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कारोबार में उलझी सरकार, 2021 के विनिवेश लक्ष्यों को जल्द से जल्द लागू करने की जरूरत

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सरकार को तत्काल 2021 की विनिवेश नीति की तरफ लौटना चाहिए क्योंकि निजीकरण ही सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की कार्य संस्कृति में आमूल-चूल बदलाव ला सकता है। बता रहे हैं अजय त्यागी

Last Updated- August 27, 2025 | 10:24 PM IST
Disinvestment

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2021 में आयोजित एक वेबिनार में ठीक ही कहा था कि ‘सरकार को स्वयं कारोबार करने के झमेले में नहीं पड़ना चाहिए’। उनका यह संक्षिप्त भाषण काफी संजीदगी से तैयार किया गया था और इसमें अंतर्निहित संदेश पूरी तरह स्पष्ट था। प्रधानमंत्री के उक्त बयान के बाद वित्त वर्ष 2021-22 के लिए प्रस्तुत बजट में ‘सभी गैर-रणनीतिक एवं रणनीतिक क्षेत्रों में विनिवेश’ की घोषणा की गई। बजट में वित्त वर्ष 2022 में विनिवेश के माध्यम से 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया।

दुर्भाग्यवश, ऐसी अनेक महान घोषणाओं की तरह वास्तविकता बिल्कुल भिन्न निकली है। वास्तव में नीतिगत स्तर पर मामला बिल्कुल उल्टा दिखाई दे रहा है। विनिवेश अब वित्त वर्ष 2021 से पूर्व की तुलना में भी कम हो गया है।

राजस्व घाटे पर अंकुश के लिए राजस्व के एक अतिरिक्त स्रोत का इंतजाम करने के लिए बजट में सालाना विनिवेश लक्ष्य तय करने का चलन शुरू हुआ था। लेकिन जैसा कि हम इस स्तंभ में विचार कर रहे हैं, विनिवेश का उद्देश्य केवल राजस्व के एक अतिरिक्त स्रोत का ही इंतजाम करना नहीं है। वास्तव में अन्य बातें राजस्व सृजन के मकसद से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

वाणिज्यिक गतिविधियां संभालने की सरकार की क्षमता पर बहस करने से पहले नागरिकों के प्रति लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की समग्र भूमिकाओं और जिम्मेदारियों पर विचार किया जाए। ये वास्तव में दिमाग को झकझोर देने वाली हैं और कभी-कभी समझ से भी परे हो जाती हैं।

क्षमतागत बाधाओं के कारण सरकार को उन कार्यों को प्राथमिकता देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है जिन्हें उसे अवश्य करना चाहिए और जो (कार्य) दूसरों के द्वारा किए जा सकते हैं। सरकार के समक्ष स्वाभाविक कार्यों में रक्षा, पुलिस-प्रशासन, न्याय, कानून प्रवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, लोक कल्याण और इनके साथ प्राथमिक शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल जैसे आवश्यक क्षेत्र शामिल हैं। ये ऐसे कार्य हैं जिन्हें पूरी तरह से बाजार के हवाले नहीं किया जा सकता। अकेले ये भूमिकाएं किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी हैं। यहां तक कि सबसे कुशल सरकारों के लिए भी सार्वजनिक अपेक्षाओं पर खरा उतर पाना मुश्किल होता है।

अब वाणिज्यिक उद्यमों के सरकारी स्वामित्व के विषय पर बात करते हैं। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में नेहरूवादी समाजवाद के सिद्धांतों के अनुरूप सरकारी नियंत्रण की संकल्पना के साथ कई सार्वजनिक उद्यम (पीएसई) स्थापित किए गए थे। नेहरूवादी समाजवाद में राष्ट्र के आर्थिक विकास को दिशा देने के लिए प्रमुख उद्योगों एवं संसाधनों को सरकारी नियंत्रण में रखने की परिकल्पना की गई थी। जैसे-जैसे भारत एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता गया, खासकर 1991 के बाद, अधिकांश क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोल दिया गया।

वाणिज्यिक मामलों से निपटने में सरकार की सीमा से सभी अवगत हैं। देश में अफसरशाही के जोखिम से दूर रहने की प्रवृत्ति, संभावित परिणामों के बजाय प्रक्रियाओं पर अधिक ध्यान, जवाबदेही की बहुलता सहित अन्य कारण ऐसे मामले हल करने में सरकारी प्रयासों के आड़े आते हैं। निजी क्षेत्र के परिपक्व होने के साथ सरकार ने अपना दायरा समझते हुए और लगातार बढ़ते राजकोषीय घाटे को रोकने के लिए गैर-कर प्राप्तियों को बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की और धीरे-धीरे विनिवेश प्रक्रिया शुरू की।

वर्ष 1999 में विनिवेश विभाग की स्थापना एक अलग विभाग के रूप में की गई थी। इस विभाग का नाम कई बार बदला जा चुका है लेकिन संभवतः 1999 और 2004 के बीच वाजपेयी सरकार के दौरान किए गए महत्त्वपूर्ण विनिवेश को छोड़कर सरकार द्वारा किए गए किसी भी दूसरे अहम विनिवेश के बारे में चर्चा करने के लिए कुछ भी नहीं है।

