चूंकि अब मौद्रिक राहत या वित्तीय मदद की बहुत अधिक गुंजाइश नहीं बची थी, इसलिए इस महीने की शुरुआत में जब जी-20 शिखर सम्मेलन के नतीजों से किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ।
इस सम्मेलन के दौरान किसी ठोस कदम के मुकाबले एक दूसरे की उम्मीदों के बीच संतुलन बिठाने की कोशिश ही अधिक दिखाई दी। ऐसे में, उन्हें लगता है कि कुछ सफलता हासिल कर ली गई है। इस सम्मेलन के बाद से दुनिया भर के बाजारों में शेयर (और अत्यधिक ब्याज वाले बॉन्ड) की कीमतों में उछाल आया है।
लगता है कि (गैर बंधक) परिसंपत्तियों द्वारा समर्थित प्रतिभूतियों (एबीएस) की कीमतों में स्थिरता आ गई है और नए कॉर्पोरेट बॉन्ड जारी करने की शुरुआत हो गई है। इसके साथ ही तांबा और दूसरी जिंसों की कीमतों में एक बार फिर तेजी की संभावना बनने लगी है। क्या पिछले साल सितंबर में लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने की घटना की तरह ही हम एक बार निर्णायक मोड़ पर हैं।
कुल मिलाकर शायद बेहतर यह होगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर बहुत अधिक आशावादी न हुआ जाए। सम्मेलन के मेजबान प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन जाहिर तौर पर खुश दिख रहे थे- ठीक ऐसे ही हालात में 1933 में लंदन में हुए आर्थिक सम्मेलन की असफलता के मुकाबले मौजूदा सम्मेलन काफी सफल रहा है।
इसमें आश्चर्य नहीं है कि ब्राउन ने सम्मेलन के दौरान इस बात का जोर शोर से प्रचार किया कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा वैश्विक भरपाई के लिए 1,100 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता जताई गई है। इस सम्मेलन से कई उम्मीदें भी जगी हैं, जिनमें से कुछ नई हैं और कुछ को दोहराया गया है।
जॉन हॉप्किंस विश्वविद्यालय (और इससे पहले आईएमएफ में काम कर चुके) अरविंद सुब्रमण्यन ने इन आंकड़ों को ‘घुमाव’ की संज्ञा दी है। हो सकता है कि ऐसा ही हो, लेकिन फिर जैसा पहले डर लग रहा था, उसके मुकाबले नतीजे काफी बेहतर आए हैं। इस दौरान अमेरिकाइंगलैंड और फ्रांसजर्मनी के बीच टकराव की नौबत आ गई थी, हालांकि मामला संभल गया।
अमेरिका और इंगलैंड वित्तीय राहत की जरूरत पर जोर दे रहे थे जबकि फ्रांस तथा जर्मनी सख्त नियमन और आगे वित्तीय राहत नहीं देने की वकालत कर रहे थे। (यहां तक कि बैंक ऑफ इंगलैंड के गवर्नर ने भी वित्तीय या मौद्रिक राहत देने के प्रति चेतावनी देते हुए कहा कि अब जबकि हालात सुधर रहे हैं, ऐसे किसी कदम से मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है।)
एक बार तो अपनी मांग पूरी नहीं होने की दशा में फ्रांस ने सम्मेलन का बहिष्कार करने की धमकी दे दी। इस कारण एंग्लो सैक्सन अर्थव्यवस्था और फ्रांस तथा जर्मनी के उद्देश्यों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए। फ्रांस और जर्मनी को अब और अधिक वित्तीय राहत की जरुरत नहीं है क्योंकि उनके बेरोजगारों को बेहतर ढंग से मदद और सहारा मिला हुआ है।
दूसरी ओर अमेरिका में लाखों लोगों को आने वाले महीनों में बेरोजगारी भत्ता मिलना बंद हो जाएगा क्योंकि यह केवल 59 सप्ताह के लिए ही है। कई वर्षों के सूखे के बाद आईएमएफ अचानक एक बार फिर भुगतान संतुलन सहायता के कारोबार में वापस आ गया है। अब पूंजी का प्रवाह कई विकासशील देशों और उभरते बाजारों की ओर मोड़ा जा रहा है।
