दो महत्त्वपूर्ण व्यापार समझौतों में सफलता मिलने के बाद आधिकारिक तौर पर यह माना जा रहा है कि भारत आर्थिक रूप से अनुकूल स्थिति में है, या उसके आसपास कहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति के बदलते रुख के कारण उम्मीद है कि भारत को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में कपड़ा, चमड़ा और समुद्री निर्यात जैसे श्रम-प्रधान उत्पादों पर कम शुल्क का लाभ मिलेगा। हालांकि, हाल ही में हुए अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते से भारतीय परिधान निर्यातकों में आशंकाएं पैदा हो रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत इन व्यापार समझौतों में निहित संभावनाओं का अधिकतम लाभ उठा सकता है तथा रोजगार, निर्यात और विकास के मामले में आर्थिक परिदृश्य को सार्थक रूप से बदल सकता है।
अगर कोई चिंता है तो वह मुख्यत: भारत में ‘व्यापार करने’ के माहौल को लेकर है, जो कि एक आम चिंता है। यह ध्यान देने योग्य है कि ट्रंप के टैरिफ हमलों से पहले भी भारत का वस्तु निर्यात पिछले कम से कम डेढ़ दशक से उम्मीद से कम रहा है। वैश्विक वस्तु व्यापार में भारत की हिस्सेदारी मात्र 1.8 फीसदी है, जो 1990 के दशक की शुरुआत में एक फीसदी से भी कम थी। उस समय यह लगभग चीन के बराबर थी। अब चीन दुनिया में सबसे ज्यादा वस्तु व्यापार करने वाला देश है। दूसरी ओर कम उत्पादकता, लागत प्रतिस्पर्धात्मकता, कई नियमों का पालन करने की चुनौती और केंद्र एवं राज्य स्तर पर अस्थिर नीति निर्माण को वैश्विक बाजारों में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए अक्सर जिम्मेदार ठहराया जाता है।
हालांकि, अप्रत्याशित रूप से, तेजी से बढ़ते एशिया प्रशांत क्षेत्र में संभावित निवेश अवसरों की तलाश कर रहे व्यवसाय यह पाएंगे कि इस इलाके में भारत व्यापार करने के लिए सबसे जटिल स्थान नहीं है। नीदरलैंड की परामर्श कंपनी टीएमएफ ग्रुप के 2025 ग्लोबल बिजनेस कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स के अनुसार, यह विशिष्टता चीन को प्राप्त है। यह सूचकांक डूइंग बिजनेस इंडेक्स का सबसे सटीक विकल्प है जिसे विश्व बैंक ने 2021 में बंद कर दिया था।
टीएमएफ इंडेक्स मुख्य रूप से लेखांकन और कर, वैश्विक इकाई प्रबंधन और मानव संसाधन एवं वेतन प्रबंधन में अनुपालन की संख्या और अड़चनों के आधार पर व्यवसाय में जटिलता को मापता है। यह विपरीत क्रम में काम करता है। सबसे जटिल क्षेत्राधिकार को पहले स्थान पर रखा गया है (इस मामले में ग्रीस) और सबसे अच्छा क्षेत्राधिकार 79वें स्थान पर है, जो कर और मनी लॉन्ड्रिंग का अड्डा केमैन द्वीप समूह है। चीन 10वें स्थान पर है, जो 2023 में 14वें स्थान से नीचे आया है। रिपोर्ट के अनुसार, चीनी कानूनों को अक्सर अद्यतन किया जाता है और अक्सर बिना लंबे परामर्श के तेजी से लागू किया जाता है, जिसके कारण कंपनियों को अपने अनुपालन प्रयासों को नई आवश्यकताओं के अनुरूप लगातार ढालना पड़ता है।
इसके विपरीत, भारत 18वें स्थान पर है, जो इंडोनेशिया के 14वें स्थान को देखते हुए खराब नहीं लगता। लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत की नवीनतम रैंकिंग 2024 में 33वें स्थान से काफी नीचे गिर गई है। रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि भारत ने ‘पारदर्शिता और शासन पर केंद्रित कई अनुपालन सुधार’ लागू किए हैं। लेकिन यह बताती है कि ये सुधार, दीर्घकालिक रूप से लाभकारी हो सकते हैं, परंतु कंपनियों के लिए अनुपालन व्यवस्था को अधिक सख्त और जटिल बना देते हैं। रिपोर्ट में कॉरपोरेट जगत की एक बड़ी समस्या का भी जिक्र है: शिक्षा प्रणाली में कमियां, जिनके कारण पर्याप्त संख्या में कुशल श्रमिक मिलना मुश्किल हो जाता है।
