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15 साल पहले की भविष्यवाणी सच हुई, खुद के बुने जाल में फंसा पाकिस्तान

पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व कमजोर है और उसमें कोई बौद्धिकता नहीं है। उसकी कूटनीति पूरी तरह भारत-चीन-अमेरिका पर केंद्रित है।

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शेखर गुप्ता   
Last Updated- March 01, 2026 | 10:03 PM IST

एक टीकाकार की जिंदगी में सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि उसका लिखा सब कुछ समीक्षा और तथ्यों की जांच के लिए हमेशा उपलब्ध रहता है। तथ्यों की गलती, व्याख्या की खामी या अपने किसी अनुमान में गलती करके आप भले ही बच निकलें लेकिन कभी न कभी आपको उसका सामना करना पड़ता है। गूगल के आगमन के बाद हालात और कठिन हो गए हैं। इसलिए शेखर गुप्ता, 1983 में इंडिया टुडे के सुनील गावसकर पर केंद्रित कवर में आपने कहा था कि उनके बेटे रोहन का नाम वेस्टइंडीज के बेहतरीन खिलाड़ी रोहन कन्हाई पर रखा गया था और वह उन्हीं की तरह खब्बू बल्लेबाज भी थे। जाहिर है मैं गलत था क्योंकि रोहन कन्हाई दांए हाथ के बल्लेबाज थे।

इसीलिए जब आपको लगता है कि आप सही साबित हुए हैं, तो आपको इसे अपनी जीत मानना चाहिए। हमेशा या अक्सर नहीं, लेकिन तब जब यह कोई ऐसा विचार हो जो सामान्य समझ के विपरीत हो और जब आपने इसे पहली बार लिखा था तो व्यापक आलोचना, संदेह, यहां तक कि उपहास का सामना करना पड़ा हो।

जैसा कि मैंने नवंबर, 2011 के अपने स्तंभ में ‘लीव अफगानिस्तान टु पाक’ शीर्षक वाला लेख लिखा था यानी अफगानिस्तान को पाक पर छोड़ दीजिए। अब जबकि पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर जंग के हालात हैं जिसमें ड्रोन, जेट और तोपें शामिल हैं तो मैं कह सकता हूं कि मैंने यह बात 15 साल पहले ही कह दी थी।

अफगानिस्तान को पाकिस्तान के हवाले कैसे छोड़ा जा सकता है? हमें वहां मजबूती से मौजूद रहना चाहिए, चाहे अमेरिकियों के साथ किसी व्यवस्था के जरिये या उस शासन के साथ जिसे वे पीछे छोड़ते हैं, ताकि पाकिस्तान के पीछे एक बड़ा ख़तरा बना रहे। बेशक, यह भारत का अवसर है, और आप कह रहे हैं कि अफगानिस्तान को पाकिस्तान के हवाले कर दें? उस समय कुछ प्रतिक्रियाएं ऐसी ही थीं। सबसे तीखी आलोचना, जैसा कि आप उम्मीद करेंगे, विदेश मंत्रालय और सैन्य दिग्गजों से आई, जो पाकिस्तानियों से दिन रात और अनंत काल तक लड़ना चाहते हैं और भूगोल की परवाह तक नहीं करते। मैं आलोचना को इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत करूंगा:

  1. जब अमेरिकी बाहर निकलेंगे तो पाकिस्तान अफगानिस्तान को अपना अधीन राज्य बना लेगा।
  2. अगर वह अफगानिस्तान को उपनिवेश नहीं भी बनाता है, तो भी वहां एक कठपुतली सरकार होगी, जो रणनीतिक गहराई की उनकी फैंटेसी को पूरा करेगी। पाकिस्तान की संकरी भौगोलिक अवस्था और गहराई की कमी (जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फिर सामने आई) पाकिस्तान के रणनीतिकारों के लिए हमेशा दिक्कत रही है।
  3. पाकिस्तान प्रशिक्षित और युद्ध के लिए तैयार तालिबान और मुजाहिद समूहों को लश्कर में शामिल करके भारत पर हमला करेगा।

15 वर्ष पहले इन सवालों के जवाब आसान थे। पहला, तीन बड़ी शक्तियों ने अपने चरम दिनों में अफगानिस्तान को अधीन बनाने की कोशिश की लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा। 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटेन, 1979 के बाद सोवियत संघ और 2001 में 9/11 के बाद अमेरिका ने ऐसा किया। अगर पाकिस्तान वाकई सोचता है कि वह इन सभी देशों ने मजबूत है तो हमें कहना चाहिए कि वह आगे बढ़े और कोशिश करे।

दूसरा, साधारण भूगोल, हिंदुकुश और उसके पार फैली विशाल ठंडी वीरानी, रणनीतिक गहराई को अचूक बना देती है। तीसरा, कश्मीर में 25 साल (तब) और अब तक के 40 साल के आतंकवाद के अनुभव से हम जानते हैं कि अफगान कभी भी पाकिस्तान के लश्करों के साथ कश्मीर में हमलों में शामिल नहीं हुए। तकरीबन सभी विदेशी आतंकवादी उसी जातीय समूह से आते हैं जिससे पाकिस्तानी सेना आती है यानी पंजाबी मुस्लिम।

अब देखिए हम कहां खड़े हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान के भीतर गहन बमबारी अभियान चला रहा है और ज्यादातर नागरिकों को मार रहा है। एक जगह पर, एक ही परिवार के 18 सदस्य मारे गए। यह भू-भाग और जनसांख्यिकी सटीक बमबारी को काल्पनिक और जोखिमपूर्ण बना देती है। यहां तक कि मानव इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति यानी अमेरिका के लिए भी।

