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पर्दे के पीछे से जदयू अध्यक्ष की कुर्सी तक का सफर

आदिति फडणीस /  January 18, 2021

क्या आरसीपी सिंह को कभी अपने दलीय सहयोगी रहे प्रशांत किशोर की विदाई का अनचाहा लाभ मिला है? सियासी हलके में 'आरसीपी' के नाम से मशहूर इन शख्स को पिछले दिनों जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का अध्यक्ष बनाया गया है।

यूं तो भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से इस्तीफा देकर कई लोग राजनीति में आए हैं जिनमें से कई लोग वरिष्ठ मंत्री तक बनाए गए हैं। लेकिन आरसीपी शायद ऐसे पहले पूर्व आईएएस अफसर हैं जो किसी अहम पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंचने में सफल रहे हैं। उनके राजनीतिक उत्थान की एक दिलचस्प कहानी है जो अफसरशाही में करियर बिताने के बाद राजनीति का दामन थामने की मंशा रखने वाले किसी भी शख्स के लिए एक रोल मॉडल बन सकती है।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी आरसीपी ने सेवानिवृत्त होने से पहले ही वर्ष 2010 में नौकरी से इस्तीफा दे दिया था और राजनीति का हिस्सा बन गए थे। लेकिन यह कदम अचानक ही नहीं उठाया गया था। उत्तर प्रदेश के समाजवादी नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने आरसीपी का परिचय नीतीश से कराया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद आईएएस परीक्षा में सफलता हासिल करने वाले आरसीपी एक आम बिहारी के लिए आदर्श शख्स नजर आते थे। नीतीश को वह शायद इसलिए भी पसंद आए कि दोनों कुर्मी बिरादरी से ही आते हैं। इसके अलावा नीतीश की तरह आरसीपी भी नालंदा जिले के मूल निवासी थे। वह सामाजिक रूप से पिछड़े तबके का हिस्सा होते हुए भी खुद को एक ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने में सफल रहे थे।

जब नीतीश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल एवं कृषि मंत्रालय का कामकाज देख रहे थे तो आरसीपी बतौर अफसर उनके साथ जुड़े। लेकिन वर्ष 2005 में नीतीश के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद आरसीपी उनके प्रमुख सचिव के तौर पर तैनात होकर पटना चले गए।

वर्ष 2010 में आईएएस की नौकरी से इस्तीफा देने के बाद नीतीश ने आरसीपी को फौरन ही राज्यसभा भेज दिया। जल्द ही पटना में हर कोई यह जानने लगा कि नीतीश सरकार से कोई भी काम कराने के लिए आरसीपी से ही संपर्क साधना होगा। वहीं दिल्ली में भी वह जदयू की रणनीति एवं रुख तय करने लगे और भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए संपर्क का जरिया बन गए। वर्ष 2016 में राज्यसभा के लिए दूसरी बार चुने जाने के बाद जदयू ने उन्हें पार्टी संसदीय दल का नेता भी बना दिया तो एक तरह से साफ हो गया कि वह पार्टी के भीतर सत्ता की अहम धुरी बन चुके हैं। लेकिन इतने लंबे समय में भी वह कभी किसी संवाददाता को साक्षात्कार या बयान देते हुए नहीं नजर आए हैं। यह उनके चर्चा से दूर रहकर काम करने की शैली को दर्शाता है। साफ है कि वह पर्दे के पीछे रहकर काम करना पसंद करते रहे हैं।

लेकिन पटना में अचानक ही एक करिश्माई व्यक्ति की चर्चा जोर-शोर से होने लगी। उस शख्स का नाम प्रशांत किशोर था। ऐसी स्थिति में आरसीपी और चुनाव प्रबंधन के कुशल रणनीतिकार प्रशांत के बीच तनातनी होनी लाजिमी ही थी। प्रशांत ने 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू को जीत दिलवाने में अहम भूमिका निभाई थी। वैसे उसमें कुछ दूसरे कारकों का भी हाथ रहा था।

सितंबर 2018 में जदयू का प्राथमिक सदस्य बनने वाले प्रशांत को नीतीश ने कुछ हफ्तों में ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया था। तब लोकसभा के चुनाव ज्यादा दूर नहीं थे। सियासी हलके में नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) की भी चर्चा होने लगी थी जो बाद में जदयू के समर्थन से कानून भी बन गया।

प्रशांत किशोर का मानना था कि सीएबी जदयू के वैचारिक एवं चुनावी रुझान के खिलाफ है। उन्होंने अपनी राय खुलकर जाहिर भी कर दी। लेकिन जदयू एवं भाजपा के रिश्ते संभालने वाले आरसीपी को प्रशांत की यह साफगोई पसंद नहीं आई। उन्होंने नागरिकता कानून पर प्रशांत का बयान आते ही कहा, 'ये लोग कौन हैं? सांगठनिक ढांचे में उनका क्या योगदान है? उन्होंने कितने नए सदस्य बनाए हैं?'

जब नीतीश ने इस मसले पर जवाब-तलब किया तो प्रशांत किशोर को पक्ष रखना पड़ा। प्रशांत के ट्वीट ने जाहिर भी कर दिया कि उन्हें पार्टी से बाहर कराने में आरसीपी का ही हाथ रहा है। प्रशांत ने अपने ट्वीट में लिखा था, 'नीतीश कुमार, आपको किस वजह से और क्यों जदयू से मेरे जुड़ाव के बारे में झूठ बोलना पड़ा? मुझे अपने ही रंग में रंगने की आपने खराब कोशिश की है। और अगर आप सच कह रहे हैं तो इस पर कौन यकीन करेगा कि अमित शाह के कहने पर रखे गए शख्स की बात नहीं सुनने का साहस अब भी आपके भीतर है।' उनका इशारा इस ओर था कि आरसीपी अमित शाह के एजेंट हैं। निश्चित रूप से इसमें दम नहीं था लेकिन निशाना तो साधा जा चुका था। ऐसे में प्रशांत किशोर के पास जदयू से अलग होने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया था। वहीं आरसीपी लगातार पार्टी के भीतर मजबूत होते चले गए।

सवाल है कि अब आगे क्या होने वाला है? आरसीपी सिंह जदयू के नए अध्यक्ष बन चुके हैं। इसके क्या मायने हो सकते हैं? इसकी संभावना कम ही है कि वह महज बिचौलिया होने से कुछ अधिक की भूमिका में नजर आएंगे। फिर भी इसकी संभावना जरूर है कि आरसीपी के पार्टी अध्यक्ष रहते समय जदयू फिर से एक नए सियासी सफर पर निकलना चाहेगी। लेकिन निश्चित रूप से यह आरसीपी और जदयू दोनों के ही लिए एक नई शुरुआत है।

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