पिछले कुछ दशकों में अच्छे निजी संस्थान भी खुले हैं, लेकिन सार्वजनिक और निजी दोनों विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। इस संबंध में बता रहे हैं अमरजीत सिन्हा
भारत में युवावर्ग गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा चाहता है ताकि उसे अच्छा रोजगार मिल सके। विश्वविद्यालयों में सकल नामांकन दर लगभग एक-तिहाई है और वर्ष 2030 तक इसके 50 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है। रुपया कमजोर होने के बावजूद विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का सपना बरकरार है। देश में ऐसे संस्थानों और पाठ्यक्रमों की कमी है जो बड़ी तादाद में लोगों को रोजगार योग्य, गुणवत्तापूर्ण अवसर दे सकें।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 कला और विज्ञान के बीच किसी तरह के भेद पर जोर नहीं देती है। इसके अलावा नई शिक्षा नीति में प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग के साथ-साथ कई भाषाओं पर जोर देने की भी बात की गई है। इसके अलावा इसमें जीवन कौशल, पूर्ण समानता एवं समावेश, बहु-विषयक, समग्र शिक्षा तथा उच्च शिक्षा के लिए एक सरल लेकिन सख्त नियामकीय ढांचे के लिए दिशानिर्देश दिए गए हैं। इस तरह की कोई नीति तभी अच्छी होती है जब विकेंद्रीकरण और प्रबंधन के माध्यम से संस्थानों पर इसका तत्काल प्रभाव पड़े।
उच्च शिक्षा से जुड़ी किसी भी रैंकिंग में अग्रणी स्थान ज्यादातर आईआईटी, आईआईएम, एम्स, नैशनल लॉ स्कूल और राज्य द्वारा स्थापित कई अन्य संस्थानों को मिलते हैं। पिछले कुछ दशकों में अच्छे निजी संस्थान भी सामने आए हैं, लेकिन सार्वजनिक और निजी दोनों विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।
सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती यह है कि अकादमिक जगत के सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविदों के पास ‘गैर-लाभकारी’ शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने के लिए पूंजी नहीं है (उन्नी कृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के फैसले में अदालत ने लाभकारी संस्थानों की अनुमति नहीं दी) और उन्हें बैंक ऋण भी नहीं मिल सकता है। वे केवल एक निजी भागीदार के साथ जुड़कर ऐसा कर सकते हैं जिसकी उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता कमजोर हो सकती है। निजी फंड तैयार करने वाले लोग, बाजार के दबाव से अछूते शिक्षाविदों के साथ कैसे गुणवत्तापूर्ण संस्थानों का निर्माण कर सकते हैं?
सबसे पहले, हमें उच्च शिक्षा से जुड़े विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को कंपनी अधिनियम के तहत लाभकारी संस्थानों के रूप में स्थापित करने की अनुमति देने की आवश्यकता है। नई नीति ने इस विषय पर चुप्पी साधे रखी है। यह अहम बात भी है क्योंकि गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की स्थापना के लिए शिक्षाविदों के पास संस्थागत वित्त उपलब्ध नहीं है और मुनाफे को इसी क्षेत्र में लगाने जैसी शर्तें हमेशा हो सकती हैं।
दूसरी अहम बात यह है कि कई राज्य सरकारें अमेरिका में भूमि अनुदान प्रणाली जैसी साझेदारी या हमारे अपने नैशनल लॉ स्कूल जैसे संस्थान बना सकती हैं। इन संस्थानों के बोर्ड में राज्य के मुख्य न्यायाधीश के बोर्ड अध्यक्ष होने के कारण राज्य, निर्माण के लिए भूमि और यहां तक कि पूंजी देकर भी खुश होते हैं।
सरकारी और निजी दानदाताओं से पूंजी निवेश करके कई संस्थान अपनी अकादमिक स्वायत्तता और उत्कृष्टता बनाए रखते हैं। यहां तक कि निजी क्षेत्र को रियायती भूमि दी जा सकती है, अगर वे भर्ती में पारदर्शिता बरकरार रखने के साथ ही संस्थान चलाने में अकादमिक मानकों के लिए एक विशेषतौर पर प्रतिबद्धता की गारंटी देते हैं।
तीसरी बात यह है कि किसी शैक्षणिक संस्थान की बड़ी इमारतें उत्कृष्टता सुनिश्चित नहीं कर सकती हैं बल्कि यहां काम करने वाले कर्मचारियों की वजह से इसमें बड़ा अंतर दिखता है।
नए आईआईटी और आईआईएम की तरह मार्गदर्शन करने वाले संस्थान बनाने के साथ ही आईआईटी की फैकल्टी को नए आईआईटी में जाने और नेतृत्व करने के लिए 10 साल की अनुमति देने की नीति काफी प्रभावी रही है। आईआईटी अधिनियम, 1961 और निदेशकों के चयन की परिभाषित प्रक्रिया ने इन संस्थानों को औसत दर्जे का बनाने से अछूता रखा है।
