संसद में पेश किए गए 2021-22 के केंद्रीय बजट ने निजीकरण, परिसंपत्ति बिक्री और सरकार के राजकोषीय घाटे के पारदर्शी लेखांकन जैसी साहसी घोषणाओं को लेकर सुर्खियां बटोरीं। ऐसे में अब सरकार के राजस्व और व्यय के अनुमानों के अहम आंकड़ों की पड़ताल करने का समय है। क्या वास्तविक आंकड़े सरकार के दावों की पुष्टि करते हैं या वे कुछ अन्य तस्वीर बयां करते हैं?
पहला सवाल बजट में दी गई राजकोषीय मजबूती की योजना को लेकर पैदा होता है। सरकार ने स्वीकार किया है कि राजकोषीय घाटा 2020-21 में भारी बढ़ोतरी के साथ सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 9.5 फीसदी हो जाएगा। लेकिन उसने घाटे को 2021-22 में घटाकर 6.8 फीसदी और 2025-26 तक 4.5 फीसदी पर लाने का लक्ष्य तय किया है। दूसरे शब्दों में एक साल में घाटे में 2.7 फीसदी अंक और पांच साल में पांच फीसदी अंक की कमी।
सरकार के राजकोषीय घाटे में कमी लाने की योजना को हासिल करना कितना मुमकिन है? याद करें कि पिछली आधी सदी में कभी केंद्र सरकार एक साल में 2.7 फीसदी अंक या पांच साल में पांच फीसदी अंक की कमी नहीं कर पाई हैं।
यहां तक कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद के वर्षों में भी सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2007-08 में जीडीपी के 2.54 फीसदी से बढ़कर 2008-09 में 6.1 फीसदी और 2009-10 में 6.6 फीसदी पर पहुंच गया था। वित्त वर्ष 2010-11 में राजकोषीय घाटा 4.9 फीसदी रहा यानी इसमें 1.7 फीसदी अंक की कमी आई।
2020-21 में घाटे में बढ़ोतरी इससे पिछले वित्त वर्ष से 4.9 फीसदी अंक अधिक रही। अगर सरकार 2021-22 में अपने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 6.8 फीसदी पर लाने में सफल रही तो घाटे में कमी का स्तर 2.7 फीसदी अंक रहेगा।
अगर राजकोषीय घाटे के वास्तविक आंकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो इसमें कमी का स्तर तेज रहेगा। अब सरकार के बजट दस्तावेज दिखाते हैं कि कम से कम 2016-17 से उसके राजकोषीय घाटे के आंकड़ों को कम दिखाया गया। उदाहरण के लिए 2016-17 और 2017-18 में प्रत्येक वर्ष में घाटे के आधिकारिक आंकड़े जीडीपी के 3.5 फीसदी थे मगर इन दोनों वर्षों में बजट से इतर उधारी के असर समेत वास्तविक आंकड़ा जीडीपी का 4.01 फीसदी रहा।
बाद के दो वर्षों में राजकोषीय घाटे के मुख्य आधिकारिक आंकड़े और वास्तविक घाटे के बीच खाई चौड़ी हो गई। वित्त वर्ष 2018-19 में दिखाया गया कि आधिकारिक मुख्य राजकोषीय घाटा घटकर जीडीपी के 3.4 फीसदी पर आ गया, लेकिन अब वास्तविक आंकड़े दर्शाते हैं कि यह बढ़कर जीडीपी का 4.26 फीसदी रहा।
वित्त वर्ष 2019-20 से अंतर नहीं बढ़ा क्योंकि सरकार ने बजट से इतर उधारी पर अपनी निर्भरता कम करनी शुरू कर दी। 2019-20 में घाटे का मुख्य आंकड़ा जीडीपी का 4.6 फीसदी था, लेकिन वास्तविक घाटा 5.32 फीसदी रहा। 2020-21 में मुख्य राजकोषीय घाटा 9.5 फीसदी था, लेकिन वास्तविक आंकड़ा दो अंकों में जीडीपी का 10.14 फीसदी रहा। यह अंतर 2021-22 में कम होने के आसार हैं। इस वित्त वर्ष में कुल घाटा 6.8 फीसदी लक्षित है, जो घाटे के वास्तविक लक्ष्य जीडीपी के 6.93 फीसदी से मामूली कम है। लेकिन इसका यह भी मतलब होगा कि 2020-21 में वास्तविक घाटे में कमी के लिए आवश्यक स्तर ऊंचा 3.21 फीसदी अंक रहेगा, न कि 2.7 फीसदी अंक। यह तर्क भी दिया जा सकता है कि अगले साल अर्थव्यवस्था के उबरने से सरकार के राजस्व में अहम बढ़ोतरी होगी। इसमें 14.4 फीसदी की नॉमिनल बढ़ोतरी का अनुमान है, जबकि 2020-21 में चार फीसदी से अधिक नॉमिनल संकुचन रहा था।
