बैंकिंग व्यवस्था में जमा कम होने का असर जमा वृद्धि पर नजर आ रहा है और यह ऋण वृद्धि से करीब 180 आधार अंक कम हो गया है। इसकी वजह से बैंकों को सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (सीडी) बाजार पर बहुत ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है। इसकी वजह से 15 जनवरी तक के पखवाड़े में बकाया सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट रिकॉर्ड 5.75 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया और सीडी की दरें बढ़ गईं। एचडीएफसी बैंक और इंडसइंड बैंक सहित प्रमुख बैंकों ने एक साल के पेपर पर 7 प्रतिशत से अधिक दर पर उधार लिया।
सीसीआईएल के आंकड़ों से पता चलता है कि एचडीएफसी बैंक ने एक साल के लिए 7.01 प्रतिशत पर 450 करोड़ रुपये जुटाए, जबकि इंडसइंड बैंक ने समान अवधि के लिए 7.49 प्रतिशत पर 1,075 करोड़ रुपये उधार लिए। आईसीआईसीआई बैंक ने 6.95 प्रतिशत पर 2,685 करोड़ रुपये जुटाए और सरकारी बैंकों ने 6.94 से 6.97 प्रतिशत दर की सीमा में सीडी के माध्यम से धन जुटाया है।
इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों से पता चलता है कि बाजार में कुल बकाया सीडी 5.75 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया, जो एक रिकॉर्ड उच्च स्तर है। हालांकि पखवाड़े (31 जनवरी) के दौरान सीडी जारी करने की मात्रा घटकर 40,189 करोड़ रुपये रह गई, जो 31 दिसंबर को समाप्त पखवाड़े में 88,512 करोड़ रुपये थी। यह गिरावट बढ़ी हुई दरों के कारण आई।
बैंक तेजी से सीडी का सहारा ले रहे हैं। पिछले 6 पखवाड़ों में उधारदाताओं ने 3.77 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सीडी जारी की हैं।
व्यवस्था में जमा में कमी आने और ऋण से पीछे छूटने के बाद सीडी जारी करने में तेजी आई । यह सितंबर के मध्य से बढ़ना शुरू हुआ, जिसकी वजह जीएसटी दरें कम किया जाना और रिजर्व बैंक द्वारा दरों में कटौती करना है।
भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर को समाप्त पखवाड़े में ऋण वृद्धि 14.5 प्रतिशत और जमा वृद्धि 12.7 प्रतिशत रही है।
इक्रा में वरिष्ठ उपाध्यक्ष और सह समूह प्रमुख (फाइनैंशियल सेक्टर रेटिंग्स) अनिल गुप्ता ने कहा, ‘नकदी कम होने के कारण नीतिगत दर में कटौती के बावजूद कमर्शियल पेपर (सीपी) और सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (सीडी) की दरें मजबूत हुई हैं। इस माहौल में बैंक सीडी बाजार के बाहर भी थोक जमा की संभावना तलाश सकते हैं।’
साथ ही उन्होंने कहा कि सीडी की दरें तब तक ऊंची रहेंगी जब तक कि रिजर्व बैंक नकदी बढ़ाने वाले उपाय पेश नहीं करता है। केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को ऐसा किया था। रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को बैंकिंग व्यवस्था में नकदी डालने के प्रयास में ओपन मार्केट ऑपरेशंस, डॉलर-रुपया खरीद-बिक्री स्वैप और दीर्घकालिक परिवर्तनीय दर रीपो (वीआरआर) संचालन के माध्यम से नकदी बढ़ाने के उपायों की घोषणा की थी।
ओएमओ में 5 फरवरी और 12 फरवरी को 50,000 करोड़ रुपये की दो किश्तों में 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य की भारत सरकार की प्रतिभूतियों की खरीद शामिल होगी। 25,000 करोड़ रुपये के लिए 90 दिन की वीआरआर नीलामी 30 जनवरी को आयोजित की जाएगी। इसके अतिरिक्त 4 फरवरी को 3 साल के लिए 10 अरब डॉलर का डॉलर-रुपया खरीद-बिक्री स्वैप आयोजित किया जाएगा।
केंद्रीय बैंक ने कहा कि नकदी की मौजूदा स्थिति औ्र वित्तीय स्थितियों की समीक्षा के बाद यह फैसला किया गया। रिजर्व बैंक ने कहा कि वह व्यवस्थित नकदी की स्थिति सुनिश्चित करने के उपाय करेगा।
रॉकफोर्ट फिनकैप एलएलपी के संस्थापक और मैनेजिंग पार्टनर वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा, ‘भारतीय बैंकों ने तेजी से कम अवधि वाले सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट का सहारा लेना शुरू कर दिया है। इनमें से ज्यादातर 1 से 3 महीने के सेगमेंट में और एक वर्ष तक के सेगमेंट में जा रहे हैं। एक साल की सीडी की यील्ड 7.49 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इससे ऐसे समय में रोलओवर फंडिंग पर बढ़ती निर्भरता का पता चलता है, जब व्यवस्था में नकदी पर्याप्त है, न कि अधिशेष की स्थिति है। अतिरिक्त नकदी न होने के कारण कम अवधि की दरें कम करने की कवायद में सीडी यील्ड तेजी से बढ़ी है। इसकी वजह से कम अवधि की मेच्योरिटी पर भी बैंकों को बढ़ी लागत चुकानी पड़ रही है।’
उन्होंने कहा, ‘कम अवधि की सीडी पर बढ़ती निर्भरता चिंता का विषय है। इससे रीफाइनैंसिंग की जोखिम बढ़ी है और सुस्त जमा और तेजी से ऋण बढ़ने के साथ देनदारियों के प्रबंधन पर दबाव के संकेत मिलते हैं।’
सीडी की रेटिंग अनुमोदित रेटिंग एजेंसियों द्वारा की जाती है। इससे मांग के आधार पर उनकी द्वितीयक बाजार में खरीद फरोख्त बढ़ जाती है। बैंक प्राथमिक रूप से इसलिए सीडी पर निर्भर होते हैं, क्योंकि वित्तीय व्यवस्था में वे कई तरल के लाभ की पेशकश करते हैं। इसमें ट्रेडिंग के अवसर, नकदी प्रबंधन और मेच्योरिटी के अंतर का प्रबंधन शामिल है।
आगे चलकर ऋण वृद्धि की भरपाई के लिए बैंकों को थोक जमा से धन की व्यवस्था करनी पड़ सकती है। इससे सीडी से कुल बकाया भी बढ़ेगा। हालांकि विशेषज्ञों ने सीडी बाजार की सीमाओं का भी उल्लेख किया, जहां प्रमुख निवेशक म्युचुअल फंड्स हैं।
कॉरपोरेट जारीकर्ता 3 और 6 महीने के सीपी मार्केट में ज्यादा आकर्षक पेशकश कर रहे हैं। ऐसे में म्युचुअल फंड सीडी में धन लगाने के बजाय सीपी की ओर आकर्षित हो रहे हैं