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लोकतंत्र बनाम आर्थिक सुधारों पर जारी चर्चा

के पी कृष्णन /  January 11, 2021

भारत में हाल के हफ्तों में लोकतंत्र एवं सख्त आर्थिक सुधारों के बारे में एक बड़ी बहस ने जन्म लिया है। वित्त के क्षेत्र में सुधारों का मुख्य मार्ग लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने से संबद्ध है। दुनिया की दूसरी जगहों, सुधारों के मामले में भारत के शुरुआती अनुभव और वित्तीय आर्थिक नीति के भावी सफर के बारे में भी ऐसा ही देखा गया है। लोकतंत्र का सार यानी सत्ता का प्रसार एवं कानून का शासन बाजार अर्थव्यवस्था के फलने-फूलने के लिए अनुकूल हालात पैदा करते हैं और इसमें वित्त केंद्रीय अहमियत रखता है।

नीति आयोग के मुख्य कार्याधिकारी अमिताभ कांत ने कथित तौर पर कहा है कि 'सख्त' सुधार कर पाना भारतीय संदर्भ में काफी मुश्किल है क्योंकि 'हमारे यहां कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र है' लेकिन सरकार ने खनन, श्रम एवं कृषि जैसे क्षेत्रों में ऐसे सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए 'साहस' एवं 'संकल्प' दिखाया है। इस बयान ने एक तूफान खड़ा कर दिया और तमाम आलोचक भारतीय लोकतंत्र के बचाव में आ खड़े हुए जिसके बाद अमिताभ कांत को 'द इंडियन एक्सप्रेस' में लेख लिखकर यह सफाई देनी पड़ी कि उन्हें गलत समझा गया है।

चुनावों के माध्यम से सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की अवधारणा हमारे दिमाग में गहरी जमी हुई है लेकिन लोकतंत्र निर्वाचित शासक का फैसला करने वाले चुनाव से कहीं अधिक होता है। लोकतंत्र का सार सत्ता के फैलाव, राज्य की सत्ता के मनमाने इस्तेमाल के नियंत्रण और विधि के शासन की राह में राज्य सत्ता को समाहित करने में है। विधि के शासन के तहत निजी व्यक्ति एवं आर्थिक एजेंट इस पर सुरक्षित महसूस करते हैं कि राज्य की बाध्यकारी सत्ता को अप्रत्याशित, नियम-आधारित तरीके एवं निष्पक्ष ढंग से लागू किया जाएगा। इससे निर्माण फर्मों के निर्माण एवं व्यक्तिगत संपत्ति के सृजन में निवेश को बढ़ावा मिलता है। इस तरह लोकतंत्र के अभ्युदय और दशकों की मेहनत से अपनी फर्म खड़ा करने एवं अपनी संपत्ति को देश के भीतर ही बनाए रखने के लिए निजी क्षेत्र के प्रोत्साहन के बीच काफी गहरा संबंध है।

बाजार अर्थव्यवस्था के सार यानी वित्त में ये अवधारणाएं पूरी शिद्दत से लागू होती हैं। हरेक वित्तीय प्रणाली में वित्तीय नियमन भी शामिल होता है। जब राज्य एवं नियामकीय शक्ति पर कोई अंकुश नहीं होता है तो नियामक अपने विवेक से निशाना तय करने लगते हैं। ऐसे हालात में निजी व्यक्ति पावर गेम में निवेश करने लगते हैं और वे राज्य सत्ता के इस्तेमाल को प्रभावित करने में जुट जाते हैं। निजी व्यक्तियों का ध्यान मुख्यत: राजनीतिक नियामकीय एवं अफसरशाही परिवेश को अपने अनुकूल ढालने पर लगा होता है जबकि अपने उपभोक्ताओं को समझने और संगठन चलाने के लिए कारगर तरीकों एवं तकनीक पर उनकी तवज्जो कम होती है।

इन वजहों से लोकतंत्र को मजबूत बनाने एवं बेहतर ढंग से संचालित एक वित्तीय प्रणाली के निर्माण के बीच मजबूत संबंध होता है। एक साझा कानूनी ढांचे में विधि-निर्माता या नियामक अधिक सिद्धांत-आधारित तरीके से काम करते हैं और राज्य उत्पादों या प्रक्रियाओं का ब्योरा नहीं तय करता है, राज्य विजेताओं को नहीं चुनता है, निजी व्यक्तियों का सूक्ष्म-प्रबंधन नदारद होता है एवं न्यायाधीशों को एक अनूठी स्थिति की परिकल्पना कर उसके अनुरूप कानून की व्याख्या करने की बड़ी भूमिका दी जाती है। ब्रॉउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राफेल ला पोर्टा एवं अन्य ने 1998 में 'जर्नल ऑफ पॉलिटिकल इकॉनमी' में प्रकाशित अपने शोधपत्र में एक ऐसा विचार पेश किया था जिसके मुताबिक समान कानून ढांचा वित्तीय क्षेत्र के विकास के लिए बेहतर ढंग से काम करता है। हाल में प्रकाशित एक लेख में लोकतंत्र का उच्च स्तर हासिल करने वाले देश से जुड़ी घटनाओं पर गौर करने के बाद यह पाया गया है कि लोकतंत्र का बढ़ा हुआ रूप संवद्र्धित वित्तीय विकास के लिए अच्छा रहा है। पीकिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर यिपिंग हुआंग के 2010 में 'वल्र्ड डेवलपमेंट' और डब्ल्यू गार्डेलू के 2016 में 'जर्नल ऑफ फाइनैंशियल इकनॉमिक पॉलिसी' में प्रकाशित शोध-पत्रों में इस संकल्पना की पुष्टि की गई। इस तरह अब हमें मालूम है कि अधिक लोकतंत्र वित्तीय विकास के नजरिये से अच्छा है।

