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जून तिमाही में बैंकों को भारी ट्रेजरी नुकसान

Last Updated- December 11, 2022 | 5:46 PM IST

भारतीय बैंकिंग उद्योग का अपने 2022 के प्रदर्शन को लेकर जश्न शायद लंबा नहीं चले। एक निजी बैंक को छोड़कर सभी को पिछले साल मुनाफा हुआ है। पिछले साल सभी सूचीबद्ध‍ बैंकों का सामूहिक शुद्ध‍ लाभ 1.57 लाख करोड़ रुपये रहा, जो अब तक का सबसे अधिक है।
हालांकि वित्त वर्ष 2023 की पहली तिमाही में हालात कुछ अलग रह सकते हैं। बढ़ती ब्याज दर के दौर में सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में अचानक बढ़ोतरी से ट्रेजरी नुकसान के कारण बहुत से बैंकों के लाभ पर चोट पड़ेगी और उनमें से कुछ घाटे में भी रह सकते हैं। बॉन्ड की कीमतों और प्रतिफल की दिशा हमेशा विपरीत होती है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ऊंची महंगाई से निपटने के लिए जून तिमाही के दौरान दो चरणों में अपनी नीतिगत दर 90 आधार अंक बढ़ाकर 4.9 फीसदी कर दी है। एक आधार अंक एक फीसदी का 100वां हिस्सा है। इसके बाद 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल जून तिमाही में 61 आधार अंक बढ़कर 7.45 फीसदी पर पहुंच गया, जो 31 मार्च को 6.84 फीसदी था। तिमाही के दौरान एक समय यह बढ़ोतरी 80 आधार अंक तक पहुंच गई थी। पिछले एक साल के दौरान 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल 140 आधार अंक बढ़ा है।
बैंकों को अपनी जमाओं का 18 फीसदी सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना होता है, ले​किन इस समय उनका औसत निवेश 25 फीसदी से कुछ अधिक है। सैद्ध‍ांतिक रूप से 23 फीसदी किसी अनुमा​नित घाटे से कवर रहता है क्योंकि उसे हेल्ड टू मैच्योरिटी (एचटीएम) बास्केट में रखा जाता है, ले​किन ज्यादातर बैंक एचटीएम में 21 फीसदी से कम रख रहे हैं। ऐसे में जब कीमतें गिरती हैं तो उन्हें शेष के लिए बाजार कीमत आधारित (एमटीएम)  घाटा उठाना पड़ता है।
एमटीएम लेखांकन का तरीका है, जिसमें किसी परिसंपत्ति का मूल्य खरीद कीमत पर नहीं बल्कि बाजार कीमत पर तय होता है। इसलिए जब कीमतें गिरती हैं तो खरीद कीमत और बाजार कीमत के बीच के अंतर का भुगतान करना होता है।
एचटीएम के अलावा दो अन्य बॉन्ड बास्केट हैं, जो एमटीएम पर आधारित हैं। ये अवेलबल फॉर सेल या एएफएस और हेल्ड फॉर ट्रे​डिंग या एचटीएफ हैं। एएफएस बास्केट के बॉन्ड को किसी भी समय बेचा जा सकता है, लेकिन एचटीएफ बास्केट के बॉन्डों को खरीद के 90 दिन के भीतर बेचने की जरूरत होती है।
