भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सात क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को बैंक से आवंटित ऋणों की रेटिंग (गुणवत्ता आधारित मूल्यांकन) करने अनुमति दी है। इन रेटिंग एजेंसियों को बेसल 2 मानकों के अनुरूप आवंटित ऋ ण का मूल्यांकन करने के बाद रेटिंग देने की हिदायत दी गई है। बेसल दिशानिर्देशों में कहा गया है कि क्रेडिट रेटिंग के मूल्यांकन की विधि पुख्ता एवं तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। आरबीआई ने कहा है कि सभी रेटिंग एजेंसियां बैंक ऋण रेटिंग के लिए ऋण भुगतान में चूक (डिफॉल्ट) की एक सार्वभौम परिभाषा का इस्तेमाल करेंगी। सैद्धांतिक तौर पर अनिवार्य बैंक ऋण रेटिंग से पारदर्शिता बढ़ी है। इससे बैंकों को भी अपने ग्राहकों की वित्तीय स्थिति का जायजा लेने में खासी मदद मिल रही है। मगर इससे अलग भी एक सच्चाई है।
कोई इकाई (ग्राहक) रेटिंग एजेंसी के साथ तब सहयोग करने से इनकार कर देती है जब उसका बैंक रेटिंग के लिए जोर नहीं डालता है या ऐसा संकेत देता है कि रेटिंग न भी दी जाए तो भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर निम्र गुणवत्ता वाली कोई कंपनी रेटिंग के दायरे से छिटक जाती है तो यह वित्तीय प्रणाली के हित में नहीं है। बिना रेटिंग वाली कंपनी के लिए जोखिम 100 प्रतिशत है और कम रेटिंग वाली कंपनी के लिए यह 150 प्रतिशत है। इसका मतलब हुआ कि रेटिंग नहीं होने से कम ब्याज दरों पर ऋण मिल सकता है क्योंकि ऐसे ग्राहकों के लिए बैंकों की पूंजी आवश्यकता 50 प्रतिशत कम है। इस तरह यह बैंक और ग्राहक दोनों के लिए फायदेमंद है। कई बैंक रेटिंग की परवाह किए बिना अपने प्रतिस्पद्र्धी बैंकों के ग्राहकों को जोडऩे के लिए तैयार रहते हैं।
रेटिंग एजेंसियों के अनुरोध के बावजूद कोई इकाई वित्तीय आंकड़े सौंपने से पीछे हट सकती है या शुल्क का भुगतान नहीं कर सकती है। जब भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को इकाइयों से मिल रहे ‘असहयोग’ को परिभाषित करने के लिए कहता है तो रेटिंग एजेंसियां उक्त दोनों बातों का जिक्र करती हैं। क्रेडिट रेटिंग समझौतों के अनुसार फीस के अलावा इकाइयों को रेटिंग एजेंसियों द्वारा मांगे जाने पर प्रबंधन द्वारा उठाए गए कदमों के साथ वित्तीय एवं गैर-वित्तीय जानकारियां देनी पड़ती हैं। यह प्रक्रिया तब बाधित हो जाती है जब कोई रेटिंग प्राप्त इकाई रेटिंग एजेंसियों को सालाना निगरानी फीस देने से मना कर देती है। रेटिंग प्राप्त इकाइयां कई अन्य जानकारियां देने से भी इनकार कर सकती हैं। अगस्त 2021 से आरबीआई ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के लिए उन ग्राहकों के सावधि ऋण से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया है जिनकी रेटिंग की पुष्टि की गई है या हाल में रेटिंग दी गई है। मगर रेटिंग प्राप्त कंपनियां ऐसे खुलासों से खुश नजर नहीं आ रही हैं।
रेटिंग प्राप्त इकाइयों से असहयोग के बाद क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां आवश्यक सूचनाएं एकत्र किए बिना कंपनियों को रेटिंग देना जारी रख सकती हैं। इन रेटिंग से खास फर्क नहीं पड़ता है। मगर जिन कर्जधारकों या इकाइयों ने रेटिंग एजेंसियों के साथ सहयोग करना बंद कर दिया है वे शायद ही चिंतित रहती हैं क्योंकि इससे तत्काल उनके लिए कोई जोखिम पैदा नहीं होता है। बैंक भी रेटिंग की परवाह किए बिना उन्हें ऋण देने के लिए तैयार रहते हैं।
क्रेडिट रेटिंग के खेल में दो निर्णायक होते हैं। इसमें एक निर्णायक सेबी है जो पूंजी बाजार से जुड़ी रेटिंग पर नजर रखता है। दूसरा निर्णायक आरबीआई है जो बैंक ऋण रेटिंग पर नजर रखने के लिए जिम्मेदार है। बैंक अधिक जोखिम मोल लेने के बदले कम रेटिंग वाले ग्राहकों से अधिक ब्याज वसूलते हैं। ‘बीबी’ या इससे कम रेटिंग प्राप्त किसी कंपनी के लिए बैंकों से ऋण पाना मुश्किल होता है। ये केवल सैद्धांतिक बातें हैं मगर सच्चाई कुछ और है। वास्तव में कम रेटिंग प्राप्त कई कंपनियां बैंकों से ऋण पाने में सफल रही हैं। वे बैंकों को कम रेटिंग के बावजूद ऋण आवंटित करने के लिए तैयार कर लेती हैं और इसके लिए विभिन्न स्तरों पर तिकड़म लगाती रहती हैं। 2020 में आरबीआई ने कहा था कि 7.5 करोड़ रुपये तक के ऋण के लिए बैंकों को बैंक ऋण रेटिंग की जरूरत नहीं होगी। इस प्रावधान से कोविड-19 महामारी से प्रभावित सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों को मिल रहे लाभ से किसी को आपत्ति नहीं है मगर ग्राहकों को रेटिंग दिए जाने के मामले में मनमाना रवैया सारे किए कराए पर पानी फेर देता है।
बैंकों और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के बीच सांठगांठ कोई नई बात नहीं है। ऐसे मौके आए हैं जब कोई बैंक कम रेटिंग से खुश नहीं रहता है क्योंकि इससे ऋण आवंटित करने पर लागत बढ़ जाती है। वास्तव में सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों ने तुलनात्मक रूप से छोटी इकाइयों से रेटिंग मांगना बंद कर दिया है। इसकी वजह यह है कि बैंक कम रेटिंग के लिए उनसे अधिक ब्याज लेने के लिए विवश हैं। यह एक ऐसी चीज है जो सभी ग्राहकों को रास नहीं आ सकती है। इससे पहले कि अधिक देर हो जाए आरबीआई और भारतीय बैंक संघ को बैंकों को इस बात के लिए राजी करना चाहिए कि वे ऊंची एवं कम रेटिंग वाली कंपनियों के लिए एक समान रूप से रेटिंग अनिवार्य कर दे। यह सच है कि एक जंक बॉन्ड (ऊंचा प्रतिफल देने वाली प्रतिभूतियां जिनमें भुगतान में चूक होने का अधिक जोखिम रहता है)बाजार के सृजन से काफी हद तक समस्या सुलझ जाएगी। मगर हमें सबसे पहले उन मसलों पर ध्यान देना चाहिए जिनका तत्काल समाधान जरूरी है।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में मुख्य सलाहकार हैं)