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MSME की उड़ान पर न लगे ब्रेक: नियमन में ढील से ज्यादा, बेहतर गवर्नेंस और प्रोत्साहन की जरूरत

एमएसएमई को केवल छूट नहीं, बल्कि विस्तार के लिए बेहतर गवर्नेंस और सरल डिजिटल प्रक्रियाओं की जरूरत है, ताकि वे स्टार्टअप्स की तरह तेजी से विकास कर सकें

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रमा बिजापुरकर   
Last Updated- March 01, 2026 | 10:10 PM IST

मीडिया एवं पेशेवर संगठनों द्वारा सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग (एमएसएमई) से संबंधित गैर-वित्तीय नियामकीय सुधार से जुड़ी उच्चस्तरीय समिति की कुछ सिफारिशों की व्यापक चर्चा हुई है। ये सिफारिशें कुछ हद तक स्वागतयोग्य और कुछ हद तक चिंताजनक हैं। किसी भी प्रयास से यदि प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए, समय, लागत कम करने के साथ ही नियमन एवं अनुपालन में खर्च होने वाली मानवीय ऊर्जा को बचाया जाए, तब यह स्वागतयोग्य है। लेकिन, यदि ऐसा कुछ भी हो जो छोटे कारोबार की वृद्धि की इच्छा या क्षमता पर अंकुश लगाने वाला हो तब यह चिंताजनक है।   

एमएसएमई को मजबूत और परिस्थितियों के अनुकूल अधिक लचीला बनाने के लिए उन्हें तेजी से राजस्व बढ़ाने और निवेश के लिए जरूरी अधिशेष तैयार करने तथा ऋण लेने को प्रोत्साहित करने के साथ ही और काबिल बनाने की जरूरत है ताकि वे ग्राहकों को जोड़ सकें, उत्पादकता और दक्षता बढ़ाने वाले साधनों को हासिल कर सकें और उच्च मूल्य श्रेणियों में प्रवेश करने के साथ ही बाजार में नई पेशकश कर सके।

इसके अलावा बाजार में इनकी पहुंच का दायरा बेहतर करने और सक्षम लोगों की नियुक्ति करने पर भी जोर देने की जरूरत है। यह विशेष रूप से उन सूक्ष्म कंपनियों के लिए सच है जो एमएसएमई का अधिकांश हिस्सा हैं और जिनका छोटा आकार और ऋण लेने में कठिनाई वास्तव में उन्हें छोटे झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।  

हम अपने अनुभव से जानते हैं कि चाहे वित्तीय या किसी और अन्य तरह का प्रोत्साहन हो, उसने कंपनियों को छोटे बने रहने के लिए प्रोत्साहित किया है, बजाय इसके कि उन्हें अवसरों का लाभ उठाकर विकास और समृद्धि के लिए प्रेरित किया जाए। भारत की लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रतिष्ठा और डिजिटल दौर में जो पेशेवर संसाधन आसानी से सुलभ हैं, वे एक अवसर हैं।

आज का दृष्टिकोण यह होना चाहिए कि हम तेजी से बढ़ते हुए लाभ उठाएं न कि अपने दायरे को छोटा बनाए रखें। इसका उद्देश्य दीर्घकालिक लाभ बढ़ाना होना चाहिए, न कि तत्कालिक चुनौतियों को कम करना। उदाहरण के तौर पर, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) से बाहर रहना वास्तव में बड़ी कंपनियों के आपूर्तिकर्ता बनने की संभावना कम कर देता है क्योंकि वे कंपनियां खरीद पर दिए गए जीएसटी का समायोजन चाहती हैं। ऐसी बड़ी कंपनियों के साथ व्यापार करने से अधिक स्थिरता और मजबूती मिलती है।

समिति का जोर अनुपालन की मुश्किलों को कम करने और प्रक्रियाओं को सरल और सुव्यवस्थित बनाने पर है। उम्मीद है कि आगे चलकर हर सरकार और नियामक संस्था इसे अपना मुख्य उद्देश्य बनाएगी ताकि आकार की परवाह किए बिना सभी को लाभ मिल सके। बैंक भी अक्सर यह कहते हैं कि छोटे स्वतंत्र कारोबारों की वित्तीय जानकारी पर्याप्त विश्वसनीय नहीं होती, खासतौर पर जब वे किसी बड़ी कंपनी की आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा नहीं होते। इसी कारण उन्हें छोटे कारोबार को ऋण देने में कठिनाई होती है। 

