भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा अधिग्रहण के लिए बैंक को कर्ज आवंटित करने की अनुमति दिए जाने बावजूद ऋणदाता इस पर सतर्कता से आगे बढ़ेंगे। आरबीआई द्वारा पिछले सप्ताह जारी किए गए अंतिम नियम 1 अप्रैल से लागू होंगे। लंबे समय से नियामक ने बैंकों को उधार देने के लिए यह क्षेत्र नहीं खोला था। मगर अब कई शर्तों और सुरक्षा उपाय के साथ बैंकों के लिए यह क्षेत्र भी खोल दिया गया है।
एक निजी बैंक के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा, ‘कोई पहले घुटनों के बल चलता है, फिर सीधा खड़े होकर चलता है और फिर दौड़ता है। कोई भी पहले दिन से दौड़ने के बारे में नहीं सोच रहा है।’ उन्होंने कहा, ‘बैंक क्षमताओं का परीक्षण करने के लिए छोटे अवसरों के साथ इसकी शुरुआत करेंगे। इसे 10 से 15 साल के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए जब बैंक अंततः बहुत बड़े अधिग्रहणों को कर्ज देने में सहज होंगे। मुझे नहीं लगता कि अगले 3-5 वर्षों में कोई भी बैंक बहुत साहसिक कदम उठाएगा।’
मसौदा नियमों में इसके लिए ऋण की सीमा टियर-1 पूंजी के 10 फीसदी पर सीमित थी मगर संशोधित नियमों में इसे बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया गया। हालांकि यह सुनिश्चित किया गया है कि किसी बड़े अधिग्रहण (अरबों डॉलर वाले) को ऋण न दिया जाए।
इसके अलावा भी कई उपाय किए गए हैं, जैसे कि कर्ज लेने के बाद कर्ज लेने वाली कंपनी का ऋण इक्विटी अनुपात 3:1 से अधिक नहीं होना चाहिए, न्यूनतम नेटवर्थ 500 करोड़ रुपये होना चाहिए और कर्ज लेने वाली कंपनी को लगातार तीन वर्षों तक शुद्ध लाभ में होना चाहिए। इसके साथ ही असूचीबद्ध कंपनियों के लिए निवेश ग्रेड रेटिंग होनी चाहिए।
ब्रोकिंग फर्म जेएम फाइनैंशियल ने एक नोट में कहा, ‘कर्ज-इक्विटी अनुपात और बैंकों के लिए पूंजी बाजार में निवेश की सीमा निर्धारित करने से, केवल मजबूत और स्थिर कंपनियों को ही बैंक अधिग्रहण के लिए कर्ज दे पाएंगे। इससे व्यवस्थागत जोखिम पर अंकुश लगेगा।
बैंक अधिग्रहण मूल्य के 75 फीसदी से अधिक कर्ज नहीं दे सकते हैं और अधिग्रहण करने वाली कंपनी शेष 25 फीसदी के लिए ब्रिज फाइनैंस का लाभ उठा सकती है। बैंकरों ने कहा कि यह प्रावधान यह सुनिश्चित करने के लिए जोड़ा गया था कि अधिग्रहणकर्ता के अपने धन की कमी के कारण अधिग्रहण बाधित न हो।
सरकारी बैंक के एक वरिष्ठ बैंकर ने कहा, ‘अंतिम नियम हमें कुछ लचीलापन देते हैं और इसका अधिकांश भाग विभिन्न बैंकों, जिनमें निजी बैंक भी शामिल हैं, द्वारा दिए गए सुझावों पर आधारित है। उम्मीद है, इससे बाजार का विस्तार होगा और भारतीय कंपनियों के लिए अधिक विकल्प होंगे।’
उन्होंने कहा, ‘बैंक धीरे-धीरे आगे बढ़ेंगे क्योंकि हमें पहले कुछ सौदों में सावधान रहना होगा। वैसे, अंतिम नियम अभी भी रूढ़िवादी हैं क्योंकि बैंक 20 फीसदी की सीमा की वजह से बड़े अधिग्रहण के लिए कर्ज नहीं दे पाएंगे। बैंकरों ने कहा कि वे शुरू में मध्यम और बड़ी कंपनियों के साथ इसकी शुरुआत करेंगे।
एक अन्य सरकारी बैंक के अधिकारी ने कहा, ‘इसमें इरादा एमएसएमई खंड में अधिग्रहण को बढ़ावा देने का लगता है। एमएसएमई अधिग्रहण आकार और जोखिम में अपेक्षाकृत अधिक प्रबंधनीय हैं।’ उन्होंने कहा कि बैंकों को आंतरिक विशेषज्ञता के लिए भी समय चाहिए क्योंकि वर्तमान में अधिकांश के पास अधिग्रहण के लिए ऋण मामले को देखने के लिए विशेष टीम नहीं है।