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सार्वजनिक उद्देश्य और लाभकारी संस्थाएं: नियमन में अगला चुनौती

बाजार अधोसंरचना ढांचे में नजर आने वाली विसंगतियों को दूर करना नियमन क्षेत्र की अगली बड़ी चुनौती है। विस्तार से बता रहे हैं केपी कृष्णन

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के पी कृष्णन   
Last Updated- March 02, 2026 | 9:50 PM IST

नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई)   आजकल खबरों में है क्योंकि वह आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) पेश करने वाला है। इसके बाद सूचीबद्ध एक्सचेंजों में तीन बड़े एक्सचेंज शामिल हो जाएंगे- एनएसई, बंबई स्टॉक एक्सचेंज(बीएसई) और मल्टी स्टॉक एक्सचेंज (एमसीएक्स)। मसौदा प्रतिभूति बाजार संहिता (एसएमसी) ने स्टॉक एक्सचेंजों के लिए बाजार अधोसंरचना संस्थानों (एमआईआई) के रूप में एक औपचारिक विधिक ढांचे का प्रस्ताव रखा है।

ऐसा लगता है कि एक्सचेंजों के स्वामित्व और शासन से जुड़े प्रश्न पूरी तरह सुलझ गए हैं। हालांकि ऐसा है नहीं। सूचीबद्ध एक्सचेंज कई प्रश्न उठाते हैं। इनमें से कुछ परिचालन और कार्य-नीति से संबंधित हैं जबकि कुछ अन्य रणनीतिक और नियामक भी हैं। आज हम जिन दुविधाओं का सामना कर रहे हैं, वे एमआईआई के प्रशासन से संबंधित हैं। ये अच्छे प्रश्न हैं, और निश्चित रूप से 1990 के दशक की शुरुआत और मध्य के अस्तित्वगत संकटों से बेहतर हैं। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हम यहां तक कैसे पहुंचे? क्योंकि एक्सचेंजों का स्वामित्व और प्रशासन इक्विटी बाजार के बड़े सुधारों का एक केंद्रीय मुद्दा था।

एक्सचेंज की तीन विशेषताएं प्रमुख रूप से सामने आती हैं। पहला, एक्सचेंज सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) प्रणालियों का एक समूह है, जो प्रति सेकंड हजारों आदेशों को संसाधित करता है। इसे चलाने के लिए एक आधुनिक तकनीकी-सक्षम संगठन की आवश्यकता होती है, जिसमें आधुनिक भारतीय प्रबंधन पद्धतियां हों, जैसे कि क्षतिपूर्ति से जुड़े प्रश्नों पर।

दूसरा, एक्सचेंज एक अग्रिम पंक्ति का नियामक और नियमों का प्रवर्तक है। जैसे-जैसे लेन-देन होता है, केवल एक्सचेंज ही यह देखने की क्षमता रखता है कि क्या हो रहा है, ताकि किसी भी गड़बड़ी की पहचान कर उसे रोक सके, और नियमों के अनुपालन की मांग कर सके। तीसरा, एक्सचेंज स्वाभावित रूप से एकाधिकार वाली प्रकृति का होता है और इसमें उच्च-गुणवत्ता वाली सेवाएं देने के लिए सामान्य बाजार-आधारित प्रोत्साहनों का अभाव रहता है।

भारतीय इक्विटी बाजार की शुरुआत में केवल बीएसई था। इसे दलालों (ब्रोकर्स) द्वारा प्रबंधित और उनके स्वामित्व में रखा गया था। इससे हितों का टकराव उत्पन्न हुआ। जाहिर है दलाल-प्रबंधक दलालों के प्रति उदार रहने की प्रवृत्ति रखते थे। इसका परिणाम अच्छा नहीं रहा। तत्कालीन सुधारकों ने समझा कि समाधान एक नए एक्सचेंज (एनएसई) में निहित है, जिसकी स्वामित्व संरचना में प्रोत्साहन सही ढंग से शामिल हों।

पुराने एनएसई में तीन बड़े विचार थे। पहला, इसे असाधारण व्यक्तियों ने नेतृत्व दिया, जिन पर नियामक कार्य अच्छे से करने का भरोसा किया जा सकता था। मैं मानता हूं कि आधुनिक दुनिया में यह कुछ पुराना-सा लगता है, और अच्छे व्यक्तियों पर आधारित उपलब्धियां लंबे समय तक नहीं टिकतीं। लेकिन यह नकारा नहीं जा सकता कि एनएसई का नेतृत्व करने वाले प्रमुख व्यक्तियों ने इस आशावाद को जन्म दिया कि एक्सचेंज नियामक कार्यों में अच्छा करेगा।

दूसरा, दलालों के पास एनएसई में कोई हिस्सेदारी नहीं थी। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिली कि नियमों को दलालों के खिलाफ भी लागू किया जाएगा। अंततः एनएसई के शेयरधारक बड़े संस्थागत निवेशक थे, जिन्हें गहरे और तरल भारतीय इक्विटी बाज़ार से सबसे अधिक लाभ मिलना था। वित्त मंत्रालय ने इन शेयरधारकों को एनएसई की स्थापना और स्वामित्व की ओर धीरे-धीरे प्रेरित किया था। इससे एनएसई के शेयरधारकों के प्रोत्साहन एनएसई के मिशन ( यानी भारत के लिए गहरा और तरल बाजार, जिसके सबसे बड़े लाभार्थी बड़े संस्थागत वित्तीय खिलाड़ी थे) के साथ संरेखित हुए, न कि लाभांश या मूल्यांकन के साथ।

