विशेषज्ञों का कहना है कि रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) पर सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी के बाद इस कानून की ताकत के बजाय इसके कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित किए जाने की उम्मीद है। इससे रियल एस्टेट क्षेत्र गंभीर प्रभाव पड़ेगा। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने कई राज्यों में रेरा के कामकाज की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि वे डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों को सुविधा देने के अलावा शायद ही कुछ करते हुए दिख रहे हैं। साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने सुझाव दिया कि इस संस्था को खत्म कर देना ही बेहतर होगा।
इन टिप्पणियों से नियामकों पर सख्त निगरानी, तेजी से फैसले देने और नियमों को एकसमान तरीके से लागू करने के लिए दबाव बढ़ने की संभावना है। इससे सभी स्तरों पर अनुपालन मानकों में वृद्धि होगी। निकट भविष्य में इससे छोटे या अनुपालन न करने वाले डेवलपरों पर दबाव बढ़ सकता है जबकि पर्याप्त पूंजी के साथ बेहतर प्रशासन वाली कंपनियों को फायदा होगा।
एनारॉक के चेयरपर्सन अनुज पुरी ने कहा, ‘सर्वोच्च न्यायालय का बयान आखिरकार राज्यों में सख्त प्रवर्तन नियमों को लागू करने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसमें परियोजना समय-सीमा और एस्क्रो खातों की सख्त निगरानी शामिल है। यह नियामकों पर मामले के बैकलॉग को कम करने का भी दबाव डाल सकता है। ऐसे में यह महज कागजों पर होने के बजाय प्रवर्तन के जरिये संचालित हो जाएगा। सख्त प्रवर्तन के कारण डिफॉल्ट करने वाले छोटे डेवलपर एक बार फिर बाहर निकलते हुए दिख सकते हैं। डेवलपरों को तेजी से डिलिवरी पर ध्यान केंद्रित करने और पारदर्शिता में सुधार करने के लिए भी मजबूर किया जा सकता है।’
साया समूह के प्रबंध निदेशक विकास भसीन ने कहा, ‘सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी नियामकीय ढांचे को और मजबूत करने के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकती है। नियमों के एकसमान कार्यान्वयन के साथ-साथ सकारात्मक एवं व्यावहारिक संशोधन से निवेशक धारणा बेहतर होगी और जिम्मेदार वृद्धि को रफ्तार मिलेगी।’
आश्विन शेठ समूह के मुख्य कारोबार अधिकारी भाविक भंडारी ने कहा किया कि डेवलपरों के लिए इस संभावित बदलाव का मतलब प्रशासन, पूंजी अनुशासन और समय पर परियोजना पूरी करने पर ध्यान केंद्रित करना।
आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, रेरा की स्थापना होने के 8 के दौरान इसके तहत 99,203 से अधिक परियोजनाओं और 1,12,051 रियल एस्टेट एजेंटों को पंजीकृत किया गया है। रेरा के तहत पंजीकृत परियोजनाओं में महाराष्ट्र की सबसे अधिक हिस्सेदारी है जहां 50,487 परियोजनाएं पंजीकृत हैं। उसके बाद 7,515 परियोजनाओं के पंजीकरण के साथ गुजरात का स्थान है।
आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत रेरा के केंद्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य और फोरम फॉर पीपुल्स कलेक्टिव एफर्ट्स के अध्यक्ष अभय उपाध्याय ने जोर देकर कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने रेरा कानून की आलोचना नहीं, बल्कि इसे लागू करने के तरीके और रेरा संस्था की आलोचना की है। उद्योग विशेषज्ञों ने इसमें सुधार की गुंजाइश के बारे में भी बताया। प्राइमस पार्टनर्स इंडिया की संस्थापक और प्रबंध निदेशक आरती हरभजनका ने कहा कि आगे चलकर रेरा की बुनियादी मंशा पर नए सिरे से विचार करने के बजाय इसके कार्यान्वयन को मजबूत और सुव्यवस्थित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
उपाध्याय ने कहा कि जवाबदेही तय किए बिना बार-बार की गई सामान्य टिप्पणियां इस व्यवस्था को तब तक ठीक नहीं कर पाएंगी। अधिकारी 10,000 से 15,000 रुपये का जुर्माना लगाकर अनुपालन के मुकाबले गैर-अनुपालन को सस्ता बना रहे हैं। जुर्माना लगाने के बजाय रिमाइंडर भेजने से भी विनियमन का उद्देश्य विफल हो जाता है। ‘रेरा-पंजीकृत’ एक मार्केटिंग लाइन बन गई है, मगर वह अनुपालन की गारंटी नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया, ‘इस अधिनियम में लक्षित संशोधनों पर विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा खास तौर पर डिफॉल्ट अथवा अटकी हुई परियोजनाओं को पूरा किए जाने के लिए एक मजबूत ढांचे की स्थापना के लिए जरूरी है। साथ ही लगातार सामने अपने वाली कार्यान्वसन संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए ऐसा करना आवश्यक है।
इस अधिनियम की धारा 32 को तत्काल प्रभाव से लागू करने की जरूरत है ताकि रेरा किफायती एवं पर्यावरण के अनुकूल आवास जैसे अहम मुद्दों पर सक्रियता से उपायों की सिफारिश कर सके।’ उद्योग के हितधारकों का मानना है कि रेरा की आलोचना करते समय रियल एस्टेट क्षेत्र में उसके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
इकॉनमिक लॉज प्रैक्टिस की पार्टनर हीना छेड़ा ने कहा, ‘सर्वोच्च न्यायालय की तीखी आलोचना एक दर्दनाक वास्तविकता को उजागर करती है। मगर वह रेरा को पूरी तरह खारिज करना भारतीय रियल एस्टेट में एक अहम सुधार को नजरअंदाज करना है। परियोजना की 70 फीसदी रकम को एस्क्रो खातों में सुरक्षित करते हुए और कारपेट एरिया के लिए सख्त मानक को लागू करते हुए रेरा ने रकम को दूसरी ओर जाने से रोक दिया है।’
नाइट फ्रैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रेरा के कार्यान्वयन ने मूल्य संबंधी कयासबाजी पर अंकुश लगा है। साथ ही मकान की कीमतों को बाजार की बुनियादी बातों के साथ तालमेल बिठाया गया है। इससे पिछली मंदी के बाद रिहायशी क्षेत्र को उबरने में मदद मिली। खर्च करने की बेहतर क्षमता और मजबूत नियामकीय प्रक्रियाओं ने निवेशक धारणा को मजबूत किया। इससे निजी इक्विटी निवेश 2011-2016 में 17.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2017-2020 में 26 अरब डॉलर हो गया।
विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा में सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। पुरी ने बताया कि 9 फरवरी, 2026 तक देश के 35 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों (नागालैंड को छोड़कर) ने सामान्य नियमों को अधिसूचित कर दिया है, जबकि 27 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों और दो अंतरिम निकायों ने सक्रिय रियल एस्टेट अपीलीय पंचाट की स्थापना की है। इनमें कुल मिलाकर 1.55 लाख से अधिक मामलों का निपटारा हुआ है। इसमें उत्तर प्रदेश 52,047 के साथ सबसे आगे है, उसके बाद 27,006 मामलों के साथ महाराष्ट्र, 16,531 मामलों के साथ हरियाणा और 10,169 मामलों के साथ कर्नाटक का स्थान है।