किसी बड़ी ताकत के दबाव के बिना वैश्विक मंच पर अपनी नीतियां खुद तय करने की रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि भारत अपनी सैन्य शक्ति, घरेलू रक्षा उद्योग और तकनीकी आत्मनिर्भरता की स्थिति को मजबूत करे। बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित बिज़नेस स्टैंडर्ड मंथन कार्यक्रम में रक्षा क्षेत्र से जुड़े तीन विशेषज्ञों के पैनल ने ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ विषय पर चर्चा के दौरान इस बात पर सहमति जताई जिनमें मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान के महानिदेशक सुजन चिनॉय, दिल्ली पॉलिसी ग्रुप में विशिष्ट फेलो लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) दीपेंद्र सिंह हुड्डा और भारत फोर्ज की रक्षा इकाई कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड के अध्यक्ष राजिंदर सिंह भाटिया है।
हार्ड पावर यानी सैन्य शक्ति से जुड़े एक सवाल पर सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि यदि भारत भविष्य में विश्व की प्रमुख शक्तियों में से एक बनना चाहता है और रणनीतिक स्वायत्तता स्थापित करना चाहता है तो उसे अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करना होगा और यह बेहद जरूरी है। हुड्डा ने यह भी कहा कि आर्थिक ताकत महत्वपूर्ण है लेकिन केवल मजबूत अर्थव्यवस्था होना पर्याप्त नहीं है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जर्मनी और जापान जैसे आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश भी महान शक्तियों के रूप में नहीं माने जाते क्योंकि उनके पास पर्याप्त सैन्य क्षमता नहीं है और वे अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका या उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) पर निर्भर हैं।
उन्होंने यह भी जोर दिया कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आकलन के अनुसार भारतीय सशस्त्र बल दुनिया में सैन्य क्षमता के मामले में लगातार तीसरी या चौथी सबसे मजबूत सेना मानी जाती है। उन्होंने कहा कि देश के पास परमाणु हथियार होना इसकी रणनीतिक स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के दबाव से सुरक्षा मुहैया कराता है। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि सैन्य शक्ति हमेशा एक सापेक्ष अवधारणा है।
हुड्डा ने कहा, ‘हम यह नहीं कह सकते कि हमारे पास इतनी बंदूकें, टैंक, विमान और जहाज हैं इसलिए हम एक मजबूत शक्ति हैं। सैन्य शक्ति हमेशा आपके प्रतिद्वंद्वी के मुकाबले आंकी जाती है।’
उन्होंने आगे कहा कि भारत का संभावित प्रतिद्वंद्वी चीन है जो आर्थिक, तकनीकी और सैन्य रूप से एक मजबूत देश है ऐसे में जब भारत अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने की बात करता है तब उसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि सैन्य ताकत के मामले में भारत और चीन के बीच का अंतर बहुत ज्यादा न बढ़े। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उन्होंने मजबूत रक्षा औद्योगिक आधार तैयार करने, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने और खरीद प्रक्रियाओं के साथ-साथ निर्णय लेने में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, ‘हम दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े आयातक हैं और हम इस तरह आगे नहीं बढ़ सकते। हमें एक अधिक संतुलित व्यवस्था की जरूरत है जिसमें रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां, रणनीतिक प्रणालियों पर ध्यान दें जबकि निजी उद्योग सेना की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करे।’
राजिंदर सिंह भाटिया ने देश में अत्याधुनिक तकनीकों खासतौर महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इसकी बड़ी कमी का जिक्र करते हुए इस चुनौती को तीन हिस्सों में बांटा मसलन अनुसंधान एवं विकास (आरऐंडडी), नवाचार और क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली तकनीकें। उन्होंने कहा, ‘आरऐंडडी अब भी सरकार का कार्यक्षेत्र है और नवाचार क्रमिक स्तर पर होता है। हमें क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली तकनीकों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है ताकि हम कम से कम समय में आगे बढ़ सकें।’
भाटिया ने बताया कि केवल बेंगलूरु में ही लगभग 16,000 स्टार्टअप हैं जिसकी घनत्व दर इजरायल से भी अधिक है, जिसे अक्सर ‘स्टार्ट-अप नेशन’ कहा जाता है। उन्होंने कहा कि देश में प्रतिभा, उद्यमियों और नवाचार करने वालों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने आगे कहा, ‘हमें सिर्फ एक छोटे से प्रोत्साहन की जरूरत है जिसे हम सही माहौल या सही तंत्र तैयार करना कहते हैं।’
भाटिया ने कहा कि भारत को आर्थिक मजबूती और तकनीकी आत्मनिर्भरता दोनों की जरूरत है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2047 तक भारतीय अर्थव्यवस्था के लगभग 30 से 40 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचने की संभावना है जो इस दिशा में एक बड़ा सहायक कारक होगा। उन्होंने कहा, ‘भारत रक्षा क्षेत्र में करीब 80 अरब डॉलर खर्च करता है जो वैश्विक रक्षा खर्च का लगभग 3.5 से 4 प्रतिशत है। अगर हम इसी गति से आगे बढ़ते रहे तब वर्ष 2047 तक यह हिस्सा बढ़कर वैश्विक रक्षा खर्च का 10 से 16 प्रतिशत हो सकता है। इसका मतलब है कि जिस सैन्य-औद्योगिक ढांचे की हम आज बात कर रहे हैं, उसे मौजूदा आकार से सात से आठ गुना बड़ा करना होगा।’
भाटिया ने जोर देकर कहा कि मौजूदा ‘बहु-संकट’ के दौर से बाहर निकलने के लिए ‘पूरे राष्ट्र की संयुक्त भागीदारी’ वाला दृष्टिकोण अपनाना होगा और सभी अलग-अलग विभागों व क्षेत्रों के बीच की दीवारें तोड़नी होंगी।
पूर्व राजदूत सुजन चिनॉय ने कहा कि कोई भी सॉफ्ट पावर (राजनीतिक या सांस्कृतिक ताकत) वास्तव में हार्ड पावर (सैन्य ताकत) की जगह नहीं ले सकती। उन्होंने कहा, ‘आरऐंडडी पर अपना पैसा खर्च करने का कोई विकल्प नहीं है क्योंकि तकनीक सस्ती नहीं होती और इसके लिए लोग आपसे भारी कीमत वसूलते हैं।’
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि तकनीक का प्रकार और इसे किस चरण में खरीदा जा रहा है, ये दोनों ही बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं। एक बार तकनीक हासिल हो जाए तब इसका इस्तेमाल आगे के विकास के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर चिनॉय ने फ्रांस सहित विदेशी साझेदारों से अत्याधुनिक सैन्य एयरो इंजन तकनीक हासिल करने के प्रयासों का जिक्र किया। इस तकनीक को बाद में छोटे या बड़े विमान में लागू किया जा सकता है।
चिनॉय ने कहा, ‘असल बात यह है कि जब तक युद्ध के दौरान आपके पास विकल्प की स्वतंत्रता नहीं है तब तक कोई भी रणनीतिक स्वायत्तता सार्थक नहीं है।’ उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को उस समय गोला-बारूद की कमी के कारण दक्षिण अफ्रीका से तोप के गोले मंगाने पड़े थे। उन्होंने निजी क्षेत्र से निवेश बढ़ाने की अपील करते हुए कहा कि सरकार को भी ‘राष्ट्रीय चैंपियन’ तैयार करने होंगे।