सरकार ने कोविड-19 महामारी के अर्थव्यवस्था पर कहर बरपाने और राजकोषीय घाटा बढ़ने की वजह से वित्त वर्ष 2020 में 7.1 लाख करोड़ रुपये (सकल उधारी) जुटाने के बाद वित्त वर्ष 2021 में 13.7 लाख करोड़ रुपये से कुछ अधिक और वित्त वर्ष 2022 में 11.27 लाख करोड़ रुपये उधार लिए।  वित्त वर्ष 2023 की पहली तिमाही में सरकार की सकल उधारी 3.9 लाख करोड़ रुपये रही, जबकि बजट में पूरे वर्ष के लिए 14.31 लाख करोड़ रुपये का अनुमान है। केंद्र सरकार अप्रैल 2020 से 28.87 लाख करोड़ रुपये उधार ले चुकी है। एक मोटे अनुमान के हिसाब से चालू बाजार कीमत पर एमटीएम नुकसान करीब 1.73 लाख करोड़ रुपये का हुआ है। निस्संदेह केवल बैंक ही सरकारी बॉन्डों के खरीदार नहीं हैं और केवल सभी बॉन्ड भी एमटीएम पर निर्भर नहीं हैं। इनके विदेशी निवेशकों के अलावा बीमा कंपनी, म्युचुअल फंड और भविष्य निधि जैसे खरीदार हैं।
किसी भी बैंक के नुकसान की गणना करना मुश्किल है, इसलिए पूरे उद्योग का अनुमान लगाना भी मुश्किल है क्योंकि यह बॉन्डों की परिपक्वता और वे किस बास्केट में रखे जाते हैं, उस पर निर्भर करता है।
निस्संदेह भारत एकमात्र ऐसा बाजार नहीं है, जहां बॉन्ड प्रतिफल बढ़ा है। अमेरिका में 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल दिसंबर 2021 में 1.51 फीसदी था, जो फेडरल रिजर्व के नीतिगत दर बढ़ाने से 31 मार्च 2022 को 2.33 फीसदी और 30 जून 2022 को 3.01 फीसदी पर पहुंच गया। यह 14 जून को 3.48 फीसदी का स्तर छू गया था।
बीते वर्षों में हमें कुछ तिमाहियों में प्रतिफल में भारी तेजी देखने को मिली है, जिसने बैंकों के लिए मुश्किलें पैदा की थीं। उदाहरण के लिए वर्ष 2004 की जून ​तिमाही में 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल 69 आधार अंक बढ़कर 5.16 फीसदी से 5.85 फीसदी पर पहुंच गया था। वर्ष 2008 की पहली ​तिमाही में प्रतिफल में 74 आधार अंक की तेज  बढ़ोतरी (7.96 फीसदी से 8.70 फीसदी) रही थी।
सबसे तेज बढ़ोतरी 2013 में तथाकथित टैपर टैन्ट्रम के दौरान देखने  को मिली थी। उस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने अपनी बॉन्ड खरीद की रफ्तार घटाने की घोषणा की थी ताकि उसके द्वारा अर्थव्यवस्था में झोंकी जा रही नकदी की मात्रा घटाई जा सके। वर्ष 2013 की सितंबर तिमाही में 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल 201 आधार अंक बढ़ा। यह 7.46 फीसदी से बढ़कर 9.47 फीसदी पर पहुंच गया।
इसी तरह 2017 की जून तिमाही में प्रतिफल 66 आधार अंक और 2018 की जून तिमाही में 58 आधार अंक बढ़ा, जिससे बैंकों की बैलैंस शीट पर दबाव बढ़ गया। आरबीआई कम से कम तीन मौकों पर बैंकों के बचाव के लिए आगे आया था।
वर्ष 2004 में बैंकिंग नियामक ने एक नया उपाय शुरू किया, जिसमें बैंकों को अपना निवेश एएफएस से एचटीएम बास्केट में हस्तांतरित करने की मंजूरी दे दी गई। इसने बैंकों को एएफएस खाते में भविष्य के एमटीएम नुकसान की भरपाई से बचाया क्योंकि प्रतिफल लगातार बढ़ रहा था।
वर्ष 2013 में टैपर टैंट्रम के दौरान रुपया गिर रहा था और आरबीआई को ब्याज दरों में तेज बढ़ोतरी करनी पड़ी, जिससे बॉन्ड प्रतिफल में उछाल आई। उस समय नियामक ने बैंकों को एएफएस से एचटीएम बास्केट में लगभग उसी कीमत पर हस्तांतरित करने की मंजूरी दे दी, जिस पर वे खरीदे गए थे। इस तरह बैंकों की बैलेंस शीट को भारी एमटीएम नुकसान से बचाया गया।