रिपोर्ट में बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्याप्त मात्रा में जमीन हासिल करने में आने वाली कठिनाइयों, नीति की अनिश्चितता, मनमानी अधिसूचनाओं और आर्थिक कानूनों की अदालती व्याख्याओं का कोई उल्लेख नहीं है, जिन्होंने घरेलू और विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि नीति-निर्माता कई कानूनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और श्रम कानूनों को संहिताबद्ध करने तथा उनमें ढील देने को एक प्रमुख कारक बताते हैं, लेकिन भारतीय कंपनियां इनसे कुछ खास प्रभावित नहीं दिखतीं।
लेकिन अगर वैश्विक निवेशकों के लिए लाभ कमाने के अवसर पर्याप्त रूप से आकर्षक हों, तो नीतिगत जटिलता और अस्थिरता निवेश के लिए पूर्णतः बाधक नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, शी चिनफिंग के नेतृत्व वाले चीन में व्यापार करने की उभरती जटिलताओं के बावजूद, यह देश अभी भी एटी कियर्नी के एफडीआई कॉन्फिडेंस इंडेक्स 2025 में छठे स्थान पर है (हालांकि यह 2024 के तीसरे स्थान से नीचे हुआ है)। भारत इसमें 24वें स्थान पर है, जो 2024 के 18वें स्थान से एक बड़ी गिरावट है, और यह टीएमएफ व्यापार जटिलता सूचकांक के दृष्टिकोण को दर्शाता है। लेकिन जब आप आईटी और सेवाओं में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो तस्वीर बदल जाती है। भारत में इस वर्ष एफडीआई प्रवाह में 73 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिसका अधिकांश हिस्सा वैश्विक क्षमता केंद्रों और डेटा केंद्रों में निवेश किया गया है। भारत ने कम लागत और बेहतर कार्मिकों के आधार पर इस निवेश को आकर्षित किया है।
कुछ विश्लेषक इन आंकड़ों में भारत की भावी आर्थिक महानता के संकेत देखते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि कोई भी राष्ट्र मजबूत विनिर्माण आधार स्थापित किए बिना अल्पविकास से बाहर नहीं निकल पाया है। पड़ोसी देश बांग्लादेश इसका एक उदाहरण है। वैसे भी, बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में भारत का बेहद खराब रिकॉर्ड आईटी-आधारित आर्थिक क्रांति की उम्मीदों के खिलाफ जाता है। यह उम्मीद करना अव्यावहारिक है कि भारत रातोरात इतने कोडर और विशेषज्ञ तैयार कर देगा, जिनकी देश को चमत्कारिक रूप से आईटी पावरहाउस में बदलने के लिए आवश्यकता है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ से व्यापार समझौते निश्चित रूप से भारत के लिए व्यापार के द्वार फिर से खोलने की क्षमता प्रदान करते हैं। लेकिन तुरंत निवेश की खातिर आधार तैयार करने के लिए भारत की सभी गहरी समस्याएं दूर करनी होगी। इसके लिए जमीनी स्तर से निरंतर कड़ी मेहनत की आवश्यकता होगी जिसमें लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुंच प्रदान करना, एक जीवंत बहुसांस्कृतिक समाज को बनाए रखना, लालफीताशाही को कम करना और उद्यमियों से मनमानी करने वाले अफसरशाहों और लोकलुभावन राजनेताओं की शक्ति को कम करना शामिल है।