इस सफर में अब हम कहां हैं? पिछले दशक में दो बड़ी बातें हुई हैं। पहली बात, एक्सचेंज धीरे-धीरे एक साधारण लाभोन्मुखी कंपनी बन गया है, जिसमें सार्वजनिक हित की भूमिका कम होती गई है। दूसरी, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक्सचेंज का सही मायनों में राष्ट्रीयकरण कर लिया है, जिसके तहत नियामक को नियुक्तियों, बोर्ड और एक्सचेंजों के उत्पादों/प्रक्रियाओं पर अत्यधिक नियंत्रण प्राप्त है।

परिणामस्वरूप हमारे पास एकाधिकारवादी और अत्यधिक लाभदायक संगठन है, जो लाभ कमाने के उद्देश्य से काम करता है, जबकि सेबी का दखल भी अत्यधिक है। यह एक अजीब नई स्थिति है, जिसकी कल्पना बीस साल पहले एक्सचेंजों पर विचार करने वाले किसी भी चिंतक ने नहीं की थी। जब पहले एक्सचेंज की सूचीबद्धता (एमसीएक्स) पर बहस हो रही थी, तब इस पर काफी विचार हुआ था, लेकिन यह वित्तीय क्षेत्र सुधार की तेजी के साथ ही धीमा पड़ गया।

लाभ की प्रेरणा को नवाचार के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन हमें नवाचार नहीं मिलता क्योंकि नियामक एक केंद्रीय योजनाकार की तरह काम करता है, जो उत्पादों या प्रक्रियाओं के सभी पहलुओं और यहां तक कि वरिष्ठ प्रबंधकों के नामों को भी नियंत्रित करता है। एकाधिकारवादी प्रकृति अधिक लाभ पैदा करती है और नवाचार की आवश्यकता को समाप्त कर देती है। यह सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे खराब सुस्ती को जन्म देती है। लाभ की प्रेरणा प्रबंधन को राजस्व अधिकतम करने का प्रोत्साहन देती है, जो नियामक कार्यों में खराब या सीधे हानिकारक व्यवहार की स्थितियां पैदा करती है। जब दुराचार के कारण बाजार में भारी उथल-पुथल होती है, तो कारोबारी वॉल्यूम बढ़ जाते हैं, जिससे एक्सचेंज के राजस्व और लाभ में वृद्धि होती है।

नियामक का एक्सचेंज पर अत्यधिक नियंत्रण स्वयं नियामक प्रक्रिया को कमजोर करता है। जब सेबी एनएसई के संचालन में गहराई से शामिल होता है, तो उसके लिए नियम बनाने और उन्हें लागू करने में निष्पक्ष रूप से सोचना कठिन हो जाता है। मूल रूप से, हम फिर से उसी स्वामी-प्रबंधक-नियामक के मिश्रण पर लौट आए हैं, जैसा कि पहले सरकार के दूरसंचार विभाग या रिजर्व बैंक में देखा गया था, जो कि नेगोशिएटेड डीलिंग सिस्टम-ऑर्डर मैचिंग (एनडीएस-ओएम) सरकारी प्रतिभूतियों के कारोबारी प्लेटफॉर्म का स्वामी और नियामक दोनों है।

इस गड़बड़ी से कैसे निकला जा सकता है? इसके लिए तीन चीजों की आवश्यकता है। पहला तत्त्व इस बात में निहित है कि एमआईआई का स्वामित्व बड़े वित्तीय संस्थानों के हाथों में लौटाया जाए, जिन्हें वे इसे अपने हित के रूप में देखें। यानी एक गहरे और नकदीकृत बाजार के रूप में न कि लाभांश या मूल्यांकन के स्रोत के रूप में।

दूसरा तत्व इस बात में निहित है कि स्वामित्व और बोर्ड संरचना ऐसे नियम स्थापित करे जिनके तहत नियमित मूल्य कटौती हो, ताकि असामान्य लाभ समाप्त हो जाएं, और एक्सचेंज अपने वर्तमान 60 फीसदी कर-पश्चात लाभ (पीएटी) मार्जिन से घटकर सामान्य भारतीय पीएटी मार्जिन 6 फीसदी पर आ जाए। इसमें बड़े पैमाने पर मूल्य कटौती शामिल होगी, जिससे एक्सचेंज के सभी उपयोगकर्ताओं को लाभ होगा, विशेषकर बड़े संस्थागत निवेशकों को।

तीसरा तत्त्व इस बात में निहित है कि सेबी केवल नियामक भूमिका तक सीमित रहे और एक्सचेंजों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र शैली के मिश्रण में न उलझे। इस स्थिति तक वापस पहुंचना आसान नहीं है। वहां तक पहुंचने के लिए जटिल और क्रमिक कदम उठाने होंगे। लेकिन वर्तमान व्यवस्था की समस्याओं से भागा नहीं जा सकता।


(लेखक आइजैक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में मानद वरिष्ठ फेलो और पूर्व अफसरशाह हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : March 2, 2026 | 9:45 PM IST