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ड्रोन, रोबोट्स, रॉकेट लॉन्चर से लेकर हाइपरसोनिक मिसाइल तक, गणतंत्र दिवस परेड में दिखी सेना की नई ताकत

परेड में सेना द्वारा ड्रोन, रोबोटिक सिस्टम, रॉकेट और मिसाइल तकनीक का प्रदर्शन किया गया, जो बदलते युद्ध स्वरूप के अनुरूप भारतीय सेना की तैयारियों को दिखाता है

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भास्वर कुमार   
Last Updated- January 26, 2026 | 2:05 PM IST

दिल्ली के कर्तव्य पथ पर सोमवार को 77वें गणतंत्र दिवस की परेड ने सबका ध्यान खींचा। इस बार का शोकेस कुछ अलग था, जहां सेना ने खुद को बदलते युद्ध के तरीकों के हिसाब से तैयार दिखाया। यहां पर स्वचालित मशीनों का इस्तेमाल और लंबी दूरी से सटीक हमले करने वाली तकनीकों पर खास जोर था। परेड में पहली बार सेना के जवान और हथियारों को जंग के असली रूप में दिखाया गया, जैसे कि वो लड़ाई के मैदान पर तैनात होते हैं। पारंपरिक मार्चिंग दलों के साथ-साथ सैनिक पूरे युद्ध वाले गियर में नजर आए। नए बने फ्रंटलाइन ग्रुप्स के हिस्से ‘भैरव’ लाइट कमांडो भी पहली बार परेड में शामिल हुए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस उत्सव की अगुवाई की, और यूरोपीय काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा के साथ यूरोपीय कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि के तौर पर मौजूद रहीं।

परेड में सेना के भारी टैंकों से लेकर छोटे वाहनों तक हर चीज पर छोटे ड्रोन्स लगे दिखे, जो जासूसी और निगरानी के काम आते हैं। ये ड्रोन्स मैदान पर दुश्मन की हरकतों को जल्दी पकड़ने में मदद करते हैं, और युद्ध में फैसले लेने का समय बहुत कम कर देते हैं। यूक्रेन की जंग से सबक लेकर, जहां सस्ते ड्रोन्स ने करोड़ों के टैंकों को तबाह किया, भारतीय सेना ने अपने मुख्य बैटल टैंकों जैसे अर्जुन और टी-90 पर एंटी-ड्रोन जाली वाली संरचनाएं लगाई हैं। ये छोटे ड्रोन्स को टैंक के ऊपर से हमला करने से रोकती हैं। कुल मिलाकर, परेड ने दिखाया कि सेना अब युद्ध को ज्यादा स्मार्ट तरीके से लड़ने की तैयारी में है।

ड्रोन्स और रोबोट्स: सेना की नई आंखें और बाजू

सेना ने अपनी जासूसी और हमले की ताकत को बढ़ाने के लिए नए सिस्टम्स दिखाए। शक्तिबान और दिव्यास्त्र नाम के सिस्टम्स हाई-मोबिलिटी वाहनों पर लगे थे, जो ड्रोन्स के झुंड और टेदर्ड ड्रोन्स से निगरानी करते हैं। साथ ही, एक घरेलू हाइब्रिड यूएवी से सटीक तोपखाने की फायरिंग को निर्देशित करने की क्षमता भी प्रदर्शित की गई। परेड में विदेशी और स्वदेशी लोइटरिंग मुनिशन्स की पूरी रेंज दिखाई गई, जो हवा में मंडराते हुए दुश्मन पर हमला कर सकते हैं। इनमें से कुछ का इस्तेमाल मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम्स के खिलाफ किया गया था, और वो कामयाब साबित हुए। इसके अलावा, 1000 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाले लंबी दूरी के ड्रोन्स भी थे, जो देखते ही हमला करने के मिशन के लिए बने हैं।