राजनीतिक नफा-नुकसान के अलावा विनिवेश के मोर्चे पर अधिक कामयाबी नहीं मिलने के पीछे संबंधित मंत्रालयों द्वारा अपना नियंत्रण एवं संरक्षण छोड़ने में आनाकानी, परेशानी में पड़ने का डर (परिसंपत्तियां कम मूल्य पर बेचने के संभावित आरोपों के कारण सीबीआई, विजिलेंस आदि के जांच दायरे में आने की आशंका) आदि जिम्मेदार हैं। इनके बाद ऐसे कारण गिनाए जाते हैं जिनसे विनिवेश की प्रक्रिया और पेचीदा हो जाती है और आगे नहीं बढ़ पाती। विनिवेश की प्रक्रिया अटकाने के पीछे तर्क दिए जाते हैं कि पीएसई लोक उद्देश्य की पूर्ति करते हैं (इसका जो भी मतलब हो), अधिकतम मूल्य हासिल करने के लिए पहले पुनर्गठन की कथित आवश्यकता (एक कभी न खत्म होने वाली कवायद) है, लाभ कमाने वाले उद्यमों को क्यों बेचा जाना चाहिए (मानो निजी क्षेत्र केवल नुकसान में चलने वाले उद्यमों को ही खरीदेगा) और अंत में, ‘रणनीतिक’ कारणों का बहाना देना (जिसका इस्तेमाल सबसे अधिक होता है) आदि।

पीएसई में सरकारी पूंजी का फंसा होना ही एकमात्र मुद्दा नहीं है। सरकार प्रवर्तक एवं मालिक के रूप में विभिन्न संबंधित निगमित गतिविधियों में भी शामिल है। सार्वजनिक उद्यम चयन बोर्ड (पीईएसबी), वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो (एफएसआईबी) और कई चयन समितियों जैसे संस्थानों की स्थापना पीएसई बोर्डों में निदेशकों की नियुक्ति सुविधाजनक बनाने के लिए की गई है, जिनमें बैंकिंग और वित्तीय संस्थान भी शामिल हैं। इसके अलावा, एक मंत्रिमंडलीय समिति (कैबिनेट की नियुक्ति समिति) विशेष रूप से अन्य सरकारी नियुक्तियों के अलावा ऐसी नियुक्तियों को मंजूरी देने के लिए अधिकृत की गई है।

वास्तव में कुछ मंत्रालयों एवं विभागों के अस्तित्व का एकमात्र मकसद पीएसई आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। उन्हें खत्म करने या उनके कार्यों को कम करने से अटके संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार के पास करने के लिए पहले से ही कई महत्त्वपूर्ण दायित्व हैं और वाणिज्यिक उद्यमों को संभालने की इसकी क्षमता भी सीमित है। इसे देखते हुए पीएसई चलाने में समय, ऊर्जा और संसाधन क्यों बरबाद किए जाएं। यह अलग बात है कि कुछ पीएसई अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। यह सोच सरकार के ‘न्यूनतम सरकार’ के अन्य घोषित लक्ष्य के साथ भी मेल खाती है।

पीएसई अक्सर क्षेत्रीय नियामकों से विभिन्न छूट मांगते हैं। उदाहरण के लिए सूचीबद्ध पीएसई अक्सर कई मापदंडों पर अन्य सूचीबद्ध कंपनियों के मुकाबले अपने मामलों में बाजार नियामक से अलग व्यवहार की उम्मीद करते हैं। यह नियामकीय ढांचे को विकृत करता है और बाजार अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

चिंता की बात तो यह भी है कि सरकार इक्विटी और आसान ऋणों के माध्यम से पीएसई में पर्याप्त पूंजी डालती रही है। मूल्यांकन बढ़ाने की आड़ में सरकार के इस कदम का आलोचनात्मक विश्लेषण जरूरी है। इस दावे को सही ठहराने के लिए प्रदर्शन के प्रमुख संकेतक क्या हैं? क्या ऐसी नीति पूर्व में प्रभावी साबित हुई है? सरकार कोविड महामारी के बाद वार्षिक बजट में सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में पूंजीगत व्यय बढ़ाने और व्यय की गुणवत्ता में सुधार का श्रेय लेती रही है। सरकार यह नहीं बता रही है कि इस पूंजीगत व्यय का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी और ऋण के रूप में पीएसई में जा रहा है। यह हिस्सा वित्त वर्ष 2025 के बजट में प्रस्तावित 10.2 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय का 50 फीसदी से अधिक है।

सरकार को तत्काल अपनी 2021 की नीति पर वापस लौटकर और उचित योजना के साथ तय समयसीमा के साथ इसे सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है। छोटी-छोटी हिस्सेदारी बेचने में समय और ऊर्जा जाया करने के बजाय चयनित पीएसई के निजीकरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। केवल निजीकरण ही पीएसई की कार्य संस्कृति को बदल सकता है, निवेशकों के विश्वास को बढ़ा सकता है, उनके परिचालन का बोझ कम कर सकता है और पूरे पीएसई तंत्र में सुधार ला सकता है। विनिवेश प्राप्तियों पर ध्यान देने के बजाय विनिवेश के लिए सही कार्य योजना तैयार करने में ये सभी महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।


(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में फेलो, सेबी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व आईएएस अधिकारी हैं)

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First Published - August 27, 2025 | 10:06 PM IST

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