हम उस वर्ष के अंतिम सप्ताह में हैं जिसे आजादी के बाद का सबसे बुरा वर्ष माना जाना चाहिए। इसकी वजह केवल कोविड-19 महामारी नहीं है। अगर कोई अन्य वर्ष इसके आसपास ठहरता है तो वह है सन 1975। उस वक्त दो वर्ष तक राजनीतिक अशांति का माहौल रहा जिसके बाद अधिनायकवादी शासन लागू हुआ और संविधान को लगभग निलंबित कर दिया गया। देश को उस झटके से उबरने में 21 महीने लगे। आर्थिक दु:स्वप्नों की बात करें तो सबसे बुरा वर्ष 1991 नहीं बल्कि सन 1960 के दशक के मध्य में आया था जब सन 1965 में न केवल पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ बल्कि दोहरे सूखे ने देश की हालत खराब कर दी। हमारी मुद्रा का अधिमूल्यन हुआ और हमें अनाज के लिए अमेरिका से गुजारिश करनी पड़ी थी। इसके बाद वाले दशक यानी सन 1970 के दशक में हमारी प्रति व्यक्ति आय में ठहराव आ गया था। सन 1960 के दशक के खाद्यान्न संकट ने हरित क्रांति को जन्म दिया और सन 1970 के दशक के ठहराव ने आर्थिक सुधारों को लेकर आकांक्षा उत्पन्न की। भले ही सन 2020 के कष्ट अपेक्षाकृत अस्थायी साबित हों लेकिन यह सोचकर आश्चर्य होता है कि क्या इस साल में कुछ बेहतर भी हो सकता है?
जहां तक एक साथ कई संकटों से निपटने की बात है तो हमारा देश आधी सदी पहले की तुलना में आज संकट से निपटने के लिए बेहतर तैयार है। देश के सामने मौजूद चुनौतियों की बात करें तो वे केवल लॉकडाउन के कारण हुई दिक्कतों या बड़े पैमाने पर लोगों की जान लेने वाले घातक वायरस से निपटने के क्रम में लगने वाले टीके तक सीमित नहीं हैं। आर्थिक नुकसान की भरपाई तो अगले कुछ वर्षों में की जा सकती है। चार दशकों में पहली बार अर्थव्यवस्था में इतनी गिरावट दर्ज की गई है, इतने बड़े पैमाने पर रोजगार गए हैं, सरकारी वित्त पर इतना दबाव बना है और सरकारी कर्ज इस कदर बढ़ा है।
परंतु यह वर्ष केवल कोविड की वजह से खराब नहीं गया। बल्कि कोविड के कारण नए नागरिकता कानून के खिलाफ निरंतर चला आ रहा विरोध प्रदर्शन रुक गया। यह प्रदर्शन ऐसे लोग कर रहे थे जिन्हें डर है कि उनकी नागरिकता छिन जाएगी। वर्ष समाप्त होने को है और उत्तर भारत के किसानों ने राजधानी को घेर रखा है। वे नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इस बीच दिल्ली में विभाजन के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर दंगे हुए (सन 1984 में दंगे नहीं सामूहिक हत्याएं हुई थीं)। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे बेहद खामोशी से लेकिन उतने ही परेशान करने वाले नतीजे पेश कर रहा है। सर्वे से उठ रहे सवाल का तत्काल जवाब तलाशना आवश्यक है। सवाल है कि आखिर आर्थिक वृद्धि से किसे लाभ हो रहा है?
लद्दाख सीमा पर हमारी काफी जमीन चीन के नियंत्रण में चली गई है। नतीजतन हजारों सैनिकों को 15,000 फुट की ऊंचाई पर जमा देने वाली ठंड में निगरानी करनी पड़ रही है। हमारी क्रिकेट टीम को भी अपने टेस्ट इतिहास की न्यूनतम रन संख्या पर आउट होने की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। विधान की उदारता और उससे मिलने वाली व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी की कद्र करने वाले किसी भी व्यक्ति के दिमाग में क्रिकेट से इतर भी चीजें चल रही होंगी। संसद अनुपस्थित है और इस बीच नागरिक स्वतंत्रता का लगातार क्षय हो रहा है। राज्यों और केंद्र के स्तर पर मनमाने कदम उठाए जा रहे हैं और प्रक्रियाओं के जरिये पक्षपाती निर्णय लिए जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने गत वर्ष रामजन्मभूमि मामले में जो निर्णय दिया और इस वर्ष बाबरी मस्जिद ढहाने के षडयंत्र के आरोपियों को जिस प्रकार ‘निर्दोष’ करार दिया गया उसमें निहित संदेश भी यही कहता है।
देश सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करने जा रहा है और इस दौरान एक बात स्पष्ट है: व्यवस्था की सहज वृत्ति, उसके संसाधनों और भंडारों को कड़े दबाव से गुजरना होगा। सरकार की दलील है कि वह मुद्दों से सक्रियता से निपटी है और संकट के दरमियान उसने गंभीर सुधार किए हैं। परंतु कर्नाटक के कारखाने में वेतन न मिलने के कारण कर्मचारियों द्वारा की गई हिंसा हर किसी को यह याद दिलाती है कि पूंजीवाद तभी बेहतर काम करता है जब उसका प्रभावी नियमन और निगरानी हो। इस बीच प्रदर्शनकारी किसानों का समझौता न करने का रुख सन 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की याद दिलाता है। किसानों को आशंका है कि नए कानूनों से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। असल समस्या है शासकों और शासितों के बीच भरोसे की कमी। अब वक्त आ गया है कि तीन दशकों की सबसे मजबूत सरकार खुद को अपने वादे याद दिलाए: अच्छे दिन, अच्छा शासन और सबका विकास।