वित्तीय क्षेत्र में विधायी सुधार के लिए आयोग एफएसएलआरसी का गठन 24 मार्च, 2011 को वित्त मंत्रालय ने किया था। भारतीय वित्तीय क्षेत्र के कानूनी एवं संस्थागत ढांचे की समीक्षा एवं उसे नए सिरे से लिखने के लिए यह आयोग बनाया गया था। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्रीकृष्णा इस आयोग के प्रमुख बनाए गए थे और वित्त, अर्थशास्त्र, लोक प्रशासन एवं कानून से जुड़े जानकार इसके सदस्य बनाए गए थे। सचिव के अलावा इस आयोग के बाकी सारे सदस्य अकादमिक एवं शोध क्षेत्र और बाजार से जुड़े लोग थे। एफएसएलआरसी ने भारत के संविधान एवं भारतीय लोकतंत्र के भीतर वित्तीय नीति के प्रारूपों को चिह्नित किया। इसने कहा था कि एक लोकतंत्र में कानून का खाका तैयार करते समय निश्चित तौर पर सभी परिप्रेक्ष्यों को सुने जाने का मौका दिया जाना चाहिए।

यह रिपोर्ट एवं प्रारूप कानून सीधे तौर पर लोकतंत्र को सक्षम वित्तीय क्षेत्र के उद्देश्य की पूर्ति के लायक बनाने की बात करता है। आयोग की बुनियादी संकल्पना यह है कि 'एक उदार लोकतंत्र में 'शक्तियों का पृथक्करण' सिद्धांत विधायी, कार्यकारी एवं न्यायिक गतिविधियों के बीच अलगाव को प्रोत्साहित करता है। वित्तीय नियामक इस मामले में अनूठे हैं कि ये तीनों तरह के काम एक ही एजेंसी संचालित करने लगती है। सत्ता का यह संकेंद्रण उत्तरदायित्व की मजबूत व्यवस्था के जरिये खत्म किए जाने की जरूरत है।'

नियामकों की स्वतंत्रतता के पक्ष में भी मजबूत तर्क दिए जाते हैं। स्वतंत्र नियामक कहीं अधिक कानूनी निश्चितता लेकर आएंगे। आयोग ने सुझाव दिया था कि नियामक की स्वतंत्रता की तलाश काम के दो पहलुओं को ध्यान में रखने पर खत्म होगी। एक तरफ स्वतंत्रतता को कानून में निहित किए जाने की जरूरत है और कानून में पूरे विस्तार से प्रक्रिया को तय कर ऐसा किया जाता है। दूसरी तरफ, आयोग ने एक प्रशासकीय राज्य से जुड़े खतरों और कानून का मसौदा बनाने एवं न्यायिक आदेश लिखने वाले अफसरों के बारे में कोई नियम न होने की तरफ भी ध्यान आकृष्ट किया था। लिहाजा स्वतंत्रता के साथ ही जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था की भी जरूरत है।

आयोग ने जवाबदेही तय करने के पांच तरीके सुझाए थे। नियामक के लिए निर्धारित प्रक्रिया का उल्लेख प्रस्तावित भारतीय वित्तीय संहिता (आईएफसी) में काफी विस्तार से लिखित रूप में किया जाना चाहिए। नियम-निर्माण की प्रक्रिया को आईएफसी के मसौदे में काफी विस्तार से दर्ज किया गया था। इसमें नियंत्रण एवं संतुलन प्रावधानों का भी उल्लेख है। अनिर्वाचित अधिकारियों को कानूनी मसौदा तैयार करने की शक्ति दिए जाने से एक अलग तरह का खतरा भी है। पर्यवेक्षण की व्यवस्थाएं विधि के शासन पर काफी तवज्जो की उपज रही हैं। इसके लिए रिपोर्ट दाखिल करने की सशक्त प्रणाली भी सुझाई गई थीं। आखिर में, नियामकों के सभी कार्यों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से गुजरने की व्यवस्था के तौर पर एक विशेष न्यायाधिकरण बनाने की बात कही गई और इस दौरान न्यायाधीश के तौर पर सिर्फ सेवानिवृत्त अफसरशाहों के ही काम करने की समस्या पर खास गौर किया गया।

(लेखक भारत सरकार के पूर्व सचिव एवं एनसीएईआर में प्राध्यापक हैं)

Keyword: लोकतंत्र, आर्थिक सुधार, वित्तीय प्रणाली, न्यायाधीश, एफएसएलआरसी,
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