिए जाते हैं। यही बात जांच के नतीजों के बारे में भी लागू होती है। ऐसी स्थिति में किसी भी राज्य सरकार, जिला प्रशासन या नगर निगम को दो तरह महत्त्वपूर्ण आंकड़े रोजाना मिलते हैं.. जांच की संख्या एवं जांच के नतीजे। जांच में संक्रमित पाए गए लोगों को अलग से चिह्नित किया जाता है। इन आंकड़ों से दैनिक जांच संक्रमित अनुपात यानी कुल कोविड जांचों में संक्रमित पाए गए लोगों का अनुपात पता किया जा सकता है।

जांच में संक्रमित पाए जाने का संकेतक पुरजोर ढंग से बताता है कि उत्तर प्रदेश कोविड आंकड़ों में हेराफेरी करती रही है। चलिए, इस पर विस्तार से बात करते हैं।

सबसे पहले, कोई यही उम्मीद करेगा कि महामारी से सर्वाधिक प्रभावित पांच राज्यों में जांच एवं संक्रमण नतीजे मोटे तौर पर एक जैसे होने चाहिए। कोई जरूरी नहीं है कि यह एक ही समय पर हुआ हो क्योंकि महामारी ने हर राज्य में अलग-अलग वक्त पर कोहराम मचाया। लेकिन निश्चित रूप से हरेक कोविड-प्रभावित राज्य में ऐसा हुआ। लेकिन उत्तर प्रदेश के साथ ऐसा नहीं है, सारिणी एवं चार्ट दर्शाते हैं कि यह राज्य बाकियों से एकदम जुदा है। सारिणी एवं चार्ट से पता चलता है कि कोविड महामारी की दूसरी लहर में उत्तर प्रदेश की चरम जांच-संक्रमण दर महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु एवं समग्र तौर पर भारत की तुलना में काफी कम रही है।

यह चार्ट सात दिनों की जांच-संक्रमण दरों के चल औसत (मूविंग एवरेज) को दिखाता है। उत्तर प्रदेश के लिए सात-दिवसीय चल औसत का चरम 16.9 फीसदी रहा जो राष्ट्रीय चरम स्तर 22.8 फीसदी से 5.9 फीसदी अंक कम है। वहीं महाराष्ट्र की तुलना में यह 9.7 फीसदी अंक कम, कर्नाटक की तुलना में 18.2 फीसदी अंक, केरल की तुलना में 11.2 फीसदी अंक और तमिलनाडु की तुलना में 3.7 फीसदी अंक कम है।

सवाल यह खड़ा होता है कि ऐसा होने की वजह क्या है?

इस बारे में मेरा अंदाज यह है कि लखनऊ में बैठे सत्ताधारियों को खुश करने के लिए जिला स्तर के अधिकारियों ने राज्य प्रशासन को आंकड़े सौंपते समय कोविड-संक्रमित पाए गए मामलों की बड़ी संख्या को दरकिनार करना शुरू कर दिया। इस काम को जल्दबाजी में रोज ही किया जाना था, लिहाजा उन्हें इसका पर्याप्त वक्त नहीं मिल पाता था कि इस दौरान की गई जांचों की संख्या को भी उसी अनुपात में कम कर दिया जाए। अगर उन्होंने जांच कम कर भी दी तो फिर यही दिखता कि उत्तर प्रदेश समुचित संख्या में संदिग्धों की जांच भी नहीं कर पा रहा है। जबकि असल में ऐसा नहीं था।

मसलन, उत्तर प्रदेश में 21 अप्रैल को 2,25,570 नमूनों की जांच की गई थी। अगर उनमें से 20 फीसदी या 45,114 लोग कोविड संक्रमित थे तो उनमें से करीब 22,000 मामलों को सरकारी रिकॉर्ड से निकाल ही दिया गया और केवल 33,106 संक्रमण मामले ही दर्ज किए गए। इस तरह उस दिन जांच-संक्रमण दर 14.7 फीसदी ही रही। मुझे लगता है कि उत्तर प्रदेश कोविड संक्रमण मामलों को कम करके दिखाने का काम लगातार करता रहा है। इसके अलावा कोई भी अन्य कारण नहीं है जो उत्तर प्रदेश एवं अन्य प्रभावित राज्यों के बीच जांच-संक्रमण दर में इतने ज्यादा फर्क को बयां कर सके।

महामारी के इस भयावह दौर में भी जब एक राज्य संक्रमितों एवं मृतकों की संख्या के आंकड़े में हेरफेर करता है तो फिर उसकी कही जाने वाली बातों पर भला किस तरह यकीन किया जा सकता है।
( यह लेख 'फाइनैंशियल एक्सप्रेस' के सुनील जैन को समर्पित है जिनका हाल ही में कोविड से देहांत हुआ है। वह मेरे छात्र, दोस्त एवं पसंदीदा पत्रकार थे)

Keyword: उत्तर प्रदेश, कोविड संकट, झूठ, डेटा में हेरफेर, संक्रमण दर, शव,
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