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वैश्वीकरण, नया और पुराना

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 3:18 AM IST

वैश्वीकरण के कुछ पारंपरिक स्वरूप (वस्तुओं, मुद्रा और लोगों का मुक्त आवागमन आदि) आंशिक तौर पर वापसी पर हैं लेकिन नए एजेंडों के केंद्र में आने के साथ ही वैश्वीकरण बदल भी रहा है।
ये नए कदम जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने, वैश्विक कंपनियों पर कर लगाने, आतंकवाद से निपटने, टीकों को साझा करने आदि से संबंधित हैं। एक अधिक एकीकृत विश्व में सीमा पार की दिक्कतें विभिन्न देशों को मजबूर कर रही हैं कि वे एक साथ आएं। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब वैश्वीकरण के पारंपरिक तत्त्व शिथिल हो रहे हैं। पुराना वैश्वीकरण भारत के लिए बेहतर था जबकि नए वैश्वीकरण में अच्छी-बुरी दोनों तरह की बातें हो सकती हैं। उदाहरण के लिए विश्व व्यापार की वृद्धि दर वैश्विक जीडीपी की वृद्धि दर से धीमी हो गई है। इसने एक दीर्घकालिक रुख को महत्त्वपूर्ण ढंग से पलट दिया। बीते सात वर्षों में से केवल एक वर्ष ऐसा रहा जब वाणिज्यिक व्यापार का आकार विश्व अर्थव्यवस्था से तेज गति से बढ़ा। सन 2019 में विश्व व्यापार दशक में पहली बार कम हुआ। सन 2020 में महामारी के कारण एक बार फिर ऐसा हुआ। कई देश संरक्षणवादी उपायों को बढ़ावा दे रहे हैं इनमें भारत भी शामिल है।
लोगों के अबाध आवागमन पर विचार कीजिए। दुनिया के आधे से अधिक प्रवासी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में रहते हैं और उनकी तादाद में भी हल्की गिरावट आई है। ब्रेक्सिट और डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों से यही संकेत निकला कि पुरानी आव्रजन व्यवस्था को पलटने की प्रक्रिया तेज हो रही है। पश्चिम एशिया के कुछ देशों ने वीजा नीतियों का कड़ा विरोध किया है। यदि ये नए रुझान बरकरार रहते हैं तो भारत को नुकसान होगा। यह दुनिया में प्रवासियों का सबसे बड़ा जरिया है। यही वजह है कि वह धनप्रेषण के मामले में भी दुनिया में अव्वल है।
मुक्त विश्व व्यापार ने बीते तीन दशक में भारत को बहुत लाभ पहुंचाया है। अवसर अभी भी बरकरार है। कई देश दुनिया के सबसे बड़े विनिर्माता और ताकतवर कारोबारी देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। भारत इस अवसर का लाभ उठा सकता है लेकिन अन्य देशों के पास पहले कदम उठाने का लाभ है। वैश्वीकरण के अन्य तत्त्व अक्षुण्ण हैं। मिसाल के तौर पर भारत के लिए उपयोगी पूंजी का सीमा पार आवागमन, क्योंकि भारत पूंजी का शुद्ध आयातक है। इसके बाद नई तकनीक का प्रभाव भी है जिसने थॉमस फ्रीडमैन के ‘फ्लैट वल्र्ड’ के सिद्धांत को जन्म दिया जिसमें कहा गया कि दुनिया में समान कारोबारी माहौल निर्मित हो रहा है। बेंगलूरु में बैठा कोई अंकेक्षक बॉस्टन के किसी व्यक्ति के कर का आकलन कर सकता है और कोलकाता का कोई रेडियोलॉजिस्ट लंदन में बैठे मरीज के मेडिकल स्कैन का विश्लेषण कर सकता है। देश की आईटी सेवा क्रांति को कोई खतरा नहीं है। वैश्वीकरण के दूसरे चरण का क्या? अब यह केवल सरकार के एजेंडे के रूप में ही रह गया है। वह देशों और कारोबारों को कैसे प्रभावित करता है यह बात तो आने वाले समय में ही पता चल सकेगी। सरकार का एजेंडा सेट करना भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है क्योंकि अभी भी वह अनिवार्य रूप से नियम पालन करने वाला है, न कि नियम बनाने वाला। ऐसे में इसका कोई भी लाभ या लागत संयोग आधारित ही होगी। नई अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट कराधान प्रणाली भी एक विषय है जिस पर फिलहाल काम किया जा रहा है। यह उस देश मेंं चुकाए जाने वाले न्यूनतम कर की दर तय करती है जहां राजस्व अर्जित होता है। भारत को इससे प्रसन्न होना चाहिए लेकिन नई व्यवस्था के लागू होने के बाद प्राथमिक लाभार्थी अमीर देश ही होंगे।
जलवायु परिवर्तन एजेंडे की स्थिति और अनूठी है। भारत 2015 के पेरिस समझौते को लागू करने को उत्सुक है लेकिन उसे नई तकनीक अपनाने और पुरानी कोयला आधारित तकनीक त्यागने पर कोई वित्तीय या तकनीकी मदद नहीं मिलेगी। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से जवाबदेह देशों को रियायत मिलेगी। टीकों की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति के मामले मेंं भी हालिया जी 7 बैठक में जिस आंकड़े पर सहमति बनी है वह उल्लेखनीय नहीं है जबकि भारत की कोविड टीके पर पेटेंट समाप्त करने की मांग पर अभी ध्यान दिया जाना बाकी है।
नए वैश्वीकरण का सबसे अहम तत्त्व है सोशल मीडिया मंचों का विकास। बड़ी टेक कंपनियां इस क्षेत्र पर काबिज हैं लेकिन भारत समेत कई देशों में उनका संप्रभु राज्य शक्ति से टकराव हुआ है। अब वक्त आ गया है कि वैश्विक कारोबार के लिए नियम तय हों।

First Published : June 25, 2021 | 8:21 PM IST