इन देशों में से कुछ को भुगतान संतुलन सहायता की बेहद जरूरत है। पूर्वी और केंद्रीय यूरोप के देशों को ही मोटे तौर पर 500 अरब डॉलर के ताजा वित्त की जरूरत है, जो चालू वित्त वर्ष के दौरान उनके कुल चालू खाता घाटे और ऋण उत्तरदायित्व परिपक्वता के बराबर है। कई अफ्रीकी देश भी बुरी हालत में हैं।
हालांकि, राहत की बात यह है कि पूंजी प्रवाह की दिशा बदलने और जिंसों की कीमतों में आई कमी के कारण इनमें से कई देश अपने व्यापार संतुलन और पूंजी खातों को संभाल पाए हैं। क्या आईएमएफ को 500 अरब डॉलर के अतिरिक्त संसाधन मिलेंगे, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है। इसमें से ज्यादातर राशि अतिरिक्त भंडार वाले देशों से द्विपक्षीय उधारी के जरिए जुटाई जाएगी।
अमेरिका ने 100 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इसके लिए अभी कांग्रेस की मंजूरी मिलनी बाकी है। चीन अपने कोटे को बढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अच्छी तरह से योगदान कर सकता है। जी-20 से हेज फंडों सहित वित्तीय बाजारों और उनके खिलाड़ियों पर सख्त नियंत्रण की प्रतिबद्धता भी जाहिर की है।
वित्तीय सेवाओं के सख्त निगमन की राह में सबसे बड़ी बाधा वाल स्ट्रीट जर्नल और वाशिंगटन में नीतिनिर्माताओं के बीच संपर्क बहाल होने को लेकर है। पूंजीवाद अमेरिका में आज भी जिंदा है और फलफूल रहा है। कई वित्त मंत्रियों को सीधे निवेश बैंकों (रॉबिन, पॉलसन) से नियुक्त किया गया है, या वे उसके साथ घनिष्ठता के साथ जुड़े रहे हैं(न्यूयार्क फेडरल के गवर्नर गाइटनर)।
राष्ट्रपति के सर्वाधिक वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार लॉरेंस समर्स व्हाइट हाउस से जुड़ने से पहले हेज फंडों से सलाह शुल्क के तौर पर लाखों डॉलर हासिल कर चुके हैं। ऐसे लोगों का दिल इस बात के लिए कैसे गवारा करेगा कि अपने पूर्व भुगतानकर्ताओं के लिए सख्त नियमन लागू किए जाएं। क्या बैंकों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अंतरंग रिश्तों के कारण ही उस नीति को लगातार अपनाया जा रहा है, जिसके तहत मुनाफा निजी क्षेत्र के खाते में जाता है जबकि घाटा सामाजिक क्षेत्र को उठाना पड़ता है।
चिंता का एक प्रमुख मुद्दा आरक्षित मुद्रा के तौर पर डॉलर की स्थिति के बारे में है, जिस पर जी-20 में चर्चा नहीं हुई, या कम से कम खुले तौर पर चर्चा नहीं की गई। खासतौर से अमेरिका और चीन के बीच व्यापार असंतुलन और डॉलर प्रतिभूतियों में चीन के भारी निवेश ऐसे गंभीर मुद्दे हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकते हैं।
जी-2 – अमेरिका और चीन, के बीच इस बारे में तत्काल और बहुत कुछ गहन चर्चा किए जाने की जरूरत है। क्या वे पहले ही इसकी शुरुआत कर चुके हैं? इस बीच, 250 अरब डॉलर के प्रस्तावित एसडीआर निर्गम को अगर जारी किया जाता है तो इससे एक आरक्षित मुद्रा को तौर पर एसडीआर को बढ़ावा देने में थोड़ी मदद ही मिल सकेगी।
पहली बात यह है कि इस निर्गम का बड़ा हिस्सा धनी देशों को जाएगा। दूसरी बात, जो पक्ष आवंटन को उपयोगी संसाधनों में तब्दील करना चाहेंगे तो इसके लिए आईएमएफ को इस बात की व्यवस्था करनी होगी कि कोई सरप्लस वाला देश किसी बड़ी मुद्रा के बदले एसडीआर को खरीद ले।