अपने सभी उपग्रहों, मानव और सिग्नल खुफ़िया तंत्र, ड्रोन और सटीक हथियारों के बावजूद, वे अक्सर मस्जिदों, बड़े कबीलाई परिसरों में नागरिकों को मार देते थे या खाली गुफाओं को ही ध्वस्त करते रहते थे। वे कभी-कभी किसी कमांडर को मारने में सफल होते थे, लेकिन हमेशा ‘कोलैटरल डैमेज’ होता था। हर ऐसा हमला केवल तालिबान की पंक्तियों को और बढ़ा देता था, क्योंकि प्रभावित कबीलों के पुरुष बदला लेने की कसम खाते थे।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि वह अमेरिका से बेहतर प्रदर्शन कर सकता है तो हम यही कहेंगे कि वह आगे बढ़े। कोई भी इंसानी दुख पर खुश नहीं होना चाहता। ख़ासकर तब जब अफगान, चाहे सत्ता में कोई भी शासन रहा हो, हमेशा भारत और भारतीयों के प्रति स्नेह रखते आए हैं। हम आखिरी चीज जो देखना चाहते हैं, वह यह है कि कोई अफगान, विशेषकर नागरिक, आहत हो। लेकिन सच्चाई यह है कि अपनी अहंकार और दूरदृष्टि की कमी के कारण पाकिस्तान ने अपने लिए एक दूसरा मोर्चा खोल लिया है।

पाकिस्तान की सामरिक स्थिति और सैन्य योजना कभी भी दो-मोर्चे की स्थिति के लिए तैयार नहीं की गई थी, और बिल्कुल भी उस अव्यवस्था के लिए नहीं जिसमें वे अब फंस गए हैं। वे एक ऐसे राष्ट्र से युद्ध कर रहे हैं, जो यदि कुछ भी है तो उनसे भी अधिक इस्लामी और कट्टर सुन्नी है, और यह सब पवित्र रमजान महीने में हो रहा है।

पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व कमजोर है और उसमें कोई बौद्धिकता नहीं है। उसकी कूटनीति पूरी तरह भारत-चीन और अमेरिका पर केंद्रित है और अफगानिस्तान को अधीन मानकर चलती है। सेना में दूरदर्शिता नहीं है। अगर पश्चिमी मोर्चे पर कोई दिक्कत है तो इसका दोष वे पूर्वी पड़ोसी भारत पर थोपते हैं।

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के लिए यह फ़ितना अल-खवारिज है। फितना (विद्रोह) इस्लामी इतिहास से लिया गया शब्द है, जहां पहला फितना 656 से 661 ईस्वी के बीच लड़ा गया था। उसी इतिहास से वे बलूच विद्रोहियों के लिए प्रचारात्मक नाम लेते हैं: फितना-अल-हिंद (भारत से उपद्रव/विघटन), यह संकेत देते हुए कि यह पूरी तरह भारत द्वारा संचालित अभियान है। यह भूगोल और जनसांख्यिकी की कसौटी पर विफल हो जाता है। बलूच केवल बलूचिस्तान के ही नहीं, बल्कि ईरान और अफगानिस्तान के सटे हुए विशाल, खाली क्षेत्रों के भी मूल निवासी हैं। भारत की वहां बड़े पैमाने पर कोई पहुंच नहीं हो सकती।

बेशक, भारतीय ‘एजेंसियों’ में कुछ लोग इन पाकिस्तानी आरोपों को एक प्रशंसा के रूप में देख सकते हैं। लेकिन पाकिस्तानियों को पता है कि अफगानिस्तान और ईरान के साथ उनकी 3,549 किलोमीटर लंबी पश्चिमी सीमाएं अब एक जीवंत चुनौती बन चुकी हैं। 

दशकों से पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान ने पश्चिम की ओर देखते हुए कई कल्पनाओं को पोषित किया है। पहली, अफगानिस्तान में रणनीतिक गहराई। दूसरी, ईरान में एक अटूट इस्लामी सहयोगी। और फिर, यह भावुक धारणा कि वे सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से पश्चिम एशिया, विशेषकर अरब मध्य पूर्व से संबंधित हैं। यह उनकी उपमहाद्वीपीय पहचान से बचने का प्रयास था।

मुख्यतः इसलिए कि भारत इतना प्रभावशाली है कि सांस्कृतिक, भाषाई और पारिवारिक संबंध उपमहाद्वीपीय पहचान को भारतीय होने का पर्याय बना देते हैं।

परिशिष्ट: चूंकि मैंने इसे एक टिप्पणीकार के जीवन की कठिनाइयों से शुरू किया था, इसलिए भू-राजनीतिक आकलन करना घरेलू राजनीति से कहीं अधिक जोखिमपूर्ण है। इस सप्ताह यूक्रेन पर रूसी आक्रमण की चौथी वर्षगांठ ऐसी ही एक बात को स्वीकार करने का उपयुक्त समय है।

इस स्तंभ में फरवरी 2022  में प्रकाशित लेख में कुछ ज्यादा मुखर ढंग से कहा था कि जब तक आप इसे पढ़ेंगे, तब तक रूसी कीव में होंगे या कुछ दिनों में पहुंच सकते हैं। न केवल उन्हें कठोरता से पीछे धकेला गया, बल्कि वे पिछले चार वर्षों से एक थकाने वाले नुकसानदेह युद्ध में उलझे हुए हैं।

First Published : March 1, 2026 | 10:02 PM IST