परेड में अनमैन्ड ग्राउंड व्हीकल्स और छोटे रोबोटिक म्यूल्स ने भी सबका ध्यान खींचा। ये मशीनें सैनिकों की मदद करती हैं, जैसे सामान ढोने या खतरनाक जगहों पर जाने में। इससे सैनिकों की जान बचती है और काम ज्यादा असरदार होता है। एक और नई चीज थी ड्रोन शक्ति सिस्टम, जो आगे की पोस्ट्स पर ही ड्रोन्स बनाने और उनकी मरम्मत करने की सुविधा देता है। इससे सेना को ड्रोन्स लगाने में देरी नहीं होती, और वो तुरंत एक्शन ले सकती है। ये सब बदलाव यूक्रेन की जंग से सीखे गए सबकों से आए हैं, जहां ड्रोन्स ने युद्ध का चेहरा बदल दिया। अब भारतीय सेना भी इसी रास्ते पर चल रही है, ताकि मैदान पर ज्यादा तेज और सटीक बनी रहे।

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लंबी दूरी के हथियार: रॉकेट्स और मिसाइल्स की ताकत

परेड में सेना की लंबी दूरी से हमला करने वाली ताकत पर खास फोकस था। सूर्यास्त्र मल्टी कैलिबर रॉकेट लॉन्चर सिस्टम पहली बार दिखा, जो एक ही लॉन्चर से 150 और 300 किलोमीटर रेंज वाले दो तरह के रॉकेट दाग सकता है। ये सिस्टम अमेरिका के आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम जैसा है, जो यूक्रेन की जंग में काफी चर्चित रहा। सेना ने हाल ही में इमरजेंसी खरीद के तहत एक भारतीय प्राइवेट डिफेंस कंपनी से इजराइल के साथ मिलकर 293 करोड़ रुपये का सौदा किया है, ताकि ये सिस्टम जल्दी मिल जाए। आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने हाल में कहा कि पाकिस्तान ने अपनी रॉकेट और मिसाइल फोर्स बना ली है, और चीन के पास पहले से ही है, इसलिए भारत को भी ऐसी डेडिकेटेड फोर्स की जरूरत है।

इंडो-रशियन ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भी परेड में थी, जो ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार असली जंग में इस्तेमाल हुई और कामयाब रही। नवंबर में डिफेंस अफसरों ने बताया कि दूसरे देशों से ब्रह्मोस के लिए कई पूछताछ आई हैं, और वियतनाम व इंडोनेशिया से ऑर्डर मिलने की उम्मीद है। फिलीपींस को ये मिसाइल पहले ही निर्यात की जा चुकी है। परेड का सबसे बड़ा आकर्षण था डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन का लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल और उसका लॉन्च सिस्टम। इस मिसाइल का पहला सफल फ्लाइट टेस्ट नवंबर 2024 में हुआ था। ये 1500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर अलग-अलग पेलोड ले जा सकती है, और स्थिर या चलते टारगेट पर हमला कर सकती है। इससे भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहां चीन, रूस और अमेरिका जैसे हाइपरसोनिक मिसाइल क्षमता वाले देश हैं।

तीनों सेनाओं की एकजुटता और अन्य झलकियां

परेड में आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की एकजुटता को दिखाने वाला एक टेब्लो था, जिसमें एक ग्लास केस में ‘इंटीग्रेटेड ऑपरेशनल सेंटर’ दिखाया गया। ये ऑपरेशन सिंदूर की मिसाल था, जहां तीनों सेनाओं ने मिलकर काम किया। कुल मिलाकर, परेड ने सेना के नए हथियारों और रणनीतियों को सामने लाया, जो बदलते युद्ध के मुताबिक हैं। इन्फैंट्री व्हीकल्स, लाइट स्ट्राइक व्हीकल्स और ऑल-टेरेन व्हीकल्स पर लगे छोटे यूएवी ने दिखाया कि सेना अब हर स्तर पर टेक्नोलॉजी को अपनाने की कोशिश कर रही है। इससे युद्ध में दुश्मन को ट्रैक करने से लेकर हमला करने तक का समय सिर्फ तीन मिनट तक सिमट गया है, जो पहले आधे घंटे का था। ये बदलाव सेना को ज्यादा मजबूत और तैयार बनाते हैं।

First Published : January 26, 2026 | 2:05 PM IST