आपका पैसा

डॉलर के मुकाबले 90 के पार रुपया: क्या विदेश में पढ़ाई-इलाज और यात्रा पर बढ़ेगा खर्च?

अगर आप भविष्य में बच्चों की विदेश पढ़ाई, विदेश यात्रा या विदेश में इलाज की योजना बना रहे हैं तो रुपये की कमजोरी का असर काफी अहम हो सकता है

Published by
कार्तिक जेरोम   
Last Updated- December 14, 2025 | 9:39 PM IST

हाल में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 के पार चला गया है जिससे लगने लगा है कि रुपया अभी और गिरेगा। अगर आप भविष्य में विदेशी मुद्रा में खर्च यानी बच्चों को विदेश में पढ़ाना, विदेश यात्रा अथवा विदेश में चिकित्सा आदि की योजना बना रहे हैं तो रुपये में नरमी का प्रभाव काफी महत्त्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में निवेशकों को अपनी वित्तीय योजना बनाते समय मुद्रा में गिरावट को भी ध्यान में रखना चाहिए और ऐसे उपाय करने चाहिए जिससे  क्रय शक्ति में इस गिरावट को कम किया जा सके।

मुख्य वाहक

बढ़ता व्यापार घाटा रुपये को कमजोर करने वाला एक प्रमुख कारक रहा है। स्क्रिपबॉक्स के मैनेजिंग पार्टनर सचिन जैन ने कहा, ‘सोने के रिकॉर्ड आयात का इसमें बड़ा हाथ रहा है।’

विशेष रूप से अमेरिका को वस्तु निर्यात में कमी आई है। एलीवर के सह-संस्थापक और मुख्य निवेश अधिकारी (सीआईओ) करन अग्रवाल ने कहा, ‘विश्लेषकों का मानना है कि भारत का चालू खाते का घाटा वित्त वर्ष 2026 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.4 फीसदी तक बढ़ जाएगा, जबकि वित्त वर्ष 2025 में यह 0.6 फीसदी था।’

वैश्विक बाजार की धारणा ने दबाव को और बढ़ा दिया है। भारत की आय वृद्धि और मूल्यांकन संबंधी चिंताओं के साथ विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लगातार बिकवाली कर रहे हैं। एफआईआई ने 2025 में अब तक लगभग 1.55 लाख करोड़ रुपये (करीब 17 अरब डॉलर) की बिकवाली की है। इससे मुद्रा पर दबाव बढ़ा है।

धनवेस्टर की संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी अनुष्का सोहम बथवाल ने कहा, ‘भारत-अमेरिका व्यापार ढांचे को लेकर अनिश्चितता और पूंजी निर्माण में नरमी ने भी विदेशी निवेश को प्रभावित किया है।’

लक्ष्यों पर प्रभाव

रुपये में कमजोरी डॉलर से जुड़े सभी खर्चों की रुपये में लागत बढ़ा देती है। उदाहरण के लिए, अगर विनिमय दर 90 रुपये है तो 1,000 डॉलर की ट्यूशन फीस पर 90,000 रुपये का खर्च आता है लेकिन जब विनिमय दर 100 तक पहुंच जाती है तो खर्च 1 लाख रुपये हो जाता है। यह विदेश में खर्च की सभी श्रेणियों पर लागू होता है। बथवाल ने कहा, ‘यहां तक कि मामूली वार्षिक गिरावट का असर भी कई वर्षों में काफी दिखने लगता है। इससे बजट पर दबाव बढ़ जाता है।’

विदेश खर्च की योजना

पिछले कुछ समय में देखें तो डॉलर के मुकाबले रुपये में सालाना 3 से 5 फीसदी की गिरावट आई है। मगर इसमें उतार-चढ़ाव रहा है। इक्विरस फैमिली ऑफिस की मुख्य निवेश अधिकारी चंचल अग्रवाल ने कहा, ‘अमेरिका के मुकाबले मुद्रास्फीति और ब्याज दर में अंतर कम होने से गिरावट की रफ्तार थोड़ी कम होनी चाहिए।’ मगर विशेषज्ञों का सुझाव है कि डॉलर में खर्च संबंधी योजना बनाते समय दीर्घकालिक औसत 3 से 5 फीसदी रखना बेहतर रहेगा।

निवेशक अक्सर विदेश में शिक्षा के लिए आवश्यक रकम को कम करके आंकते हैं क्योंकि वे अपनी गणनाओं में केवल घरेलू मुद्रास्फीति का ध्यान रखते हैं। अग्रवाल ने कहा, ‘अगर विदेश की मुद्रास्फीति और मुद्रा में गिरावट को ध्यान में रखा जाए तो अंतिम आंकड़ा अलग होगा।’ जैन ने कहा कि वैश्विक शिक्षा या किसी अन्य विदेशी खर्च की योजना बनाने वाले निवेशक को कम से कम 11 से 12 फीसदी रिटर्न की उम्मीद करनी चाहिए।

प्रभावी हेजिंग

रुपये में गिरावट के प्रभाव से बचने के लिए निवेशक को अपने इक्विटी आवंटन का 15 से 20 फीसदी हिस्सा विदेशी परिसंपत्तियों में बनाए रखना चाहिए। ऐसा अंतरराष्ट्रीय ऐक्टिव फंड, एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ईटीएफ), इंडेक्स फंड या भारतीय म्युचुअल फंडों द्वारा पेश किए गए फीडर फंडों के जरिये किया जा सकता है। गुजरात इंटरनैशनल फाइनैंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) में आउटबाउंड फंड एक अन्य मार्ग प्रदान करते हैं। वेस्टेड और इंडमनी जैसे वैश्विक निवेश प्लेटफॉर्म विदेशी फंडों और ईटीएफ तक सीधी पहुंच प्रदान करते हैं।

जैन ने कहा, ‘अधिकतर निवेशकों के लिए बचाव का सबसे आसान साधन सोना है क्योंकि इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय कीमत को रुपये और डॉलर की वर्तमान विनिमय दर से गुणा करके तय की जाती है।’ सोने में 10 फीसदी का आवंटन पोर्टफोलियो को मुद्रा के जोखिम से बचाने में मदद कर सकता है। अग्रवाल ने कहा कि जापान, यूरोप, ब्रिटेन या अमेरिका में खर्च की योजना बना रहे निवेशक इन मुद्राओं के लिए वायदा अनुबंधों के जरिये भी अपना जोखिम कम कर सकते हैं।

इन गलतियों से बचें

आम तौर पर लोगों की सामान्य गलती यह होती है कि वे विदेश में खर्च की योजना बनाते समय केवल घरेलू मुद्रास्फीति पर ध्यान देते हैं। जैन ने कहा कि निवेशक अक्सर वैश्विक मुद्रास्फीति और मुद्रा रुझानों को नजरअंदाज कर देते हैं। बथवाल ने कहा कि कुछ निवेशक रुपया बनाम डॉलर में उतार-चढ़ाव को मापने की कोशिश करते हैं जो लगभग असंभव है। वैश्विक विविधीकरण से पूरी तरह बचना एक अन्य गलती है क्योंकि यह पोर्टफोलियो को मुद्रा और घरेलू बाजार के झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देता है।

First Published : December 14, 2025 | 9:39 PM IST