लेकिन सरकार के राजस्व अनुमान इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। इनमें कहा गया है कि सकल राजस्व संग्रह 2021-22 के दौरान मामूली बढ़ोतरी के साथ जीडीपी का 9.9 फीसदी रहेगा, जो चालू वित्त वर्ष में 9.8 फीसदी अनुमानित है। अनुमानित दर पर भी अगले साल कर उछाल 1.16 जरूरी होगी, लेकिन यह मुश्किल लक्ष्य है। गैर-कर राजस्व भी जीडीपी का महज एक फीसदी बना रहेगा। असल में कर और गैर-कर राजस्व बढ़ाने के सरकार के प्रयास पिछले पांच साल में अपर्याप्त रहे हैं।
अगले साल विनिवेश और निजीकरण से राजस्व बढ़कर 1.75 लाख करोड़ रुपये या जीडीपी का करीब 0.8 फीसदी रहने का अनुमान है। मगर इस लक्ष्य को हासिल करना सरकार की क्रियान्वयन क्षमता पर निर्भर करता है। ऐसे में क्या संकुचन व्यय के स्तर पर रहेगा? इससे बजट को लेकर दूसरा सवाल पैदा होता है। उस व्यय की क्या प्रकृति है, जिसका सरकार ने चालू और आगामी वर्ष में दावा किया है? निस्संदेह चालू वर्ष में कुल व्यय में भारी बढ़ोतरी हुई है। यह वर्ष 2019-20 में जीडीपी का करीब 13 फीसदी था, जो 2020-21 में 18 फीसदी पर पहुंच गया। लेकिन इस व्यय में 20 फीसदी से अधिक हिस्सा खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी के बकाये को चुकाकर सरकारी बैलेंस शीट को पारदर्शी एवं साफ-सुुथरा बनाने की मद का था। शेष अतिरिक्त व्यय महामारी के कारण विभिन्न सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाने से बढ़ा।
हालांकि आगामी वर्ष में राजस्व व्यय में संकुचन तेज रहेगा। इस तरह पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी के बावजूद जीडीपी में सरकार के कुल व्यय का हिस्सा चालू वर्ष में 18 फीसदी से घटकर अगले साल करीब 16 फीसदी रहेगा। यह व्यय में अप्रत्याशित संकुचन है। यह चालू वर्ष में सरकार के कुल व्यय में रिकॉर्ड 28 फीसदी बढ़ोतरी के मुकाबले महज करीब एक फीसदी बढ़ोतरी साबित होगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अगले साल अपने राजस्व व्यय को घटाने में सक्षम है।
अंत में: सरकार के अपने खाद्य सब्सिडी खाते को साफ-सुथरा बनाने से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की वित्तीय सेहत में सुधार आने की संभावना है। एफसीआई वह मुख्य एजेंसी है, जो केंद्र के लिए खाद्यान्न खरीदती है। पहले ही एफसीआई पर एनएसएसएफ के 1.5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का भुगतान किया जा चुका है। एनएसएसएफ के एक लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त कर्ज का आगामी वर्ष में भुगतान किया जाएगा। सरकार ने वर्ष 2021-22 से खाद्य सब्सिडी के भुगतान के लिए एनएसएसएफ का इस्तेमाल बंद करने का फैसला किया है। एफसीआई की बेहतर बैलेंस शीट इस सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के भविष्य के लिए अच्छी है।
लेकिन निजीकरण को लेकर सरकार की नीति में गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में सभी पीएसयू को बेचा जाना या बंद किया जाना शामिल है। एफसीआई रणनीतिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में वर्गीकृत नहीं है। ऐसे में क्या एफसीआई का भी निजीकरण किया जाएगा और इसका सरकार की भविष्य की खाद्यान्न खरीद योजना के लिए क्या मतलब होगा, जिसमें उसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खाद्यान्न का न्यूनतम बफर स्टॉक रखना होता है? ऐसे समय जब किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना के तहत खाद्यान्न की खरीद जारी रखने को लेकर आंदोलनरत हैं, उस समय एफसीआई की वित्तीय सेहत में सुधार और उसके संभावित निजीकरण के बहुत से निहितार्थ होंगे।