आने वाले महीनों में कोयले की कमी से बिजली संकट और गंभीर हो सकता है। समाचारों के मुताबिक बिजली मंत्रालय का एक आंतरिक आकलन दिखाता है कि सितंबर तिमाही में बिजली की कमी और बढ़ सकती है जिससे बिजली का उत्पादन प्रभावित होगा। कोयले का घरेलू उत्पादन बिजली की बढ़ती मांग के साथ तालमेल नहीं रख पा रहा है। इस समाचार पत्र में विभिन्न औद्योगिक केंद्रों से प्रकाशित खबरों ने यही दिखाया कि छोटे कारोबार बिजली की सुनिश्चित उपलब्धता की कमी के कारण प्रभावित हैं। महामारी के कारण मची उथलपुथल से उबर रहा देश का उद्योग जगत बिजली की कमी नहीं झेल सकता। यदि बिजली की कमी लगातार बनी रही तो छोटे कारोबार ठप पड़ सकते हैं। उत्पादकों को कोयला आयात के लिए कहने के बाद जानकारी के मुताबिक अब सरकार ने यह तय किया है कि कोल इंडिया भी विदेशों से कोयला खरीदकर बिजली उत्पादकों को देगी।
यह देखना शेष है कि कोयले की उपलब्धता कितनी जल्दी सुधरती है लेकिन इस क्षेत्र का संकट केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। सरकारी बिजली वितरण कंपनियों की स्थिति इस क्षेत्र के लिए ज्यादा चिंता का विषय है। ये कंपनियां अपना बकाया नहीं चुका पा रही हैं और यही कारण है कि केंद्र सरकार को एक के बाद एक इस क्षेत्र के लिए प्रोत्साहन पैकेज जारी करना पड़ रहा है लेकिन फिर भी कोई ठोस बदलाव नहीं हो रहा है। गत सप्ताह अधिसूचित ताजा योजना के तहत इन कंपनियों को 48 किस्तों में बकाया चुकाने को कहा गया है। इसके अलावा उन पर देर से भुगतान करने पर अधिभार भी नहीं लगेगा। वितरण कंपनियों पर उत्पादन कंपनियों की एक लाख करोड़ रुपये की राशि बकाया है। विलंब से भुगतान पर लगने वाले अधिभार की कुल राशि करीब 6,800 करोड़ रुपये है।
सरकार को आशा है कि बिना अतिरिक्त विलंब शुल्क लगाए भुगतान को टालने का अवसर देने से बिजली वितरण कंपनियों को भी अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी। परंतु इन कंपनियों के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए कहा जा सकता है कि नयी योजना से भी जमीन पर कोई खास बदलाव नहीं आएगा। यह बात याद करना उचित होगा कि सरकार ने 2020 में बिजली वितरण कंपनियों के बकाये के निपटान के लिए 90,000 करोड़ रुपये की विशेष योजना घोषित की थी। लेकिन कुछ ही महीनों में बकाया फिर बढऩे लगा। यहां तक कि ताजा योजना में भी यह स्पष्ट नहीं है कि भुगतान को टालने से कैसे मदद मिलेगी। यदि बिजली वितरण कंपनियां वर्तमान भुगतान नहीं निपटा पाएंगी तो वे पिछला बकाया कैसे चुकाएंगी? बुनियादी दिक्कत यह है कि सरकारी बिजली वितरण कंपनियां लागत नहीं निकाल पा रही हैं। अगर ये कंपनियां अपनी लागत नहीं वसूल पातीं तो कोई नकदी सहायता या भुगतान टालने की व्यवस्था इनकी मदद नहीं कर पाएगी। यह मोटे तौर पर इसलिए होता है कि राज्य सरकारें राजनीतिक कारणों से वितरण कंपनियों को नियमित रूप से दरें बढ़ाने की अनुमति नहीं देतीं। इससे समस्या में इजाफा होता है।
यह राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति के लिए भी ठीक नहीं। जैसा कि राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति पर रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट दिखाती है कि उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना या उदय के लागू होने के बाद राज्य सरकारों द्वारा जारी गारंटी में कमी आई लेकिन उनमें पुन: इजाफा हुआ और मार्च 2020 तक ये सकल घरेलू उत्पाद के 2.9 फीसदी तक पहुंच गई। यह स्थिति टिकाऊ नहीं है और समर्थन या योजना से परे हालात आगे और बिगडऩे ही हैं। महंगा कोयला उत्पादन लागत बढ़ाएगा और अगर इसका बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया तो समूची मूल्य शृंखला खतरे में पड़ जाएगी। ऐसे में तत्काल व्यवस्थागत सुधारों के अभाव में बिजली क्षेत्र आर्थिक वृद्धि के लिए बोझ बन सकता है।