प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशव्यापी लॉकडाउन (तब आम सोच यही थी कि लॉकडाउन लगाकर संक्रमण का सिलसिला रोका जा सकेगा) की घोषणा किए जाने के दो वर्षों बाद भी महामारी का पूरी तरह अंत नहीं हुआ है। वायरस का ओमीक्रोन स्वरूप अभी भी फैल रहा है और दुनिया के कई हिस्सों में संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके लिए ओमीक्रोन का एक नया और ज्यादा संक्रामक स्वरूप जिम्मेदार हो सकता है। इसके बावजूद ज्यादातर देशों में लोगों के अस्पताल में दाखिल होने या मौत के मामले इतने अधिक नहीं हैं कि नीति निर्माता चिंतित हों और यही वजह है कि सार्वजनिक रूप से मास्क लगाने के अलावा कोविड से जुड़े तमाम सार्वजनिक प्रतिबंध लगभग समाप्त हो चुके हैं। ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि पूरी आबादी को अब तक टीकों की पूरी खुराक नहीं लग सकी हैं। टीके की पात्रता रखने वाली करीब 96 फीसदी आबादी को कम से कम एक खुराक लग चुकी है लेकिन इनमें से बड़ी तादाद में लोग दूसरी खुराक लगवाने नहीं गए। अधिकांश अन्य देश मसलन यूरोप के मुल्क और अमेरिका आदि ने ओमीक्रोन से आगे बढ़ते हुए अपनी पूरी आबादी को बूस्टर खुराक लगवाने को कहा है लेकिन भारत में बूस्टर खुराक केवल बुजुर्गों तक सीमित है। ओमीक्रोन के साथ जीने की बात करें तो यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि टीकाकरण किस प्रकार कराया गया है तथा चिकित्सकीय स्वीकृति वाली बूस्टर खुराक आबादी को दी गई है या नहीं।
हमारे देश में शुरुआती दौर में जो लॉकडाउन लगाया गया वह दुनिया के सबसे कड़े लॉकडाउन में से एक था। उसकी वजह से बहुत बड़ी तादाद में लोगों को अपनी आजीविका गंवानी पड़ी और अपने घरों से दूर होना पड़ा। लॉकडाउन के दौरान शहरों से प्रवासी श्रमिकों के पैदल चलकर अपने गांवों को लौटने की तस्वीरों ने देश की चेतना को झकझोर कर रख दिया था। सरकार ने हमेशा लॉकडाउन के कड़े प्रावधानों का बचाव किया। उसका तर्क रहा है कि इसकी बदौलत ही महामारी की पहली लहर में ज्यादा लोगों की जान नहीं गई जबकि इसकी अनुपस्थिति में ऐसा हो सकता था। इस बात को गंभीरता से लिया जाना चाहिए लेकिन इसे साबित करना लगभग असंभव है। निश्चित तौर पर इससे भारतीय राज्य की सीमाएं अवश्य उजागर हुईं।
भारत, टीकाकरण कार्यक्रम को अवश्य गहराई से तथा किफायती अंदाज में अंजाम देने में कामयाब रहा लेकिन शुरुआती प्रतिक्रिया में वह प्रवासी श्रमिकों की पीड़ा और निराशा को लेकर तत्काल समुचित कदम नहीं उठा पाया। यह सामाजिक सुरक्षा ढांचे में एक अहम कमी है जिसे अवश्य दूर किया जाना चाहिए।
भारत सरकार की दूसरी बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने अति आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया। इसी अति आत्मविश्वास के कारण अप्रैल और मई 2021 में कोविड की तबाही मचाने वाली दूसरी लहर आई। आम गतिविधियों को तेजी से खोलना, भीड़भाड़ वाले धार्मिक और राजनीतिक जलसों को इजाजत देना, कोविड संबंधी मानकों का पूरी तरह पालन न करना तथा संभावित स्वरूपों को लेकर जरूरी तेजी नहीं दिखाने के कारण डेल्टा स्वरूप का प्रकोप देश को झेलना पड़ा। दूसरी लहर में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा अवश्य वास्तविक से कम है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह कितना कम है। यहां निश्चित तौर पर सबक यही है कि तेजी से रूप बदल रहे वायरस के समक्ष अति आत्मविश्वास घातक हो सकता है। ऐसे में फिलहाल शायद कोविड से जुड़े तमाम मानकों को शिथिल करने के अनुकूल हों लेकिन सरकार को सतर्क रहना चाहिए। जब तक पूरी आबादी का टीकाकरण नहीं हो जाता और प्रभावी टीके की बूस्टर खुराक नहीं लग जाती, तब तक मौत और अस्पताल में दाखिल लोगों की संख्या में कभी भी इजाफा हो सकता है।