हमारे संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था की थी कि राष्ट्रपति हर पांच वर्ष में एक वित्त आयोग की नियुक्ति करेंगे जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करेगा ताकि वे सातवीं अनुसूची के अंतर्गत मिले कार्यों को पूरा कर सकें। वे हर राज्य को मिलने वाली हिस्सेदारी खुद संविधान में भी लिख सकते थे।
इसके बजाय उन्होंने एक निरपेक्ष विशेषज्ञ समिति का गठन करने का फैसला किया ताकि वह बदलती क्षमताओं और राज्यों की आवश्यकताओं का आकलन करके इसका निर्धारण कर सके और इसी आधार पर केंद्र सरकार द्वारा संग्रहित कर को राज्यों के साथ बांटने और उन्हें अनुदान देने का निर्णय ले सके। सोलहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट एक फरवरी को संसद में पेश की गई और वही अगले पांच साल के लिए संघीय राजकोषीय ढांचा निर्धारित करेगी।
इसका श्रेय उन लोगों को जाता है जिन्होंने आयोग का कार्यक्षेत्र तय किया। उन्होंने न केवल अनुच्छेद 280 में वर्णित कार्यों को आसानी से दोहराया बल्कि आयोग को किसी प्रकार के निर्देश देने से बचने का प्रयास किया। यह अतीत से अलग था। आयोग को भी यह श्रेय जाता है कि उसने किसी तरह की अस्थिरता नहीं पैदा की और उसकी सिफारिशों में स्थिरता और निरंतरता का मजबूत तत्व मौजूद रहता है। आयोग ने संघीय करों के 41 फीसदी के हस्तांतरण को जारी रखा है, लेकिन राजस्व घाटे के लिए अनुदान की सिफारिश करने की प्रथा को समाप्त कर दिया है।
हस्तांतरित करों के क्षैतिज वितरण के लिए, सूत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण बदलाव राज्यों के राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान को शामिल करना है। इस कारक को 10 फीसदी भार दिया गया, जिसके लिए प्रति व्यक्ति आय दूरी और जनसांख्यिकीय प्रदर्शन का भार 2.5 फीसदी अंक तथा क्षेत्र का भार 5 फीसदी अंक घटाया गया। 15वें वित्त आयोग द्वारा कर प्रयास कारक को दिए गए 2.5 फीसदी भार को हटा दिया गया और इसे जनसंख्या हिस्सेदारी को 17.5 फीसदी भार देने में जोड़ा गया।
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन का भार 2.5 फीसदी अंक घटाया गया और प्रजनन परिवर्तन के व्युत्क्रम को लेने के बजाय 1971 और 2011 की जनगणनाओं के बीच जनसंख्या वृद्धि के व्युत्क्रम को लिया गया।
इसी प्रकार, वन आवरण चर को उसके घनत्व के आधार पर भारित किया गया। आयोग ने राज्य विशिष्ट और क्षेत्र विशिष्ट अनुदान की सिफारिश करने की प्रथा को समाप्त कर दिया। ऊर्ध्वाधर यानी ऊपर से नीचे होने वाला हस्तांतरण मुख्य रूप से आयोग के इस फैसले पर आधारित होते हैं कि संविधान में संघ और राज्यों को सौंपे गए कार्यों को पूरा करने में उनकी सापेक्ष क्षमताएं और आवश्यकताएं क्या हैं। हालांकि, समांतर हस्तांतरण का मूल्यांकन करते समय यह देखना महत्त्वपूर्ण है कि संघीय प्रणाली में हस्तांतरण के तर्क के साथ वे किस हद तक संरेखित हैं।
हस्तांतरण सामान्य उद्देश्य से भी हो सकते हैं और विशेष उद्देश्य से भी। सामान्य उद्देश्य की बात करें तो इसका लक्ष्य है हर राज्य को समतुल्य राजस्व प्रयास पर समतुल्य स्तर का लोक सेवा प्रदान करना और जिसका अर्थ है, राज्यों की राजस्व और लागत संबंधी अक्षमताओं की भरपाई करना तथा राजस्व प्रयास को प्रोत्साहित करना।
सामान्य उद्देश्य हस्तांतरण बिना शर्त होता है और इससे राज्य अपने निवासियों की विभिन्न प्राथमिकताओं के अनुसार सेवाएं प्रदान करने में सक्षम होते हैं। हालांकि, विशिष्ट अनुदान इस उद्देश्य से दिए जाते हैं कि योग्य मानी जाने वाली सेवाओं या उन सेवाओं के न्यूनतम मानकों को सुनिश्चित किया जा सके जिनमें महत्त्वपूर्ण बाह्य प्रभाव शामिल हों, ताकि प्रत्येक नागरिक को ऐसी सेवाओं का निर्धारित न्यूनतम स्तर उपलब्ध हो सके।
कर विभाजन एक सामान्य उद्देश्य हस्तांतरण है और आयोग द्वारा उसे राज्यों को मोटे तौर पर राजस्व और लागत के अंतर के आधार पर दिया जाता है। 16वें वित्त आयोग ने यह तर्क दिया है कि जीडीपी में योगदान के पैमाने का उपयोग दक्षता के उद्देश्य को पूरा करता है, क्योंकि यह माना जाता है कि इससे राज्यों को अपनी सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) की वृद्धि को अधिकतम करने के लिए नीतियां लागू करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
