अपने इस आलेख में मैं यह पड़ताल करने का प्रयास कर रहा हूं कि बीती कुछ सदियों के दौरान देश के विभिन्न सामजिक समूहों में जो अत्यधिक असमानता की स्थिति बनी थी उसमें सुधार हुआ है अथवा नहीं। सुनील गंगोपाध्याय को सन 1985 में उनके बांग्ला उपन्यास शेई सोमोए (वह समय) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उपन्यास की कथावस्तु 18वीं सदी के अंत से 19वीं सदी के उत्तराद्र्ध तक विस्तारित है। उनका उपन्यास बंगाल के अत्यधिक धनाढ्य जमींदारों के जीवन की पड़ताल करता है जो कोलकाता के आलीशान महलों में रहते थे और तमाम शहरी और खेती के इलाकों के मालिक थे। शेई सोमोए बहुत संवेदनशील तरीके से बताती है कि उस दौर में घरेलू नौकरों और किसानों की आय कितनी कम हुआ करती थी और तत्कालीन समृद्ध तबका अपने दैनिक जीवन में, शादी-विवाह में और शानोशौकत में किस कदर धन खर्च किया करता था। गंगोपाध्याय का यह उपन्यास इस बात की वस्तुनिष्ठ झलक पेश करता है कि पहले कोलकाता और उसके बाद भारत के बाकी हिस्से पर ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर ब्रिटिश शासन के कब्जे ने हिंदुओं और मुस्लिमों के आर्थिक और शैक्षणिक स्तर को किस प्रकार प्रभावित किया। मुस्लिमों ने इसे शासक के अपने दर्जे में गिरावट के रूप में देखा जबकि तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो हिंदुओं के बड़े तबके ने ब्रिटिश प्रभुता को अपनी बौद्धिक क्षमता में इजाफा करने, अंग्रेजी सीखने और अपनी आर्थिकी में सुधार करने के लिए इस्तेमाल किया। ब्रिटिशों के साथ भारत के उच्च वर्ग के संवाद ने विधवा पुनर्विवाह जैसे विषयों पर कुछ लोगों के रुख में बदलाव उत्पन्न किया और सीखने को लेकर उत्साह बढ़ा। बांग्ला भाषा में काफी कुछ नया लिखा गया। कुछ लोगों ने हिंदू पद्धतियों से दूर होकर ब्रह्म समाज का अनुयायी बनना स्वीकार किया। इनमें से कुछ के लिए यह पुरातनपंथी हिंदू व्यवहार के प्रति नफरत के कारण था तो साथ ही ब्रिटिशों की सेवा के रूप में बेहतर करियर विकल्प भी।
शेई सोमोए में बाल वधुओं तथा किशोर उम्र में उनकी मौत के जिक्र ने मुझे कैथरीन मेयो की किताब मदर इंडिया की याद दिला दी। कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने मेयो की किताब को एक नाली इंसपेक्टर का काम बताया था। महात्मा गांधी की प्रतिकूल टिप्पणी और शेई सोमोए के एक उपन्यास होने के बावजूद मेयो ने भारत में बाल वधुओं के विषय में जो लिखा उसमें काफी कुछ सच है।
देश के राजनीतिक प्रशासन की बात करें तो हालांकि शेई सोमोए के कथानक वाले सामंत समय की दो सदी बाद आज भी कई प्रमुख भारतीय राजनीतिक दलों में वंशवाद देखा जा सकता है। आश्चर्य की बात है कि इन वंशवादी नेताओं के पास अत्यधिक पढ़े लिखे चाटुकार सहायक हैं। इनमें से कई तो जानेमाने लेखक भी हैं। ऐसे लोग शायद उस विरोधाभास को नहीं देख पाते हैं जो उनकी बौद्धिक उपलब्धियों और सत्ताधारी लोगों के चापलूस होने में है।
