पिछले हफ्ते से अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ठिकानों पर मिलकर हमले शुरू किए जिसके जवाब में ईरान ने भी खाड़ी इलाके में जवाबी कार्रवाई की। इस झड़प में इस्तेमाल हो रहे हथियारों से लगता है कि सेनाएं जो सामान कैसे बना रही हैं और इस्तेमाल कर रही हैं, उसमें बड़ा बदलाव आ रहा है। अमेरिकी फौज ने महंगे और सस्ते दोनों तरह के हथियारों को मिलाकर इस्तेमाल किया, जिसमें स्टेल्थ लड़ाकू विमान से लेकर एक बार इस्तेमाल होने वाले ड्रोन तक शामिल हैं। इन हमलों से पता चला कि पुरानी डिफेंस फैक्टरियां अब काफी नहीं हैं, और युद्ध के समय उत्पादन की नई जरूरतें सामने आ रही हैं।
ईरान पर हमलों में इस्तेमाल हुए आधुनिक हथियार
28 फरवरी से शुरू हुए इन हमलों में अमेरिका और इजरायल ने बेहद आधुनिक और महंगे हथियारों का इस्तेमाल किया। स्टेल्थ लड़ाकू विमान जैसे F-35 और लंबी दूरी की टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें इस अभियान का अहम हिस्सा रहीं। यह तरीका उस पुरानी ‘शॉक एंड ऑ’ रणनीति जैसा है, जिसमें दुश्मन पर तेज और जोरदार हमला किया जाता है।
एक टॉमहॉक मिसाइल की कीमत करीब 20 लाख डॉलर होती है। वहीं F-35 लड़ाकू विमान 8 करोड़ 20 लाख डॉलर से ज्यादा का आता है। अगर F-22 जैसे टॉप फाइटर जेट की बात करें तो उसकी कीमत 30 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाती है। इसके अलावा मिसाइल रोकने वाला सिस्टम थाड भी इस्तेमाल होता है, जिसकी एक यूनिट करीब 1 करोड़ 30 लाख डॉलर की है। इन सबको जोड़ें तो ऐसे ऑपरेशन पर कुल खर्च आसानी से अरबों डॉलर तक पहुंच सकता है।
महंगे जेट और मिसाइलों के साथ-साथ अमेरिका ने इस बार पहली बार सस्ते, एक तरफा हमला करने वाले ड्रोन भी उतारे। लो-कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट अटैक सिस्टम (लुकास) नाम के ये ड्रोन ईरान के शहीद-136 की तर्ज पर बनाए गए हैं और एक ड्रोन की कीमत करीब 35 हजार डॉलर है।
इनकी खास बात यह है कि इन्हें बड़ी संख्या में तेजी से तैयार किया जा सकता है। मिडिल ईस्ट में हुए हमलों में इन्हें टॉमहॉक मिसाइलों और पायलट वाले जेट्स के साथ इस्तेमाल किया गया। ये ड्रोन “सैचुरेशन टैक्टिक्स” के लिए बनाए गए हैं, यानी एक साथ इतनी बड़ी तादाद में हमला करो कि दुश्मन का एयर डिफेंस सिस्टम संभाल न पाए और खत्म हो जाए।
सस्ते ड्रोन अब सेना की फैक्टरियों का अहम हिस्सा
महंगे हथियारों पर ही भरोसा करने के बजाय अब सस्ते ड्रोन पर जोर देना पुरानी रक्षा खरीद नीति से अलग कदम है। पहले सेनाएं कम संख्या में लेकिन बेहद उन्नत और महंगे सिस्टम खरीदती थीं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस सोच को और बदल दिया है।
यूक्रेन में शाहेद और फर्स्ट-पर्सन-व्यू (FPV) जैसे ड्रोन ने लड़ाई का तरीका ही बदल दिया। यूक्रेनी सेना को हर दिन सैकड़ों अनमैन्ड सिस्टम का सामना करना पड़ता है। इन सस्ते ड्रोन की बड़ी तादाद ने टैंकों की मूवमेंट से लेकर एयर डिफेंस की रणनीति तक सब पर असर डाला है, और इससे हथियारों के उत्पादन का फोकस भी बदला है।
यूक्रेन ने खुद भी बड़े पैमाने पर ड्रोन बनाना शुरू कर दिया है। इस साल उसने ब्रिटेन में एक सैन्य उत्पादन प्लांट खोला, ताकि युद्ध क्षेत्र से दूर रहकर निर्माण जारी रखा जा सके। वहां की डिफेंस इंडस्ट्री अब अरबों डॉलर की हो चुकी है और युद्ध के दौरान देश की आधी जरूरतें खुद पूरी कर रही है। यह रुझान दिखाता है कि सस्ते और बड़े पैमाने पर बनने वाले सिस्टम अब मामूली नहीं रहे, बल्कि आधुनिक युद्ध में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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पहले मिले सबक कैसे फैक्टरियों को बदल रहे
