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भारत की डेयरी क्रांति के अनसुने नायक: नानासाहेब चितले

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दूध पाउच से लेकर डिजिटल डेयरी तक, नानासाहेब चितले ने किसानों और डेयरी उद्योग को आधुनिक बनाने में निभाई अहम भूमिका

Last Updated- June 01, 2026 | 5:21 PM IST
Chitale Dairy

दूध भारत में सिर्फ पोषण का साधन नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों में से एक है। इससे लाखों परिवारों को रोजगार मिलता है और उनकी आजीविका चलती है। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। लेकिन यह सफलता एक दिन में नहीं मिली। इसके पीछे कई दशकों की सरकारी नीतियां, सहकारी आंदोलन, वैज्ञानिक प्रगति, किसानों की भागीदारी और कई लोगों की मेहनत रही है। इन्हीं लोगों में एक नाम है परशुराम भास्कर चितले, जिन्हें लोग नानासाहेब चितले के नाम से जानते हैं।

चितले डेयरी की शुरुआत

चितले डेयरी की शुरुआत साल 1939 में हुई थी। भास्कर गणेश चितले (बी. जी. चितले) ने महाराष्ट्र के सांगली जिले के भिलवडी में डेयरी कारोबार शुरू किया। आजादी से पहले के दौर में भिलवडी से दूध और डेयरी उत्पाद आसपास के शहरों और मुंबई जैसे बड़े बाजारों में भेजे जाते थे।

डेयरी कारोबार को आधुनिक बनाने की कोशिश

करीब 10 साल बाद नानासाहेब चितले परिवार के इस कारोबार से जुड़े। उन्होंने देखा कि भारत का डेयरी क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। दूध की खरीद बिखरी हुई थी, प्रोसेसिंग के तरीके पुराने थे और गांवों तक पशु चिकित्सा व वैज्ञानिक सुविधाएं पर्याप्त नहीं पहुंच पा रही थीं। इन समस्याओं को समझते हुए नानासाहेब ने डेयरी क्षेत्र की औपचारिक पढ़ाई करने का फैसला किया। साल 1959 में उन्होंने बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) से डेयरी और पशुपालन में डिप्लोमा हासिल किया।

उस समय भारत का डेयरी क्षेत्र काफी हद तक असंगठित था और वैज्ञानिक डेयरी शिक्षा भी बहुत कम लोगों को मिलती थी। इस प्रशिक्षण से उन्हें दूध प्रसंस्करण, पशुधन विकास और डेयरी प्रबंधन की आधुनिक जानकारी मिली। पढ़ाई पूरी करने के बाद नानासाहेब अपने भाई काकासाहेब चितले के साथ भिलवडी लौटे और डेयरी कारोबार में आधुनिक तकनीकों और बेहतर प्रबंधन को अपनाना शुरू किया। इससे चितले डेयरी के विकास की नई नींव पड़ी।

Nanasaheb Chitale
नानासाहेब चितले मानद अध्यक्ष, चितले समूह

ग्रामीण पशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की पहल

1960 के दशक में भारत के ग्रामीण इलाकों में पशु चिकित्सा सेवाएं काफी सीमित थीं। किसानों की समस्याओं को समझते हुए नानासाहेब चितले ने पशु स्वास्थ्य से जुड़ी विशेष ट्रेनिंग हासिल की और गांव-गांव जाकर वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन को बढ़ावा दिया। उन्होंने किसानों को पशुओं की देखभाल, प्रसव प्रबंधन और आधुनिक डेयरी तकनीकों की जानकारी दी। साथ ही ग्रामीण युवाओं को पशु चिकित्सा शिक्षा लेने के लिए प्रेरित किया, जिससे डेयरी क्षेत्र के लिए बेहतर सहायता व्यवस्था तैयार हो सकी।

दूध उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय में सुधार के लिए गुजरात से मेहसाणा और मुर्रा भैंसों के साथ-साथ जर्सी और होल्स्टीन नस्ल की गायों को लाने की पहल की गई। हालांकि, नानासाहेब ने जल्द ही समझ लिया कि केवल दूध उत्पादन बढ़ाने से डेयरी क्षेत्र में बड़ा बदलाव नहीं आएगा। इसके लिए प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, परिवहन और वितरण व्यवस्था को भी आधुनिक बनाना जरूरी था।

विदेशों से सीखी आधुनिक तकनीक

1970 के शुरुआती वर्षों में भारत का डेयरी बाजार काफी हद तक असंगठित था। आधुनिक तकनीकों को समझने के लिए नानासाहेब ने फ्रांस, इटली, स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम का दौरा किया। वहां उन्होंने डेयरी उद्योग की नई तकनीकों और प्रबंधन प्रणालियों का अध्ययन किया। इन यात्राओं से मिली सीख के आधार पर चितले डेयरी में कई बड़े बदलाव किए गए।

भारत में दूध पाउच की शुरुआत

साल 1974 में चितले डेयरी ने फ्रांस की प्रीपैक मशीन की मदद से पॉलीथीन दूध पाउच पैकेजिंग शुरू की। व्यावसायिक स्तर पर दूध के पाउच बेचने वाली यह भारत की पहली डेयरी बनी। इससे पारंपरिक वितरण व्यवस्था पर निर्भरता कम हुई और पैकेज्ड दूध का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। इसके अलावा डेयरी ने क्रेट आधारित वितरण प्रणाली, इंसुलेटेड वाहनों और गाय-भैंसों के लिए मशीनों से दूध निकालने की तकनीक भी शुरू की। नानासाहेब ने पशुओं के बेहतर प्रजनन के लिए संगठित कृत्रिम गर्भाधान (आर्टिफिशियल इन्सेमिनेशन) सेवाओं की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिली।

