प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और निवेशकों के सुरक्षित संपत्तियों की ओर जाने से सेंसेक्स आज कारोबार के दौरान करीब 3 फीसदी टूटकर 6 महीने के निचले स्तर पर आ गया था। बाद में बाजार ने निचले स्तर से जोरदार वापसी की मगर खाड़ी के कई देशों में ताजा धमाकों की खबरों से माहौल कमजोर बना रहा और बाजार नुकसान से उबर नहीं पाया।
बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का सेंसेक्स कारोबार के दौरान 78,544 अंक के निचले स्तर तक लुढ़कने के बाद कारोबार की समाप्ति पर 1,048 अंक या 1.3 फीसदी नुकसान के साथ 80,239 पर बंद हुआ। यह सेंसेक्स का 2 सितंबर, 2025 के बाद सबसे निचला बंद स्तर है। निफ्टी भी 313 अंक या 1.2 फीसदी की गिरावट के साथ 24,866 पर बंद हुआ। बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण 6.6 लाख करोड़ रुपये घटकर 456.9 लाख करोड़ रुपये रह गया।
डॉलर के मुकाबले रुपया में भी 21 जनवरी के बाद एक दिन में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। रुपया 0.54 फीसदी गिरावट के साथ 91.48 प्रति डॉलर पर बंद हुआ जो शुक्रवार को 90.99 पर बंद हुआ था। चालू वित्त वर्ष में रुपये में 6.57 फीसदी की नरमी आ चुकी है और इस साल यह 1.75 फीसदी लुढ़क चुका है। 10 वर्षीय बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड थोड़ी बढ़कर 6.68 फीसदी रही जबकि पिछला बंद स्तर 6.66 फीसदी था।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 3,300 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की। घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 8,594 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे जिससे गिरावट पर थोड़ा लगाम लगा।
ब्रेंट क्रूड का दाम 10 फीसदी तक बढ़कर 82 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। ईरान द्वारा जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट होकर गुजरने से रोकने की चेतावनी देने के बाद प्राकृतिक गैस की कीमतें 25 फीसदी तक बढ़ गईंं। होर्मुज के जरिये दुनिया भर में करीब 20 फीसदी तेल एवं गैस की आवाजाही होती है। ज्यादा एशियाई बाजारों के सूचकांक 1 फीसदी की गिरावट पर बंद हुए। यूरोप के बाजार भी 2 फीसदी गिरावट पर कारोबार कर रहे थे। विश्लेषकों ने आगाह किया कि कच्चे तेल में लगातार तेजी से भारत का वृहद आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने, दर कटौती में देर होने और खपत मांग घटने का जोखिम है।
एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज के शोध प्रमुख और रणनीतिकार शेषाद्रि सेन ने कहा, ‘भारत के लिए तेल की ज्यादा कीमतों का मतलब रुपये पर दबाव, चालू खाते का घाटा और विदेशी निवेशकों के बाहर निकलने का जोखिम है।’
उन्होंने कहा, ‘अगर यह टकराव 1-2 हफ्ते तक ही सीमित रहता है तो स्थिति स्पष्ट होने पर बाजार तेजी से ऊपर उठ सकता है, जैसा कि पहले के भू-राजनीतिक झटकों के दौरान हुआ था। मगर संघर्ष लंबे समय तक चला तो वृहद आर्थिक स्थिति और कमाई पर जोखिम काफी बढ़ जाएगा।’
तेल के दाम के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में बिकवाली का सबसे ज्यादा दबाव दिखा। इंडिगो की प्रवर्तक कंपनी इंटरग्लोब एविएशन का शेयर 6 फीसदी से ज्यादा टूट गया और निफ्टी में इसका प्रदर्शन सबसे खराब रहा। पश्चिम एशिया में ज्यादा निवेश और कारोबार वाली इंजीनियरिंग की बड़ी कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो में 5 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई। रिलायंस इंडस्ट्रीज 2.6 फीसदी नीचे बंद हुआ।
ऐक्सिस म्युचुअल फंड ने एक नोट में कहा, ‘भारत अपने कच्चे तेल की जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा आयात करता है। इसलिए यह पश्चिम एशिया की अस्थिरता को लेकर बहुत चिंतित है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से उत्पादन लागत बढ़ती है, चालू खाते का घाटा और महंगाई बढ़ती है। शेयर बाजार भी इस पर तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं।’
धातु और फार्मा को छोड़कर निफ्टी के सभी क्षेत्रीय सूचकांक नुकसान में बंद हुए। बाजार में उठापटक मापने वाला सूचकांक इंडिया वीआईएक्स 25 फीसदी बढ़कर 17.1 पर पहुंच गया जो 9 महीने का उच्चतम स्तर है। इससे बाजार में अत्यधिक घबराहट का पता चलता है।