मैंने पिछले पखवाड़े अपने स्तंभ में लिखा था कि पर्यावरण मंजूरी का हौआ पर्यावरण बनाम विकास की झूठी बहस को बढ़ावा देता है जबकि हकीकत यह है कि ऐसी मंजूरी बिना सोचे समझे किए जाने वाले विकास पर निगरानी रखने के लिए जरूरी है। मैं इस बात को थोड़ा स्पष्ट करती हूं।
कुछ वर्ष पहले मैं एक उच्च स्तरीय समिति की सदस्य थी जिसकी स्थापना गंगा की ऊपरी धाराओं में जलविद्युत परियोजनाओं को पर्यावरण संबंधी मंजूरी देने के लिए की गई थी। आप कह सकते हैं कि परियोजनाओं को पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरियों की वजह से रोका गया और ऐसा करना विकास को बाधित करने जैसा था। परंतु जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि सभी परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी दे दी गई थी। इन असीमित और एक के बाद एक लगातार मंजूरी पाने वाली योजनाओं से न केवल गंगा के प्रवाह पर असर पड़ेगा बल्कि कई मौसमों में तो यह नदी सूख भी सकती है। ऐसी स्थिति में जलवायु परिवर्तन के जोखिम से दो चार हिमालय की पहाडिय़ों पर भूस्खलन तथा बरबादी की आशंका और बढ़ जाएगी। समस्या जलविद्युत से नहीं थी। बल्कि यह तो बिजली का स्वच्छ और नवीकरणीय माध्यम है। हिमालय क्षेत्र में यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भी है। परंतु इन परियोजनाओं को बिना सोचे समझे स्थापित किया गया और मंजूरी प्रदान की गई। इस बात पर विचार ही नहीं किया गया कि किन शर्तों पर और कितनी परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान की जानी चाहिए। तो क्या यह मामला पर्यावरण बनाम विकास का है? या फिर जानबूझकर गलत विकास का?
मैं इस बात को दोहराने के लिए यह लिख रही हूं कि हमें एक मजबूत, विश्वसनीय पर्यावरण निगरानी व्यवस्था की आवश्यकता है ताकि हम पर्यावरण और विकास में संतुलन कायम कर सकें और नुकसान को कम कर सकें। पर्यावरण की दृष्टि से एक प्रभावी व्यवस्था ऐसा होना सुनिश्चित करेगी और यह डिजाइन और क्रियान्वयन दोनों स्तरों पर होगा।
ऐसे में यह व्यवस्था प्रभावी कैसे बनेगी? सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि व्यवस्था गैर जरूरी रूप से जटिल हो गई है और इसे सुसंगत बनाने की आवश्यकता है। पर्यावरण, वन, वन्यजीव और तटीय सभी प्रकार की मंजूरियों को एकीकृत करने की आवश्यकता है ताकि पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) को व्यापक बनाया जा सके। वर्ष 2022-23 के बजट में वित्त मंत्री ने एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली की घोषणा की। परंतु चूंकि यह पूरी तरह कारोबारी सुगमता पर केंद्रित है इसलिए यह इस पहले से ध्वस्त प्रणाली को और नुकसान पहुंचाएगी। ऐसे में मंजूरी प्रणाली को ऐसे पैकेज का हिस्सा बनाया जाना चाहिए जो सार्वजनिक प्रतिभागिता और निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत करे।
दूसरी बात सार्वजनिक आकलन की प्रक्रिया को गहराई प्रदान की जानी चाहिए। मैं यह बात यह जानते हुए कह रही हूं कि समुदाय की बात और उसकी आपत्तियां सुनने की बात उतनी ही भ्रष्ट हो सकती है जितना कि हमारी व्यवस्था के अन्य अंग हैं। आज सार्वजनिक सुनवाइयों का आयोजन होता है लेकिन बात सुनी नहीं जाती। हमें इसे एक अहम प्रक्रिया के रूप में देखना होगा। जब सामुदायिक चिंताओं पर ध्यान दिया जाता है और दिक्कतों को दूर करने के प्रयास किए जाते हैं तो परियोजनाओं से जुड़े जोखिम कम हो जाते हैं। किसी भी अनिवार्य सार्वजनिक सुनवाई का वीडियो प्रसारण किया जाना चाहिए। परियोजना का आकलन कर रही समिति की यह जवाबदेही होनी चाहिए कि वह समस्त चिंताओं का ध्यान रखे। इसके लिए निगरानी और अनुपालन की शर्तों को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि केंद्र और राज्यों में पर्यावरण आकलन समितियों की भूमिका की समीक्षा की जाए। ये समितियां इस प्रक्रिया की सबसे कमजोर कड़ी हैं क्योंकि ये परियोजना के अनुपालन या निगरानी के लिए जवाबदेह नहीं होतीं। ऐसे में यह कहना हास्यास्पद है कि विशेषज्ञ स्वतंत्र होते हैं। हकीकत में ये समितियां सरकार को उन निर्णयों के लिए कम जवाबदेह बनाती हैं जो परियोजना की छंटनी के दौरान लिए जाते हैं। अब समय आ गया है कि इन समितियों को भंग कर दिया जाए और आकलन तथा निगरानी का काम केंद्र तथा राज्यों के पर्यावरण विभागों द्वारा किया जाए। विशेषज्ञता के संदर्भ में इन्हें मजबूत बनाना आवश्यक है। इसके साथ ही मंजूर या नामंजूर परियोजनाओं की सूची और उनकी स्थिति को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
सबसे अहम एजेंडा यह है कि मंजूरी के बाद परियोजनाओं की निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए। इसके लिए सभी एजेंसियों के काम को एकीकृत करने की आवश्यकता है। इसमें राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर तटीय और वन संबंधी संस्थान शामिल हैं। फिलहाल कई एजेंसियां होने के बावजूद प्रवर्तन कमजोर है। अनुपालन के लिए निगरानी पर ध्यान देना अहम है। यदि ऐसा नहीं किया गया परियोजनाओं के प्रभाव का आकलन करने के इस प्रयास का कोई लाभ नहीं। परंतु यह सब तब तक कारगर नहीं होगा जब तक कि परियोजना से जुड़े बुनियादी आंकड़े विश्वसनीय न हों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न हों। इसके लिए विभिन्न पर्यावरण मानकों पर आधारित उन्नत सूचनाएं जुटाने की प्रक्रिया तथा परियोजना की पारिस्थितिकी महत्ता को मजबूत करना जरूरी है। इन आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट तैयार करते समय इसकी विश्वसनीयता और वैज्ञानिकता को परखा जा सके।
यह सब तथा ऐसे अन्य कदम तभी संभव हैं जब हमें यकीन हो कि परियोजनाओं के मूल्यांकन की प्रक्रिया का मूल्य है। वरना ये मंजूरियां निरर्थक कवायद बनकर रह जाएंगी।