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कपड़ा उद्योग पर युद्ध की मार: पश्चिम एशिया के ऑर्डर अटके, तिरुपुर और सूरत के निर्यातकों की बढ़ी चिंता

पश्चिम एशिया को होने वाले कुल निर्यात में से 8 प्रतिशत से अधिक यानी 5,403 करोड़ रुपये का निर्यात पिछले वित्त वर्ष में संयुक्त अरब अमीरात को किया गया था

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शाइन जेकब   
Last Updated- March 02, 2026 | 11:12 PM IST

कपड़ा उद्योग के प्रतिनिधियों ने कहा कि पश्चिम एशिया के लिए उनके निर्यात पहले से ही भारतीय बंदरगाहों पर अटके हुए हैं, जबकि प्रमुख ग्राहकों ने संकट खत्म होने तक ऑर्डर होल्ड पर रख दिए हैं। यह क्षेत्र भारतीय निटवियर उद्योग का तीसरा सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। इसकी वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 65,179 करोड़ रुपये के निर्यात में से 11 प्रतिशत यानी 6,980 करोड़ रुपये की हिस्सेदारी रही। पश्चिम एशिया को होने वाले कुल निर्यात में से 8 प्रतिशत से अधिक यानी 5,403 करोड़ रुपये का निर्यात पिछले वित्त वर्ष में संयुक्त अरब अमीरात को किया गया था।

बाइंग एजेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और एसएनक्यूएस इंटरनैशनल्स के प्रबंध निदेशक ईलंगोवन विश्वनाथन ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संकट का कपड़ा उद्योग पर असर पड़ा है क्योंकि जहाज बंदरगाहों के बाहर खड़े हैं। ग्राहकों ने हमें फिलहाल शिपमेंट न करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि निटवियर हब तिरुपुर के लिए अमेरिका के बाद यूएई दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। ऐसा इसलिए कि हम इसे अफ्रीका, रूस और अन्य कई क्षेत्रों के लिए डेस्टिनेशन हब के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

अब ये सभी ऑर्डर अटके हुए हैं। तिरुपुर से इस क्षेत्र के लिए अधिकांश शिपमेंट कोचीन बंदरगाह से जाती है। तिरुपुर के प्रमुख ग्राहक कथित तौर पर अपैरल ग्रुप लैंडमार्क और अलशाया ग्रुप हैं। यह स्थिति ऐसे समय में आई है जब तिरुपुर पहले ही इस वर्ष अब तक अमेरिकी टैरिफ बढ़ने के कारण 15,000 करोड़ रुपये के दबाव का सामना कर रहा है। दुबई का उदाहरण लें। यह केवल एक खरीदार भर नहीं है, बल्कि 40 से अधिक क्षेत्रीय बाजारों तक भारतीय कपड़ा उत्पादों को पहुंचाने वाला एक पुनर्वितरण (री-डिस्ट्रिब्यूशन) हब भी है। इसलिए खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता ऑर्डर प्रवाह की निरंतरता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के अनुसार तात्कालिक जोखिम निर्यात के अचानक रुक जाने का नहीं, बल्कि मुनाफे पर दबाव का है।

ट्राइटन लॉजिस्टिक्स एंड मैरीटाइम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जितेंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि कपड़ा निर्यातक बेहद सीमित मूल्य संरचना पर काम करते हैं। यदि होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते समुद्री जोखिम बढ़ने से बीमा प्रीमियम या माल भाड़ा दरों में अस्थिरता आती है तो लागत में मामूली वृद्धि भी प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर कर सकती है। भारी उद्योग के विपरीत कपड़ा क्षेत्र लॉजिस्टिक्स लागत में अचानक उछाल को आसानी से समाहित नहीं कर सकता। मांग भी संवेदनशील है। परिधान विवेकाधीन श्रेणी में आते हैं।

यदि भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और खाड़ी बाजारों में आर्थिक अनिश्चितता जारी रहती है तो ऑर्डर चक्र धीमे पड़ सकते हैं और भुगतान की समयसीमा बढ़ सकती है।

उन्होंने कहा, ‘सबसे अहम कारक संकट की अवधि है। अल्पकालिक व्यवधान से माल भाड़ा दरों में अस्थायी उतार-चढ़ाव आता है, लेकिन लंबी अवधि की अस्थिरता खरीदारों के व्यवहार और इन्वेंटरी योजना को बदल देती है। सूरत जैसे निर्यात क्लस्टरों के लिए पश्चिम

एशिया कोई वैकल्पिक बाजार नहीं है, बल्कि यह उनके वितरण मॉडल का अभिन्न हिस्सा है। क्षेत्र में स्थिरता सीधे तौर पर कपड़ा क्षेत्र के नकदी प्रवाह, मार्जिन और ऑर्डर स्पष्टता को प्रभावित करती है।’ चालू वित्त वर्ष के दौरान भारत ने लगभग 45,210 करोड़ रुपये के निटवियर का निर्यात किया है।

इसमें से 33 प्रतिशत यानी 14,805 करोड़ रुपये का निर्यात अमेरिका को हुआ, जबकि 30 प्रतिशत यानी 13,511 करोड़ रुपये का निर्यात यूनाइटेड किंगडम को किया गया। यूएई ने निर्यात में 9 प्रतिशत यानी 4,165 करोड़ रुपये के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। अन्य पश्चिम एशियाई देशों का योगदान इस वित्त वर्ष में अब तक लगभग 889 करोड़ रुपये या 2 प्रतिशत रहा है।

First Published : March 2, 2026 | 11:12 PM IST