वर्ष 2017 में जब प्रतिफल बढ़ा तो आरबीआई ने बैंकों को एक अलग तरीके से मदद दी थी। इसने उन्हें​ यह बोझ अग्रिम उठाने के बजाय चार ​तिमाहियों में एमटीएम नुकसान के भुगतान की मंजूरी दी।
आरबीआई गनर्वर शक्तिकांत दास ने अक्टूबर 2020 में कहा, ‘वित्तीय बाजार की स्थिरता और प्रतिफल वक्र का क्रमिक विकास जनहित में हैं और इस संबंध में बाजार भागीदारों​ और आरबीआई की साझा जिम्मेदारी है।’
तब से गवर्नर और डिप्टी गवर्नर ने कई मौकों पर प्रतिफल वक्र के ‘जनहित’ पहलू पर जोर दिया है, जबकि आरबीआई ने सहज स्तर से अधिक प्रतिफल में बढ़ोतरी को रोकने के लिए विभिन्न तरीकों से बॉन्ड बाजार में दखल दिया है। इन सभी से बैंकों का भरोसा बढ़ा है। उन्होंने अपनी बॉन्ड खरीद जारी रखी है। इससे उनका बॉन्ड में निवेश जून 2022 में बढ़कर 48.44 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो मार्च 2020 में 36.85 लाख करोड़ रुपये था। इसी अवधि में उनका जमा पोर्टफोलियो 135.71 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 167.33 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है।
बैंकों ने अपनी निवेश खाते में करीब 11.59 लाख करोड़ रुपये बढ़ाए हैं। ये उनकी जमा वृद्धि‍ का 36.65 फीसदी हैं, जबकि सरकारी बॉन्डों में 18 फीसदी निवेश ही अनिवार्य है। इसके लिए आरबीआई ने एचटीएम सीमा लगातार बढ़ाई है। इसे 19.5 फीसदी से बढ़ाकर 22 फीसदी और आखिरकार 23 फीसदी कर दिया गया है। ऐसा  यह सोचकर किया गया है कि एचटीएम सीमा जून 2023 तिमाही से चरणबद्ध‍ तरीके से घटाकर 19.5 फीसदी की जाएगी। इससे बॉन्ड की मांग पैदा हुई है और सरकार को पिछले दो साल में रिकॉर्ड उच्च उधारी कार्यक्रम पूरा करने में मदद मिली है। सरप्लस तरलता की वजह से भी बैंकों को अपनी सरकारी बॉन्ड खरीद बढ़ाने में मदद मिली है। क्या आरबीआई इस साल भी यह सुनिश्चित करने के लिए कोई नियामकीय मोहलत देगा कि सरकार आसानी से उधारी पाए और बैंकों की बैलेंस शीट भी अच्छी बने रहे? क्या वह एचटीएम सीमा बढ़ाएगा और बैंकों को उसी कीमत पर इस बास्केट में बॉन्ड के हस्तांतरण की मंजूरी देगा, जिस कीमत पर वे खरीदे गए थे? या वह अगले चार से छह तिमाहियों में चरणबद्ध‍ तरीके से एमटीएम नुकसान को वहन करने का मौका मुहैया कराएगा?
अगर ऐसा नहीं किया गया तो बैंक लाल निशान पर होंगे, लेकिन इस नुकसान से उनकी पूंजी में उतनी कमी नहीं आएगी, जितना वे नियामकीय जरूरत पूरी करने में पीछे रहेंगे। अगर आरबीआई कोई छूट नहीं भी देता है तो कोई अचंभा नहीं होगा क्योंकि फंसे ऋणों के लिए कम प्रावधान की जरूरत और ऊंचे शुद्ध‍ ब्याज मार्जिन से बैंकों को कुछ हद तक ट्रेजरी नुकसान की भरपाई करने में मदद मिलेगी।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)

First Published - July 7, 2022 | 12:49 AM IST

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