यूक्रेन की जंग ने सेनाओं और रक्षा कंपनियों को अपनी उत्पादन प्राथमिकताएं फिर से तय करने पर मजबूर कर दिया है। अब हालात ऐसे हैं कि हजारों सस्ते ड्रोन, जिनमें कुछ की कीमत सिर्फ सैकड़ों डॉलर है, आसमान में लगातार इस्तेमाल हो रहे हैं। इसकी वजह से पहले जहां फोकस महंगी मिसाइलों और लड़ाकू विमानों पर था, वह सोच धीरे-धीरे बदल रही है।
दूसरी तरफ, भारत का पिछले साल का ऑपरेशन सिंदूर भी एक उदाहरण माना जा रहा है। यह एक प्रिसिजन स्ट्राइक अभियान था, जिसमें बिना जमीनी घुसपैठ के मिसाइलों और हवाई प्लेटफॉर्म्स के जरिए लक्ष्य साधे गए। इस तरह के मॉडल में सटीक हमलों और सीमित कार्रवाई पर जोर होता है। इससे रक्षा उद्योग पर दबाव बढ़ता है कि वह बड़ी संख्या में गाइडेड हथियार और एडवांस्ड इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रेकॉनिसेंस सिस्टम तैयार करे, ताकि भारी-भरकम फौजी तैनाती पर निर्भरता कम की जा सके।
क्या डिफेंस फैक्टरियां लंबी जंगों के लिए तैयार हो रही हैं
जैसे-जैसे जंगें बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे डिफेंस इंडस्ट्री और सरकारें भी तेजी से कदम उठा रही हैं। अमेरिका ने टास्क फोर्स स्कॉर्पियन स्ट्राइक जैसी खास यूनिट बनाई है, जिसका फोकस सस्ते और ऑटोनॉमस हथियार सिस्टम तैयार करने और उन्हें जल्दी मैदान में उतारने पर है। इसके अलावा खरीद प्रक्रिया में भी बदलाव किए गए हैं। एक्जीक्यूटिव फैसलों के जरिए डिफेंस एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग के नियम आसान किए जा रहे हैं, ताकि बड़े स्तर पर उत्पादन को बढ़ावा मिल सके।
यूरोप में भी अब आयातित हथियारों पर निर्भरता को लेकर चिंता बढ़ी है। इसलिए वहां खास तौर पर एडवांस्ड हथियारों और ड्रोन के घरेलू उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। वहीं, यूक्रेन का विदेश में फैक्टरी खोलना यह दिखाता है कि अब रक्षा उत्पादन का मॉडल बदल रहा है। फैक्टरियां सिर्फ शांति के समय की पुरानी व्यवस्था पर नहीं चलेंगी, बल्कि जंग की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अलग-अलग जगहों पर तैयार की जाएंगी।
युद्ध के मैदानों का आने वाला कल
चल रही जंगों से डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में तीन बड़े बदलाव साफ दिख रहे हैं। पहला, अब सस्ते और बड़ी संख्या में बनने वाले ड्रोन और लॉइटरिंग म्यूनिशन सेना के स्टॉक का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। ये महंगे जेट और मिसाइलों के साथ मिलकर काम करते हैं।
दूसरा, सहयोगी देशों में फैक्टरियां लगाने का चलन बढ़ सकता है, ताकि अगर किसी देश के अपने इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला हो जाए तो उत्पादन न रुके। तीसरा, खरीद प्रक्रिया में सुधार किए जा रहे हैं ताकि हथियारों की खरीद और तैनाती तेज हो सके, और ऐसे सिस्टम जल्दी तैयार हों जिन्हें बड़ी संख्या में इस्तेमाल किया जा सके।
कुल मिलाकर, आधुनिक युद्ध रक्षा उद्योग की सोच बदल रहा है। अब फोकस सिर्फ कुछ बेहद महंगे प्लेटफॉर्म बनाने पर नहीं है, बल्कि ऐसे अनमैन्ड सिस्टम, मॉड्यूलर डिजाइन और कम लागत वाले हथियार तैयार करने पर है, जिन्हें लंबी और खिंचने वाली जंग में लगातार इस्तेमाल किया जा सके।
First Published : March 3, 2026 | 5:03 PM IST