होम लोन से मकान खरीदना आसान हो जाता है और आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कर से जुड़े कुछ फायदे भी मिलते हैं। मगर करयोग्य आय में कटौती के साथ कुछ शर्तें, बंदिशें और समयसीमा भी होती है, जिनके बारे में अक्सर करदाता भ्रम में रहते हैं।
आयकर अधिनियम, 1961 के तहत खुद के कब्जे वाले मकान पर सालाना 2 लाख रुपये तक का ब्याजा कर योग्य आय में से घटा दिया जाता है बशर्ते कर्ज मकान खरीदने या निर्माण के लिए लिया गया हो और निर्माण भी तय मियाद के भीतर पूरा हो गया हो। कर्ज मरम्मत के लिए मांगा गया हो या मकान के निर्माण में देर हो रही हो तो सालाना 30,000 रुपये तक की ही कटौती हो सकती है।
किराये पर चढ़ाए गए या चढ़ाए जा रहे मकान के लोन पर समूचा ब्याज कटौती का हकदार होता है। लेकिन पहले हुए घाटे को दूसरी आय में निपटाया जाता है तो कटौती सालाना 2 लाख रुपये से ज्यादा नहीं हो सकती और बाकी कटौती अगले साल ली जा सकती है। ब्याज पर कटौती का दावा मकान बन जाने या मकान पर कब्जा मिलने वाले साल से ही किया जाता है होम लोन मिलने वाले या ईएमआई शुरू होने की तारीख से नहीं।
एसवीएएस बिजनेस एडवाइजर्स के निदेशक शुभम जैन बताते हैं, ‘पहली बार अथवा सस्ते मकान खरीदने वाले सभी पात्र लोगों को धारा 24(बी) के साथ ही धारा 80ईई और 80ईईए के तहत ब्याज पर और भी कटौती दी गई है बशर्ते शर्तों और समयसीमा का पालन हो।’
मकान पर कब्जा लेने से पहले चुकाए गए ब्याज को निर्माण-पूर्व ब्याज माना जाता है। जैन ने कहा कि निर्माण से पहले अदा किए गए ब्याज पर कटौती उसी साल नहीं ली जा सकती। जिस साल मकान तैयार होता है या कब्जा मिलता है उस साल से अगले पांच साल तक समान किस्तों में कटौती की मंजूरी दी जा सकती है।
होम लोन के मूलधन की अदायगी पर धारा 80सी के तहत सालाना 1.5 लाख रुपये तक की कटौती का प्रावधान है। मगर 1.5 लाख रुपये की इस सीमा में कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ), इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम (ईएलएसएस), जीवन बीमा प्रीमियम के एवज में मिलने वाली कटौती भी शामिल होती है।
नांगिया ऐंड कंपनी एलएलपी के पार्टनर नीरज अग्रवाल बताते हैं कि अदा किए गए मूलधन पर कटौती का दावा प्रॉपर्टी पर कब्जा मिलने के बाद ही किया जा सकता है। जिस वित्त वर्ष में कब्जा मिला है, उसके खत्म होने के बाद पांच साल के भीतर प्रॉपर्टी बेच दी गई तो मूलधन अदायगी पर कटौती वाले सारे दावे निरस्त हो जाते हैं और यह रकम करदाता की आय में जोड़ दी जाती है। स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्री और प्रॉपर्टी हस्तांतरण से जुड़े खर्च भी धारा 80सी के तहत 1.5 लाख रुपये की सीमा तक कटौती के दायरे में हैं। मगर इसका लाभ उसी साल मिलेगा जब भुगतान किया जाता है।
नई कर व्यवस्था के तहत होम लोन पर कटौती के ज्यादातर फायदे नहीं मिलते। अग्रवाल बताते हैं, ‘खुद इस्तेमाल की जा रही प्रॉपर्टी पर धारा 80सी के तहत मूलधन की अदायगी और धारा 24(बी) के तहत ब्याज में छूट का प्रावधान नहीं है। मगर किराये पर चढ़ी प्रॉपर्टी के ब्याज पर कटौती मिलती है, जिसे आवासीय प्रॉपर्टी से आय के तौर पर गिना जाता है।’
को-बॉरोअर ब्याज और मूलधन पर कटौती का दावा कर सकते हैं मगर उन्हें प्रॉपर्टी का को-ओनर होना चाहिए और ईएमआई चुकाने में भी योगदान करना चाहिए। डेलॉयट इंडिया के पार्टनर सुधाकर सेतुरामन समझाते हैं, ‘को-बॉरोअर होने से ही किसी व्यक्ति को कर लाभ नहीं मिल जाता। धारा 80सी या 24(बी) के तहत कटौती का दावा करने के लिए आपको प्रॉपर्टी का को-ओनर होने के साथ-साथ ऋण अदायगी में भी योगदान करना चाहिए।’
को-बॉरोअर अगर को-ओनर भी हैं तो प्रॉपर्टी में अपने हिस्से और ईएमआई में अपने वास्तविक योगदान के अनुपात में ही कटौती का फायदा ले सकते हैं। अगर दोनों को-ओनर आधे-आधे हकदार हैं तो वे ब्याज की आधी-आधी रकम की कटौती का फायदा उठा सकते हैं। सेतुरामन के हिसाब से को-बॉरोअर ईएमआई में जितना हिस्सा चुका रहे हैं उन्हें अपना स्वामित्व भी उतना ही कर लेना चाहिए। इससे कर कटौती बिल्कुल सही रहेगी और दावा हर को-ओनर की वैध हिस्सेदारी के दायरे में ही होगा।