भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में ‘विनियमित संस्थाओं द्वारा वित्तीय उत्पादों और सेवाओं के विज्ञापन, मार्केटिंग और बिक्री’ तथा ‘ऋण की वसूली और रिकवरी एजेंटों की नियुक्ति में विनियमित संस्थाओं के आचरण’ को लेकर मसौदा संशोधन निर्देश जारी किए हैं। इनके 1 जुलाई 2026 से लागू होने की उम्मीद है। यह उपभोक्ता केंद्रित बैंकिंग की दिशा में एक और कदम है। मिस-सेलिंग (गलत जानकारी के आधार पर या भ्रम में रखकर बिक्री), अनुचित प्रोत्साहन संरचनाओं और दबावपूर्ण वसूली चलन को व्यवस्थित रूप से लक्षित करके, रिजर्व बैंक भारत की वित्तीय प्रणाली में वर्षों से मौजूद गहरे आचरण संबंधी जोखिमों का समाधान करना चाहता है।
मिस-सेलिंग के संदर्भ में, मसौदा प्रस्ताव बैंक कर्मचारियों को तृतीय पक्ष बिक्री प्रोत्साहन देने पर प्रतिबंध लगाने, जबरन उत्पाद बंडलिंग रोकने, स्वीकृत ऋणों के माध्यम से उत्पाद खरीद की फंडिंग सीमित करने और डिजिटल इंटरफेस में डार्क पैटर्न्स पर रोक लगाने का सुझाव देता है। मिस सेलिंग के प्रमाण के चलते इन उपायों का महत्त्व समझ में आता है। भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) की वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, अनुचित व्यावसायिक चलन से संबंधित 26,667 शिकायतें दर्ज हुईं, जो सालाना 14 फीसदी की वृद्धि दर्शाती हैं और बीमा क्षेत्र में कुल शिकायतों का 22 फीसदी से अधिक हिस्सा बनाती हैं।
बीमा, बैंक उत्पादों की मिस-सेलिंग का एक प्रमुख हिस्सा है। भारतीय बैंक शाखाओं के एक अध्ययन में पाया गया कि उच्च कमीशन वाले उत्पादों को प्राथमिकता से बेचा जाता है और जटिल विशेषताओं को ग्राहकों को शायद ही कभी पूरी तरह समझाया जाता है। बाजार आंकड़े दर्शाते हैं कि बैंक सामूहिक रूप से बीमा कमीशन से हर साल लगभग 25,000 करोड़ रुपये कमाते हैं।
मसौदा प्रस्ताव मिस-सेलिंग को रोकने के लिए ग्राहकों की उपयुक्तता का आकलन आयु, आय और जोखिम सहने की क्षमता के आधार पर करने की बात करता है। यह एक बड़ा कदम है जिससे उत्पाद संबंधी अनुशंसाएं वास्तविक ग्राहक आवश्यकताओं के अनुरूप होंगी, न कि केवल कमीशन की संभावना पर आधारित होंगी। बैंकों को प्रत्येक उत्पाद के लिए स्पष्ट सहमति प्राप्त करनी होगी, 30 दिनों के भीतर ग्राहक प्रतिक्रिया लेनी होगी और बार-बार सामने आने वाली समस्याओं की पहचान व नीतियों को अद्यतन करने के लिए अर्धवार्षिक प्रतिक्रिया रिपोर्ट तैयार करनी होगी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जहां मिस-सेलिंग की बात साबित हो जाती है, वहां बैंकों को ग्राहकों द्वारा चुकाई गई पूरी राशि वापस करनी होगी और संबंधित नुकसान की भरपाई करनी होगी।
यह मसौदा मिस-सेलिंग की परिभाषा को भी काफी सख्त करता है, जिसमें अब अनुपयुक्त बिक्री भी शामिल है, भले ही औपचारिक सहमति दी गई हो। ग्राहकों को यह विकल्प भी दिया जाएगा कि वे तीसरे पक्ष के उत्पादों को अपनी पसंद के प्रदाता से खरीदें, न कि केवल बैंक के पसंदीदा साझेदार से। ये प्रावधान इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि जन धन खातों, डिजिटल भुगतान और बढ़ते ऋण के माध्यम से भारत की वित्तीय समावेशन पहल ने लाखों लोगों को औपचारिक प्रणाली में जोड़ा है।
‘ऋण की वसूली और रिकवरी एजेंटों की नियुक्ति में विनियमित संस्थाओं का आचरण’ संबंधी मसौदा जबरन ऋण वसूली चलन को रोकने का लक्ष्य रखता है, जो लंबे समय से भारत की वित्तीय प्रणाली में भरोसे को कमजोर कर रही हैं। देशभर के कर्जधारकों ने बार-बार रिकवरी एजेंटों द्वारा उत्पीड़न, धमकी और सामाजिक दबाव की शिकायत की है। प्रस्तावित नियम अपमानजनक कॉल, सार्वजनिक अपमान, गुमनाम या अत्यधिक संपर्क, रिश्तेदारों तक पहुंच और निर्धारित समय से परे जाकर वसूली प्रयासों पर रोक लगाते हैं। साथ ही, बैंकों को रिकवरी कॉल रिकॉर्ड करने, एजेंटों को उचित आचरण का प्रशिक्षण देने और स्पष्ट शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता होगी।
इस प्रकार, समग्र रूप से देखा जाए तो रिजर्व बैंक के दिशानिर्देश बैंकों और अन्य ऋण संस्थानों में प्रोत्साहन संबंधी समस्या की जड़ को लक्षित करते हैं। अनिवार्य ऑडिट, डायरेक्ट सेलिंग एजेंटों की स्पष्ट जवाबदेही और धोखाधड़ीपूर्ण डिजिटल इंटरफेस की परिभाषा में स्पष्टता के माध्यम से ये प्रस्ताव मिस-सेलिंग के संरचनात्मक कारणों को काफी हद तक कम कर सकते हैं और बैंकों के ग्राहकों से जुड़ने के तरीके को नया रूप दे सकते हैं। कड़े प्रवर्तन, पारदर्शी खुलासे और मजबूत शिकायत निवारण वित्तीय प्रणाली में विश्वास को दोबारा बहाल कर सकते हैं।