चीन के साथ दुनिया भर की मझोली शक्तियां अपने आर्थिक रिश्तों का पुनर्परीक्षण कर रही हैं। कनाडा और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री तथा फ्रांस के राष्ट्रपति ने हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात की है और वे आपसी रिश्तों को नए सिरे से बहाल करने की उम्मीद कर रहे हैं। यूरोपीय समुदाय अपने बाजार को चीनी वस्तुओं के लिए खोलने के खतरे और चीनी कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला में शामिल रखने के बीच संतुलन कायम करने के लिए जूझ रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी कुछ सप्ताह बाद चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं और उस दौरान भी काफी कुछ घटित होने की उम्मीद है। इस संदर्भ में यह अहम है कि भारत भी एक बार फिर चीन के निवेश को लेकर अपनी मौजूदा रणनीति के लाभ-हानि का आकलन करे। अक्सर इस निवेश को 2020 में जारी किए गए प्रेस नोट 3 से जोड़कर देखा जाता है। उसके तहत कहा गया था कि भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले सभी देशों से आने वाले निवेश पर तमाम तरह के प्रतिबंध लागू रहेंगे। उनमें समय के साथ कुछ शिथिलता दे दी गई है। परंतु इस रियायत की तदर्थ प्रकृति के कारण यह संकेत निकलता है कि अब वक्त आ गया है कि इस क्षेत्र में देश की रणनीति की अधिक व्यापक समीक्षा की जाए।
सरकार ने यह दिखाया है कि वह कुछ कंपनियों और पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए शर्तों को शिथिल करने के लिए तैयार है। इसका एक बड़ा उदाहरण मोबाइल निर्माण है, विशेष रूप से वह विशाल नेटवर्क जिसमें उप ठेकेदार, कलपुर्जा आपूर्तिकर्ता और डिजाइन शॉप्स शामिल होते हैं, जो चीन के पर्ल रिवर डेल्टा में ऐपल इंक के हितों के इर्दगिर्द मौजूद हैं। जब ऐपल ने स्पष्ट कर दिया कि भारत में निर्माण की उसकी योजना तब तक संभव नहीं होगी जब तक कि उसके कई ठेकेदार चीन से उपलब्ध न हों, तो कथित तौर पर विभिन्न मामलों में नियमों को ढीला किया गया। लेकिन आगे की योजना यही नहीं हो सकती।
पहला कारण यह है कि सरकार आमतौर पर किसी विशेष उद्योग या उस उद्योग के भीतर कंपनियों के दीर्घकालिक विजेताओं को चुनने की सबसे अच्छी स्थिति में नहीं होती। दूसरा कारण यह है कि इससे किसी भी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनियों और छोटे उद्यमों के बीच बड़ा अंतर स्थापित हो जाता है। बड़ी कंपनियां छूट के लिए दबाव बना सकती हैं, जबकि छोटे उद्यम जो आर्थिक गतिशीलता प्रदान करते हैं, कार्यबल का बड़ा हिस्सा संभालते हैं, वे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाहर रहते हैं और नीति के कारण नुकसान में पड़ जाते हैं। नीति को इस तरह से नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे असुविधा में पड़ें।
पिछले चार वर्षों के अनुभव को देखते हुए प्रेस नोट 3 की व्यापक तार्किकता की भी जांच की जानी चाहिए। चीन से निवेश को बाहर करने का क्या अर्थ है? समस्या स्पष्ट रूप से चीन से आने वाली सरकारी पूंजी से है। लेकिन इसमें ताइवान और यहां तक कि हॉन्गकॉन्ग, जो एशिया में वैश्विक पूंजी के लिए एक प्रमुख कारोबारी केंद्र हैं, उनको क्यों शामिल किया जाना चाहिए? सिंगापुर, जो चीन की मुख्य भूमि से पूंजी को दुनिया तक पहुंचाता है, हांगकांग से कम खतरनाक कैसे है?
इसके अलावा, कौन यह बता सकता है कि गैर चीनी कंपनियां वास्तव में चीनी नहीं हैं? क्या चीनी कंपनियों की यूरोपीय सहायक कंपनियां, या चीनी पूंजी द्वारा आंशिक रूप से स्वामित्व वाली यूरोपीय कंपनियां, किसी भी तरह से कम खतरनाक मानी जाएंगी? ये सभी कठिन प्रश्न हैं और इनके जवाब अन्य देशों की पसंदों के साथ साथ भारत की नीतियों पर भी निर्भर करते हैं।
भारत अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए एक सुसंगत रणनीति विकसित करने में विशेष रूप से धीमा रहा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य देशों ने इस पर एक दशक तक काम किया है। यह आवश्यक है कि भारत उन विशिष्ट क्षेत्रों की पहचान करे जिन्हें वह रणनीतिक मानता है, और यह भी कि शत्रुतापूर्ण तत्त्व किन तरीकों से उन क्षेत्रों को कमजोर कर सकते हैं। संभावित शत्रुता की व्यापक समझ केवल जमीनी सीमा वाले पड़ोसियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। ऐसे निवेशों के लिए एक व्यापक नकारात्मक सूची अब अत्यधिक आवश्यक है।