नवाचार बना विकास की ताकत

साल 1984 में चितले डेयरी ने अपने कामकाज में कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया। उस समय कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में कंप्यूटर का उपयोग बहुत कम होता था। इस पहल के बाद किसानों को दूध भुगतान की कंप्यूटरीकृत रसीदें मिलने लगीं, जिससे लेनदेन में पारदर्शिता बढ़ी और किसानों का भरोसा मजबूत हुआ। बाद के वर्षों में डेयरी ने आरएफआईडी आधारित पशु स्वास्थ्य निगरानी, ग्रामीण पशु स्वास्थ्य नेटवर्क, कौशल विकास कार्यक्रम और आधुनिक डेयरी प्रबंधन जैसी कई नई पहलें शुरू कीं।

किसानों के लिए विशेष कार्यक्रम

किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने के लिए ‘उदय’, ‘किरण’ और ‘भास्कर’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए। इन कार्यक्रमों के तहत पशु शेड प्रबंधन, साइलेंज तैयार करना, मशीनों से दूध निकालना और बेहतर प्रजनन तकनीकों की जानकारी दी जाती थी।

नई तकनीक से बढ़ी उत्पादकता

चितले डेयरी ने एबीएस ग्लोबल और जीनस पीएलसी जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी की, जिससे पशुओं की नस्ल सुधारने और दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिली। कंपनी ने जीनस और एबीएस के साथ मिलकर भारत में सेक्सेल (Sexcel) तकनीक पेश की। इस तकनीक की मदद से किसानों को अधिक संख्या में मादा बछड़े मिलने की संभावना बढ़ती है, जिससे डेयरी व्यवसाय की उत्पादकता और स्थिरता में सुधार होता है।

आज चितले जीनस एबीएस इंडिया हर साल लगभग 50 लाख सीमेन स्ट्रॉ का उत्पादन करती है और आधुनिक तकनीक के जरिए देशभर के डेयरी किसानों तक पहुंचाती है।

डेयरी क्षेत्र के आधुनिकीकरण में अहम योगदान

समय के साथ चितले डेयरी भारत के डेयरी क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों को अपनाने वाली प्रमुख निजी कंपनियों में शामिल हो गई। कंपनी ने कई ऐसे कदम उठाए, जिन्होंने बाद में पूरे डेयरी उद्योग को नई दिशा दी। व्यावसायिक स्तर पर दूध के पाउच की शुरुआत, संगठित क्रेट आधारित वितरण व्यवस्था, मशीनों से दूध निकालने की तकनीक, कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं और डेयरी संचालन में शुरुआती कंप्यूटरीकरण जैसे कई नवाचारों को चितले डेयरी ने अपनाया।

इन पहलों से यह स्पष्ट हुआ कि डेयरी कारोबार केवल दूध खरीदने और बेचने तक सीमित नहीं है। यह किसानों के विकास, पशुओं की उत्पादकता, मजबूत सप्लाई चेन और नई तकनीकों के बेहतर उपयोग से जुड़ा एक व्यापक तंत्र है। इन सभी प्रयासों के पीछे एक ही सोच थी- दूध उत्पादन बढ़ाना, किसानों की आय में सुधार करना और अनावश्यक लागत को कम करना।

गांव से वैश्विक पहचान तक का सफर

एक छोटे से गांव में शुरू हुई डेयरी आज भारत के प्रमुख निजी डेयरी नेटवर्क में बदल चुकी है। चितले डेयरी का नाम डेयरी नवाचार, किसानों के साथ मजबूत जुड़ाव और मूल्यवर्धित डेयरी उत्पादों के लिए जाना जाता है। आज कंपनी का नेटवर्क 1 लाख से अधिक किसानों से जुड़ा हुआ है और प्रतिदिन लाखों लीटर दूध का प्रसंस्करण करता है।

कंपनी गाय का दूध, फुल क्रीम दूध, फ्लेवर्ड मिल्क, घी, चीज, पनीर, छाछ, लस्सी और कई अन्य डेयरी उत्पाद बनाती है। इसके अलावा इंस्टेंट मिक्स, घी, अल्फांसो आम का पल्प, स्किम्ड मिल्क पाउडर और अन्य खाद्य उत्पादों का निर्यात भी कई देशों में किया जाता है। चितले डेयरी को दुनिया में सबसे अधिक श्रीखंड बनाने वाली कंपनी के रूप में भी जाना जाता है।

दूरदर्शी नेतृत्व की मिसाल

92 वर्ष की आयु में भी नानासाहेब चितले चितले समूह के चेयरमैन एमेरिटस के रूप में जुड़े हुए हैं और कंपनी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं। उनका जीवन भारतीय डेयरी उद्योग के उस बदलाव का साक्षी रहा है, जिसमें पारंपरिक दूध संग्रह और प्रसंस्करण व्यवस्था से आगे बढ़कर वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन, संगठित सप्लाई चेन और मूल्यवर्धित उत्पादों का विकास हुआ।

आज जब भारत का डेयरी क्षेत्र उत्पादकता बढ़ाने, नई तकनीक अपनाने, निर्यात बढ़ाने और टिकाऊ विकास पर जोर दे रहा है, तब नानासाहेब चितले का अनुभव यह दिखाता है कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव संस्थागत विकास, नवाचार, किसानों की भागीदारी और गांवों में लगातार निवेश के जरिए ही संभव है।

(डिस्क्लेमर: इस कंटेंट के निर्माण, रिपोर्टिंग, संपादन या प्रकाशन में बिजनेस स्टैंडर्ड के किसी भी पत्रकार की कोई भूमिका नहीं रही है।)

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First Published - June 1, 2026 | 5:21 PM IST

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