ऐसे में ऑडिट आवश्यकताओं में पूरी तरह ढील देने के बजाय, ऑडिट के दायरे को सीमित और स्पष्ट करना अधिक उपयोगी हो सकता है। साथ ही उम्मीद है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित उत्पाद भविष्य में ऑडिट की लागत को काफी कम कर देंगे। सरकार के पास पहले से ही अत्याधुनिक डिजिटल प्रणाली बनाने का अनुभव है। वह इस विशेषज्ञता का इस्तेमाल, साझा लेखांकन मंच और प्रमाणित अनुपालन मध्यस्थों में कर सकती है जहां प्रतिस्पर्धा कीमतें कम रखने में मददगार होगी।

साल में एक बार बोर्ड बैठक करने के बजाय चार बार बैठक करना कहीं अधिक बेहतर है, खासतौर पर स्टार्टअप्स और उद्यमियों द्वारा संचालित संगठनों के लिए। यदि छोटी कंपनियों को निजी बाजारों से भी सार्वजनिक पूंजी तक पहुंच बनानी है तो उनके शासन-प्रबंधन स्तर को बेहतर बनाना बेहद जरूरी है।

बोर्ड बैठकों और उनमें होने वाली अनुपालन समीक्षा का एक सकारात्मक दबाव होता है। ये बैठकें कारोबारों को नियमित रूप से अपने आंतरिक प्रबंधन, वित्तीय स्थिति और रिकॉर्ड रखने पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती हैं। इससे वे समय पर वित्तीय विशेषज्ञों की मदद ले पाते हैं और ‘बाद में दुरुस्त करने’ जैसी सोच के साथ नियमों की सीमाएं लांघने के प्रलोभन से बचते हैं। आज के समय में बोर्ड बैठकें ऑनलाइन भी की जा सकती हैं इसलिए इनकी लागत बहुत कम हो गई है। साथ ही, कई सक्षम और ईमानदार लोग बोर्ड सदस्य के रूप में योगदान देने को तैयार रहते हैं। 

अच्छा शासन शुरुआत से ही साफ-सुथरे और मजबूत व्यवसाय की नींव रखता है। अब स्टार्टअप यह समझ चुके हैं कि निदेशक मंडल का मजबूत प्रशासन कंपनियों की रफ्तार नहीं रोकता बल्कि उनके जोखिम को कम करता है। जब रणनीतिक या वित्तीय मामलों में अनावश्यक साहसिक कदम उठाए जाते हैं तब निदेशक मंडल समय पर चेतावनी देकर संस्थापकों को संभावित गलतियों से बचा सकता है।

इसी तरह, यदि एमएसएमई क्षेत्र को तेजी से आगे बढ़ने और विस्तार के लिए तैयार करना है तो उसकी नींव भी सख्त अनुपालन और अच्छे शासन पर ही रखनी होगी। यह मानसिकता और उसी के आधार पर बना कानूनी ढांचा, फिर से विचार करने योग्य है कि स्टार्टअप और एमएसएमई अलग-अलग श्रेणियां हैं। यह सोच कि स्टार्टअप्स को बड़े सपने देखने, तेजी से बढ़ने और बाहरी पूंजी जुटाने का अधिकार है जबकि एमएसएमई को छोटा ही रहने, सीमित दायरे में काम करने और कम अपेक्षाओं के साथ चलने के लिए कहा जाए, यह एक तरह की वर्ण व्यवस्था है जिसे समाप्त किया जाना चाहिए।

आज के समय में हर कारोबार के पास एक मजबूत डिजिटल केंद्रीय तंत्र और आधुनिक नियम व प्रक्रियाएं होनी चाहिए ताकि वे आधुनिक दुनिया में प्रतिस्पर्धा कर सकें। केवल व्यावसायिक समझ ही पर्याप्त नहीं है। हालांकि छोटे भारतीय व्यवसायों ने अपनी समझ और क्षमता का भरपूर प्रदर्शन किया है। 

इन छोटे कारोबार ने बेहतर ग्राहक संबंध, सूझबूझ वाले नवाचार और कम कीमतों के सहारे पहले ही बाजार का अच्छा-खासा हिस्सा हासिल कर लिया है। वे अब विस्तार के लिए तैयार हैं। उन्हें छूट नहीं बल्कि प्रोत्साहन चाहिए, उन्हें वित्तीय सहायता और सरल, सुव्यवस्थित अनुपालन प्रक्रियाएं चाहिए न कि शासन संबंधी ढील।

(लेखिका ग्राहक-आधारित कारोबारी रणनीति क्षेत्र में व्यवसाय सलाहकार हैं)

First Published : March 1, 2026 | 10:10 PM IST