यद्यपि सामान्य रूप से यह आकर्षक प्रतीत हो सकता है, लेकिन इस कारक का प्रस्ताव राजस्व अक्षमता कारक से टकराता है और इसकी प्रभावशीलता इसके चुनावी असर पर निर्भर करेगी। और भी महत्त्वपूर्ण यह है कि प्रतिस्पर्धी असमानता से चिह्नित संघवाद में राज्य समान स्तर पर नहीं हैं, और उनकी प्रोत्साहन का प्रतिक्रिया देने की क्षमता भिन्न है। जिन राज्यों के पास बेहतर सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे तथा अधिक उत्तरदायी संस्थाएं हैं, वे अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
आयोग की सिफारिशों से राजस्व और लागत संबंधी अक्षमताओं की पूरी तरह भरपाई की अपेक्षा नहीं की जा सकती, और कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में बुनियादी ढांचे की कमी बनी रहती है, क्योंकि राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम उन्हें अपने जीएसडीपी के केवल 3 फीसदी तक ही उधार लेने की अनुमति देता है।
राजस्व घाटा अनुदान समाप्त करना भी कुछ सवाल खड़े करता है। राजस्व और लागत अंतर पर आधारित कर विभाजन राज्यों की व्यक्तिगत समस्याओं को हल नहीं करता और अनुदान बेहतर लक्षित करने में मदद करता है। इसके साथ ही निरपेक्ष आकलन को वस्तुनिष्ठ तरीके से नहीं कर पाने से समता और प्रोत्साहन, दोनों तरह की समस्याएं पैदा होती है।
आधार वर्ष के आंकड़ों पर आधारित अनुमान वंचित राज्यों में सेवा स्तर की कमी का समाधान करने में विफल रहते हैं, और आयोग द्वारा बजटीय रिक्तियों को भरने से समय के साथ ये रिक्तियां और बड़ी हो जाती हैं। राजस्व घाटा अनुदान को समाप्त करना इसे टालने का एक तरीका है, लेकिन इससे वित्तीय संरचना का पुनर्संतुलन होता है।
आयोग इस नजरिये से प्रभावित लगता है कि चौदहवें वित्त आयोग ने कर विभाजन को 32 फीसदी से बढ़ाकर 42 फीसदी करके राज्यों के प्रति अनावश्यक उदारता दिखाई। वह अपनी रिपोर्ट में इस बात को कई बार दोहराता है। विडंबना यह है कि आयोग कहीं इस बात को नहीं चिह्नित करता कि पुराने आयोगों के विपरीत चौदहवें आयोग को राज्यों की योजना और गैर योजना दोनों तरह के व्यय का ध्यान रखना था। उसे गाडगिल सूत्र अनुदानों को भी समाहित करना पड़ा था।
इसके अलावा, आयोग ने अलग-अलग क्षेत्र और राज्य विशिष्ट अनुदान देने से परहेज किया। 13वें आयोग ने पर्यावरण, सड़क और पुल, शासन, प्राथमिक शिक्षा और कई राज्य विशिष्ट अनुदानों के लिए अलग अनुदान की सिफारिश की थी। यदि हम केवल कर विकेंद्रीकरण, राजस्व घाटे अनुदान और समाहित गाडगिल सूत्र अनुदानों पर विचार करें, तो अंतर इतना भारी नहीं है।
केंद्र के सकल कर राजस्व में कर हस्तांतरण और राजस्व घाटा अनुदान का हिस्सा 38.5 फीसदी निकलता है, जो 13वें वित्त आयोग द्वारा दिए गए कर हस्तांतरण, राजस्व घाटा अनुदान और गाडगिल सूत्र अनुदानों से थोड़ा अधिक है। यह मामूली वृद्धि इसलिए है क्योंकि आयोग ने संघ को केवल जरूरी सेवाओं तक ही केंद्र प्रायोजित योजनाओं को सीमित करने को प्राथमिकता दी और राज्य सूची के कई क्षेत्रों में प्रवेश न करने को कहा।
यह हमें केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर 16वें आयोग के दृष्टिकोण तक ले जाता है। आयोग का कहना है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं ने राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? जैसा कि पहले उल्लेख किया गया, विशिष्ट उद्देश्य हस्तांतरण महत्त्वपूर्ण सेवाओं के न्यूनतम मानकों को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं। इनमें से कई योजनाएं केवल 1980 के दशक के मध्य से मौजूद 200 से अधिक योजनाओं का सरल संकलन हैं।
वास्तव में, पीवी नरसिंह राव समिति पहली कमिटी थी जिसने 1988 में योजनाओं के बहुतायत होने पर रिपोर्ट दी। ये योजनाएं अधिकांशतः उपकरों से वित्तपोषित होती हैं, जिससे विभाज्य पूल में कमी होती है। इसके अलावा, क्या कोई ऐसी योजना है जिसमें न्यूनतम मानक हासिल करने का उद्देश्य स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट हो? यहां तक कि सर्व शिक्षा अभियान में भी 42 अलग-अलग हस्तक्षेप हैं। नीति आयोग के 2017 में जारी एक्शन एजेंडा पत्र में कहा गया था कि केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में ही 2,000 बजट शीर्षक हैं।
सभी योजनाओं का प्रारंभिक आवंटन और अंतिम व्यय पैटर्न अत्यधिक भिन्न है। यहां तक कि मनरेगा (अब जी राम जी) में भी, तमिलनाडु जैसा कम गरीबी अनुपात वाला राज्य बिहार की तुलना में कहीं अधिक आवंटन प्राप्त करता है। यदि इन अहम सेवाओं के अनुदान न्यूनतम मानकों को हासिल करने के लिए डिजाइन और लागू नहीं किए जाते, तो उनसे किस आर्थिक उद्देश्य की अपेक्षा की जाती है?
(लेखक राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान के निदेशक और चौदहवें वित्त आयोग के सदस्य रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं)