श्रीराम राघवन की ‘इक्कीस’ एक बेहतरीन फिल्म है, जो सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को समर्पित है। इसमें भारत के सबसे कम उम्र के इन परमवीर चक्र विजेता (पाकिस्तान के खिलाफ 1971 के युद्ध के लिए) की कहानी यह याद दिलाती है कि युद्ध में सिर्फ यही महत्त्वपूर्ण नहीं होता कि कौन जीता, बल्कि यह भी होता है कि उसमें क्या गंवाया।
हालांकि, ‘इक्कीस’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही, जबकि आदित्य धर की ‘धुरंधर’, जबरदस्त सफल रही, जो पाकिस्तान को खलनायक बनाकर बनाई गई एक आक्रामक जासूसी फिल्म है। इन दोनों फिल्मों और उनकी सफलता में जो अंतर है, वह इस साल की शुरुआत में फिल्म व्यवसाय पर जारी की गई दो रिपोर्टों के अंतर जैसा ही है।
ऑर्मैक्स मीडिया की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय बॉक्स ऑफिस ने पिछले वर्ष की तुलना में 13 फीसदी की वृद्धि दर्ज करते हुए लगभग 13,397 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया। यह अच्छी खबर है क्योंकि पिछले पांच वर्षों से यह लगभग 11,000 से 12,000 करोड़ रुपये के बीच ही अटका हुआ था।
यह रिपोर्ट केवल भारत में टिकटों की बिक्री से प्राप्त बॉक्स ऑफिस राजस्व पर आधारित है। स्ट्रीमिंग, टीवी, संगीत और विदेशी बॉक्स ऑफिस राजस्व को भी इसमें शामिल करें तो 2025 में भारतीय सिनेमा उद्योग का अनुमानित राजस्व लगभग 22,000 करोड़ रुपये था। टिकटों की बिक्री सिनेमा के राजस्व का 60 फीसदी से अधिक हिस्सा है, जो इसे व्यवसाय का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।
हालांकि, इस वृद्धि का अधिकांश हिस्सा टिकटों की औसत कीमत में 20 फीसदी की बढ़ोतरी से आया, न कि अधिक टिकटों की बिक्री से। वर्ष 2023 में 94.3 करोड़ टिकटों की उच्चतम बिक्री हुई थी जो 2025 में घटकर 83.2 करोड़ रह गई। ऑर्मैक्स द्वारा 2024 में किए गए अंतिम थिएटर सर्वेक्षण से पता चला कि 15.7 करोड़ भारतीय नियमित रूप से सिनेमाघरों में जाते हैं, यानी वे औसतन एक वर्ष में पांच फिल्में देखते हैं। इसका मतलब है कि एक अरब से अधिक भारतीय अभी भी सिनेमाघरों में नहीं जाते हैं। क्यों?
ज्यादातर लोग इसका कारण बताते हैं, ‘कॉन्टेंट’ यानी विषयवस्तु लेकिन यह कोई सही जवाब नहीं है। धुरंधर, स्त्री 2, जवान या कांतारा अ लीजेंड – चैप्टर 1 जैसी फिल्मों के लिए लाखों लोग सिनेमाघरों तक पहुंचे। एक ऐसे देश में जहां साल में 1,500-2,000 फिल्में बनती हैं, हर फिल्म दर्शकों को आकर्षित नहीं कर सकती। इसका कारण यह है कि भारतीयों के एक बड़े वर्ग के लिए कोई स्क्रीन उपलब्ध ही नहीं है।
लगभग 20 साल पहले, 24 करोड़ से अधिक लोग नियमित रूप से सिनेमाघरों में जाते थे। भारत में 1990 के दशक की शुरुआत में सिनेमाघरों की संख्या 12,000 थी। अब 9,000 से भी कम स्क्रीन रह गई हैं। दुनिया के सबसे बड़े फिल्म निर्माता देश में प्रति दस लाख लोगों के लिए केवल छह से कुछ अधिक स्क्रीन हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 109 और चीन में 64 है। अगर 15 करोड़ सिनेमा देखने वाले सभी लोगों ने धुरंधर फिल्म को बड़े पर्दे पर भी देखा हो, तो उस हिसाब से इसे देश की केवल 11 फीसदी आबादी ने ही देखा। भारत के 19,000 पिन कोड में से 16,350 में तो एक भी स्क्रीन नहीं है।
इनमें से कुछ आंकड़े ईवाई की रिपोर्ट ‘द स्टोरी ऑफ फिल्म एग्जिबिशन इन इंडिया’ से लिए गए हैं, जो नैशनल एसोसिएशन ऑफ फिल्म एग्जिबिटर्स इन इंडिया के लिए बनाई गई थी और फिल्म उद्योग की स्थिति पर दूसरी रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट उस बात की ओर इशारा करती है जो यह लेखिका और कई अन्य वर्षों से कहते आ रहे हैं – भारत के एक बड़े हिस्से में सिनेमाघरों की कोई पहुंच नहीं है। ये 16,350 पिन कोड उन पिन कोडों में नहीं आते जहां हम और आप रहते हैं और जहां बड़े मल्टीप्लेक्स आसानी से उपलब्ध हैं।
ये वे पिन कोड नहीं हैं जहां इंटरनेट की पूरी पहुंच हो और इंटरनेट की अधिक खपत करने वाले उपकरण बहुतायत में हों। ये वे स्थान हैं जहां मनोरंजन के अन्य साधन न होने के कारण लोग यूट्यूब पर पुराने वीडियो देखने के लिए साधारण स्मार्टफोन पर निर्भर हैं या फिर डीडी का फ्रीडिश कनेक्शन लेते हैं।
उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल को ही ले लीजिए। राज्य में सिनेमाघरों की संख्या 2000 के लगभग 400 से घटकर 2015 में 140 रह गई थी। एक स्थानीय स्टूडियो एसवीएफ (चोखेर बाली, रेनकोट आदि) बॉक्स ऑफिस राजस्व में गिरावट का सामना कर रहा था जिसने स्थिति को अपने हाथ में लेने का फैसला किया। उसने पश्चिम बंगाल के 23 जिलों का मानचित्रण किया और सिनेमाघरों का निर्माण, प्रबंधन या अधिग्रहण शुरू किया।
बोलपुर, पुरुलिया, कृष्णानगर, नरेंद्रपुर, बारुईपुर, जलपाईगुड़ी राज्य के उन 23 शहरों में से हैं जहां अब वह 53 सिनेमाघरों का प्रबंधन या स्वामित्व करता है, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 75 हो जाएंगे। सिनेमाघरों की संख्या अब लगभग 200 तक पहुंचने के साथ, पश्चिम बंगाल में कुल बॉक्स ऑफिस संग्रह में एसवीएफ की हिस्सेदारी दोगुनी हो गई है, यानी 10 फीसदी से कुछ कम से बढ़कर 20 फीसदी हो गई है। ये वे लोग हैं जो बड़े पर्दे पर फिल्में देखने के आनंद को फिर से खोज रहे हैं।
ईवाई की रिपोर्ट में कई अल्पकालिक उपायों का उल्लेख किया गया है, जैसे सिनेमाघरों को चौबीसों घंटे संचालित करने की अनुमति देना और 300 रुपये तक के टिकटों पर 5 फीसदी माल एवं सेवा कर लगाना। इससे टिकटों की बिक्री में काफी वृद्धि होगी, जैसा कि राष्ट्रीय सिनेमा दिवस जैसे आयोजनों से पता चलता है, जब देश भर में टिकटों की कीमतें कम कर दी जाती हैं। लेकिन दीर्घकालिक समाधान सिनेमाघरों का निर्माण करना ही है। यह एक पूंजी-प्रधान और लंबी प्रक्रिया वाला व्यवसाय है, जिसमें अनुमति प्राप्त करने की जटिल प्रक्रिया के कारण बड़ी से बड़ी कंपनियां भी परेशान हो जाती हैं।
एक दीर्घकालिक सुझाव यह है कि उन पिन कोडों यानी स्थानों में सिनेमाघरों को कर में छूट दी जाए जहां कोई सिनेमाघर नहीं है। सहस्राब्दी की शुरुआत में, महाराष्ट्र सरकार ने 10 साल की कर छूट दी थी। इसी से भारत में मल्टीप्लेक्स का तेजी से चलन शुरू हुआ। अधिक सिनेमाघर मतलब अधिक राजस्व, अधिक कर आय और अधिक रोजगार। ईवाई की रिपोर्ट का अनुमान है कि 20,000 सिनेमाघरों से वर्तमान में कार्यरत 1,38,000 लोगों के अलावा 1,25,000 अतिरिक्त लोगों को रोजगार मिलेगा।
भारतीय सिनेमा की वैश्विक स्तर पर सॉफ्ट पावर की खूब चर्चा हो रही है। लेकिन हॉलीवुड या कोरिया की तुलना में वैश्विक बाजार में हमारी उपस्थिति नगण्य है। सबसे आसान लक्ष्य देसी बाजार है। भारतीय फिल्म उद्योग वर्षों से 1.5 से 2 अरब डॉलर (लगभग 16,000 से 20,000 करोड़ रुपये) के स्तर पर ही अटका हुआ है। केवल 20,000 से 30,000 स्क्रीन और 5 से 10 अरब डॉलर (41,500 से 83,000 करोड़ रुपये) के बाजार आकार के साथ ही यह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर पाएगा।