कुछ लोकप्रिय हिंदी फिल्में भी ऐसे मसलों को उठाती हैं जो सामाजिक चिंता का विषय हैं। उदाहरण के लिए मदर इंडिया और गंगा जमुना फिल्में जो सन 1957 और 1961 में आईं, उनमें ग्रामीण भारत की गरीबी का चित्रण है। बहरहाल, इन फिल्मों ने समाज में प्रचलित व्यवहार की पुष्टि की। इसके मुताबिक गरीबों और सामाजिक रूप से वंचितों की हालत चाहे जितनी खस्ता हो उनके लिए प्रतिष्ठा की बात यही थी कि वे उन नियमों का पालन करें जिनकी स्थापना समाज में बेहतर स्थिति वाले लोगों ने की। कानून तोडऩे वालों को सजा भुगतनी पड़ती है जैसा गंगा जमुना में दिलीप कुमार और मदर इंडिया में सुनील दत्त को करना पड़ा। इसके उलट सन 2017 में आई हिंदी हास्य फिल्म न्यूटन ग्रामीण गरीबी का कहीं अधिक बेहतर चित्रण करती है और देश के दूरदराज इलाकों में मतदान प्रक्रिया कितनी विचित्र हो सकती है।
मौजूदा दौर की बात करें तो आए दिन महिलाओं और वंचितों के खिलाफ अत्याचार की खबरें बहुत परेशान करती हैं। उदाहरण के लिए मई 2014 में उत्तर प्रदेश के बदायूं में दो दलित बच्चियों को बलात्कार के बाद पेड़ से टांग देने की घटना हुई। करीब छह वर्ष बाद 14 सितंबर, 2020 को हाथरस में एक दलित युवती के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई। दोनों मामलों में पुलिस की जांच और न्याय प्रक्रिया विवादों में रही। अभी हाल में एक दुखद खबर यह आई कि गत 4 दिसंबर को नगालैंड में 14 लोग सेना के जवानों की गोलियों से मारे गए। भारतीय संविधान के अनुसार कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। केंद्र सरकार प्रशासनिक और खुफिया जानकारियों के रूप में मदद कर सकती है लेकिन कानून-व्यवस्था बहाल रखना राज्य की पुलिस का दायित्व है। व्यवहार में कई राज्य सरकारें इस दायित्व से बचती हैं। राज्यों को मुख्यमंत्रियों को उनके प्रांत में कानून व्यवस्था बरकरार रखने का जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और केंद्र सरकार को अक्सर सीबीआई जांच की मांग या सेना-अद्र्धसैनिक बलों की तैनाती के लिए राजी नहीं होना चाहिए।
महिलाओं पर हिंसा की बात करें तो 21 दिसंबर, 2021 को लोकसभा को एक विधेयक के रूप में संभावित उपयोगी पहल करते हुए लड़कियों की विवाह की आयु 21 वर्ष करने का प्रस्ताव रखा गया। हालांकि इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि महिलाओं का विवाह 21 वर्ष से कम आयु में होगा ही नहीं। अगर सरकार 21 वर्ष से कम आयु की युवतियों से विवाह करने वाले सरकारी कर्मचारियों या वेतनभोगी निजी कर्मचारियों पर नजर रखे तो ऐसे मामले कम हो सकते हैं। इस पहल का स्वागत आबादी नियंत्रण के उपाय के रूप में नहीं बल्कि महिलाओं को उच्च शिक्षा पूरी करने तथा वेतनभोगी रोजगार पाने का मौका देने के अवसर के रूप में किया जाना चाहिए।
शेई सोमोए की एक प्रमुख किरदार गंगा इसलिए ब्रह्म समाज में शामिल हो जाती है क्योंकि वह एक बाल विधवा बिंदु के साथ अमानवीय व्यवहार होते देखती है। इस बुद्धिमान बाल विधवा को पढऩे नहीं दिया जाता और काशी भेज दिया जाता है जहां उसका बलात्कार और शोषण होता है। मेरी सलाह है कि पाठकों को इस उपन्यास को पढऩा चाहिए ताकि वे समझ सकें कि 21वीं सदी के भारत में भी कैसे गरीबों का आर्थिक शोषण और धर्म आधारित भेदभाव हो रहा है। देश नए वर्ष में प्रवेश कर रहा है राजनीतिक विकल्पों की कमी के बावजूद हमें सामाजिक अन्याय के खिलाफ बोलना होगा और अवसरों की समानता को बढ़ावा देते हुए वंचित वर्ग को शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर सुनिश्चित कराने होंगे।
(लेखक भारत के पूर्व राजदूत एवं वर्तमान में सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के फेलो हैं)