बीते कुछ सालों में भारत का बैंकिंग सिस्टम बहुत तेजी से बड़ा हुआ है। एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2015 से 2025 के बीच बैंकों में जमा पैसा ₹85 लाख करोड़ से बढ़कर ₹241 लाख करोड़ हो गया, जबकि बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज यानी एडवांस ₹67 लाख करोड़ से बढ़कर ₹191 लाख करोड़ तक पहुंच गए। इससे साफ है कि बैंक अब पहले से कहीं ज्यादा कर्ज दे रहे हैं।
रिपोर्ट बताती है कि बैंकों में जमा पैसा तो बढ़ा है, लेकिन कर्ज की रफ्तार उससे भी तेज रही है। इसी वजह से बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में करीब 79 फीसदी हो गया है। इसका मतलब है कि बैंक अपने पास जमा पैसे का बड़ा हिस्सा कर्ज देने में इस्तेमाल कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई राज्यों में लोग अब बैंकों में पैसा रखने के बजाय शेयर बाजार और दूसरे निवेश विकल्पों की ओर जा रहे हैं। गुजरात, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में यह बदलाव ज्यादा तेजी से देखने को मिला है। कोरोना महामारी के बाद भारतीय बैंकों की स्थिति में बड़ा सुधार आया है। बैंकों की कुल संपत्ति देश की जीडीपी के मुकाबले बढ़कर 77 फीसदी से 94 फीसदी तक पहुंच गई है।
कई सालों तक बाजार हिस्सेदारी घटने के बाद अब सरकारी बैंक (PSB) दोबारा कर्ज देने में आगे बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी बैंकों की कर्ज देने की क्षमता में सुधार हुआ है और वे फिर से बाजार में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बिना गारंटी वाले कर्ज बहुत तेजी से बढ़े हैं। यह कर्ज वित्त वर्ष 2005 में सिर्फ ₹2 लाख करोड़ था, जो 2025 में बढ़कर करीब ₹47 लाख करोड़ हो गया। अब कुल कर्ज में इसका हिस्सा करीब 25 फीसदी है। इससे बैंकों के लिए जोखिम भी बढ़ सकता है।
अधिकतर सरकारी बैंकों की पूंजी स्थिति (कैपिटल एडिक्वेसी) पहले से बेहतर हुई है। हालांकि निजी बैंकों की स्थिति मजबूत बनी हुई है, लेकिन कुछ निजी बैंकों में इसमें थोड़ी गिरावट भी देखी गई है। बैंकों का पैसा अब रियल एस्टेट और शेयर बाजार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी ज्यादा जा रहा है। इन क्षेत्रों में बैंकों का कुल कर्ज बढ़कर ₹50 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो कुल कर्ज का करीब 27 फीसदी है।
रिपोर्ट के अनुसार, बैंकों में काम करने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। वित्त वर्ष 2005 में जहां 8.6 लाख कर्मचारी थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 18 लाख से ज्यादा हो गई है। अब बैंकों में अधिकारियों की संख्या ज्यादा है, जिससे यह साफ है कि बैंक ज्यादा कुशल और तकनीकी कर्मचारियों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, बैंकों की कंटिंजेंट लायबिलिटी यानी भविष्य की जिम्मेदारियां भी बहुत तेजी से बढ़ी हैं। यह 2005 में ₹28 लाख करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर ₹505 लाख करोड़ तक पहुंच गई। इसमें ज्यादातर हिस्सा विदेशी मुद्रा से जुड़े सौदों का है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि देश के सभी हिस्सों में कर्ज बराबर नहीं पहुंच रहा है। ओडिशा, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बैंकों का कर्ज अनुपात काफी कम है, जबकि दक्षिण और पश्चिम भारत में कर्ज ज्यादा दिया जा रहा है।
ओडिशा, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेशियो 52 फीसदी से भी कम है। इसका मतलब है कि इन राज्यों में बैंकों में जमा पैसा तो हो रहा है, लेकिन उसी अनुपात में कर्ज नहीं दिया जा रहा।
अगर जिलों के स्तर पर देखें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। देश में 75 ऐसे जिले हैं, जहां CD रेशियो 150 से ज्यादा है, यानी वहां बैंक बहुत ज्यादा कर्ज दे रहे हैं। वहीं दूसरी ओर 226 जिले ऐसे हैं, जहां CD रेशियो 50 से भी कम है, यानी वहां बैंक बहुत कम कर्ज दे रहे हैं। कुल मिलाकर देश के करीब 46 फीसदी जिलों में CD रेशियो 50 से 100 के बीच है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण भारत के जिलों में CD रेशियो बाकी क्षेत्रों की तुलना में बेहतर है, यानी वहां बैंकिंग गतिविधियां ज्यादा संतुलित हैं।
जिला स्तर पर जमा और कर्ज का बंटवारा भी काफी असमान है। रिपोर्ट बताती है कि देश के टॉप 10 जिलों में ही कुल जमा का करीब 43 फीसदी और कुल कर्ज का 49 फीसदी हिस्सा केंद्रित है। वहीं अगर टॉप 100 जिलों की बात करें तो वे कुल जमा का 75 फीसदी और कुल कर्ज का 77 फीसदी संभालते हैं। इसका मतलब है कि देश के बाकी 643 जिलों में सिर्फ 25 फीसदी बैंकिंग कारोबार सिमटा हुआ है।
कुछ जिलों में जमा और कर्ज के बीच भी बड़ा अंतर देखने को मिला है। नागपुर, पटना, नॉर्थ 24 परगना और तिरुवनंतपुरम ऐसे जिले हैं, जो जमा के मामले में टॉप 25 में हैं, लेकिन कर्ज देने में टॉप 25 में शामिल नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर चंडीगढ़, इंदौर, लुधियाना और रायपुर ऐसे जिले हैं, जो कर्ज देने में टॉप 25 में हैं, लेकिन जमा के मामले में टॉप 25 में नहीं आते।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारतीय बैंकों का कुल आकार बीते 20 सालों में बहुत तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2005 में जहां बैंकों की कुल संपत्ति सिर्फ ₹23.6 लाख करोड़ थी, वहीं वित्त वर्ष 2025 तक यह बढ़कर ₹312.2 लाख करोड़ तक पहुंच गई है। हालांकि बैंकिंग सिस्टम का आकार बढ़ा है, लेकिन कर्ज और जमा का बंटवारा देशभर में अब भी समान नहीं है।