राज्यों में एम्स को उसी संस्थागत ढांचे का पालन करना चाहिए। आईआईटी अधिनियम को सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के केंद्र और राज्य संस्थानों के लिए एक समान प्रबंधन का आधार बनना चाहिए। आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता पाठ्यक्रम डिजाइन में लचीलापन और शिक्षकों के चयन में पारदर्शिता है।
चौथी अहम बात यह है कि हम चयन की प्रक्रिया से समझौता नहीं कर सकते। अकादमिक जगत के अनिवार्य कर्मचारियों एवं नेतृत्वकर्ताओं के लिए खोज एवं चयन समितियां हैं। लेकिन अकादमिक उत्कृष्टता केवल पूंजी के साथ सुनिश्चित नहीं की जा सकती है। एक बेहतर प्रधानाध्यापक और निदेशक संस्थान में बदलाव लाने में सक्षम होते हैं। साक्ष्य-आधारित अनुसंधान एवं ज्ञान की खोज के लिए बहस और असंतोष होना भी जरूरी है।
पांचवीं अहम बात यह है कि व्यावसायिक पाठ्यक्रम के प्रमाणपत्र या इंटर्नशिप/अप्रेंटिसशिप की पेशकश किए बिना हम बीए, बीएससी, बीकॉम के साथ जारी रखने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। मुख्यधारा के पाठ्यक्रमों को रोजगारपरक बनाना होगा। इंटर्नशिप के लिए प्रत्येक संस्थान में और अकादमिक-उद्योग इंटरफेस के लिए एक करियर विकास की आवश्यकता होती है।
छठी बात यह है कि औपचारिक पाठ्यक्रमों की तरह ही समान रूप से कुशलता पर जोर दिए जाने की तुरंत आवश्यकता है। यानी दो अहम पहलुओं को अलग करना ठीक नहीं है। आईटीआई, पॉलिटेक्निक, विश्वविद्यालयों को एक-दूसरे से सीखना होगा और वे जो भी पेशकश करते हैं उसमें उन्हें खुद को अद्यतन करते रहना होगा। उद्योग के साथ प्रशिक्षण से उच्च स्तर के रोजगार और आमदनी की राह तैयार हो सकती है।
सातवां बिंदु यह है कि शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों की राष्ट्रीय और विश्व स्तर पर आवश्यकता है। देश में झारखंड जैसे क्षेत्र हैं जहां देखभाल करने वालों की अच्छी परंपरा है। अधिक नर्सिंग संस्थान लोगों के जीवन और आजीविका में सुधार करेंगे। संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों और शिक्षकों के विकास पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
आठवीं अहम बात यह है कि रोजगार के लिए सभी कॉलेजों में नेट की पात्रता लागू की जानी चाहिए। व्यावसायिक अनुभव रखने वाले प्रोफेसरों को भी विश्वविद्यालयों से जोड़ने की आवश्यकता है जो कार्यस्थल पर गुणवत्ता में वृद्धि कर सकते हैं।
नौवीं जरूरी बात यह है कि विनियमन महत्त्वपूर्ण है लेकिन इससे उत्कृष्टता में बाधा नहीं आनी चाहिए। हालांकि प्रौद्योगिकी एक सीमित दृष्टिकोण मुहैया कर सकता है। हमें जिम्मेदारी के साथ स्वायत्तता को प्रोत्साहित करना चाहिए। इस वक्त स्वायत्त गुणवत्ता और मानक-स्थापित करने वाले निकायों की आवश्यकता है।
दसवीं जरूरी बात यह है कि थोड़े-थोड़े समाधान से हमें कहीं नहीं पहुंचेंगे। हम मुख्य चुनौतियों का समाधान नहीं करते हैं। प्रौद्योगिकी एक साधन है लेकिन यह अपने आप साध्य नहीं है। हमें प्रौद्योगिकी से लैस शिक्षा का विस्तार करने की आवश्यकता है लेकिन यह शिक्षकों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। प्रौद्योगिकी सक्षमता बढ़ाने और सुविधा देने का माध्यम है, खासतौर पर ऐसी स्थिति में जहां अच्छे शिक्षकों का आना मुश्किल है। शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी पूरी कवायद का अभिन्न अंग होना चाहिए।
समाज का कमजोर वर्ग और महिलाएं अब भी उच्च शिक्षा तक की पहुंच में पीछे हैं। उनकी भागीदारी बढ़ाने के सभी प्रयासों को मजबूती दी जानी चाहिए। रोजगार और शिक्षा आपस में जुड़े हुए हैं और इनका सुधारों के केंद्र में होना जरूरी है। विदेशी विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय संस्थानों के बीच तारतम्यता के जरिये व्यवस्था के मानदंडों को आसान बनाना, भारत के छात्रों को उत्कृष्ट बनाने के साथ ही बेहतर संभावनाओं से रूबरू कराने का सबसे अच्छा तरीका है।
(लेखक सेवानिवृत्त अफसरशाह हैं। ये विचार निजी हैं)