प्रतीकात्मक तस्वीर । फोटो : फ्रीपिक
फाइनैंशियल जगत में कुछ मान्यताओं ने बड़ी ही मजबूती से अपने पैर जमा रखे हैं। पिछले कई दशकों से निवेशक आंख मूंद कर इन पर भरोसा करते आए हैं। उदाहरण के लिए, निवेशक मानते आए हैं कि शेयर हमेशा सोने जैसे “गैर-उत्पादक” निवेशों से बेहतर होते हैं, सोना मुश्किल समय में सबसे सुरक्षित विकल्प है और डायवर्सिफिकेशन से मुनाफा घटता है। जबकि हकीकत में ये मान्यताएं सच से कोसों दूर हैं। DSP म्युचुअल फंड की एक नई रिपोर्ट इन मान्यताओं को चुनौती देती है। यह रिपोर्ट पिछले कुछ दशकों के ग्लोबल डेटा का इस्तेमाल कर दिखाती है कि हकीकत कहीं ज्यादा जटिल और रोमांचक है।
परंपरागत सोच कहती है कि जो संपत्तियां (Assets) नियमित आय देती हैं, जैसे स्टॉक्स, वे समय के साथ सोने जैसी रेगुलर इनकम देने वाली संपत्तियों से हमेशा बेहतर प्रदर्शन करती हैं। लेकिन DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट में 21वीं सदी के रिटर्न का विश्लेषण कुछ और ही कहानी बताता है।
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साल 2000 से सोने ने दुनिया के सभी बड़े शेयर बाजारों को लोकल करेंसी में पीछे छोड़ दिया है। जापान, ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में सोने ने घरेलू शेयर बाजारों की तुलना में ज्यादा कंपाउंड रिटर्न दिया।
यह रुझान उभरते बाजारों में भी देखा जा सकता है, जैसे भारत में, जहां सोने ने इस अवधि में शेयरों की तुलना में थोड़ा ज्यादा रिटर्न दिया है।
| विकसित बाजार (21वीं सदी का रिटर्न) | शेयर बाजार रिटर्न (लोकल करेंसी) | सोने का रिटर्न (लोकल करेंसी) | शेयरों पर सोने का अतिरिक्त रिटर्न |
|---|---|---|---|
| जापान | 5.4% | 13.0% | 7.6% |
| ब्रिटेन | 4.9% | 11.9% | 7.1% |
| फ्रांस | 4.2% | 10.5% | 6.3% |
| अमेरिका | 8.1% | 11.1% | 3.0% |
| कनाडा | 8.1% | 10.9% | 2.8% |
| ऑस्ट्रेलिया | 9.8% | 11.1% | 1.3% |
स्त्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट
सबसे चौंकाने वाली बात स्टॉक लेवल डेटा से सामने आती है। पिछले 20 वर्षों में भारत में NSE 500 के केवल 24% शेयर ही सोने से बेहतर रिटर्न दे पाए। वहीं अमेरिका में यह आंकड़ा और भी कम है, जहां S&P 500 के सिर्फ 5% शेयर ही सोने को पछाड़ सके।
| देश | इंडेक्स | 20 साल में सोने का रिटर्न | सोने से बेहतर रिटर्न देने वाले शेयरों की संख्या | सोने से बेहतर रिटर्न देने वाले शेयर (%) |
|---|---|---|---|---|
| भारत | NSE 500 | 15% | 115 | 24% |
| अमेरिका | S&P 500 | 11% | 25 | 5% |
| यूके | FTSE 100 | 13% | 1 | 1% |
| जापान | Nikkei 225 | 13% | 4 | 2% |
| चीन | CSI 300 | 11% | 80 | 29% |
स्त्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट
ये आंकड़े इस धारणा को सीधी चुनौती देते हैं कि शेयर, एक एसेट क्लास के तौर पर, सिर्फ “यील्ड देने वाला” होने के कारण अपने आप दौलत बना देते हैं।
हालांकि शेयर बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं, लेकिन लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन करने वाले शेयर चुन पाना निवेशकों की सोच से कहीं ज्यादा मुश्किल है। ऐसे में पोर्टफोलियो में सोने को बिल्कुल जगह न देना, हकीकत में कई निवेशकों के लिए महंगी गलती साबित हो सकता है।
इसी के बिल्कुल दूसरे छोर पर यह मान्यता है कि सोना सबसे सुरक्षित निवेश है और अनिश्चित समय में हमेशा शेयरों से बेहतर प्रदर्शन करता है। लेकिन DSP म्युचुअल फंड का रोलिंग रिटर्न एनालिसिस इस सोच पर भी ब्रेक लगाता है।
भारत, अमेरिका, यूरोप और चीन में पांच साल की रोलिंग रिटर्न के आंकड़ों को देखें तो सोना सिर्फ 23% से 50% समय ही शेयरों से बेहतर रिटर्न दे पाया। इसका साफ मतलब है कि लंबे समय तक ऐसे भी दौर रहे हैं, जब ज्यादा उतार-चढ़ाव के बावजूद शेयरों ने सोने से बेहतर रिटर्न दिया।
स्त्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट
सोने की ताकत इस बात में नहीं है कि वह हर समय शेयरों से ज्यादा रिटर्न दे। इसकी असली भूमिका तब सामने आती है, जब बाजार में तनाव होता है और शेयरों में गिरावट आती है। ऐसे समय में सोना नुकसान को संभालने में मदद करता है।
आंकड़े बताते हैं कि सोना पोर्टफोलियो को संतुलित और स्थिर रखने में ज्यादा उपयोगी है, न कि अकेले ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए।
सीधे शब्दों में कहें तो सोना जरूरी है, लेकिन सिर्फ सोना ही काफी नहीं। डर या हालिया तेजी को देखकर अगर सोने में जरूरत से ज्यादा पैसा लगाया जाए, तो जब शेयर बाजार फिर से उठता है, तब कमाई के अच्छे मौके हाथ से निकल सकते हैं।
डायवर्सिफिकेशन के आलोचक अक्सर कहते हैं कि अलग-अलग एसेट में पैसा लगाने से मुनाफा बंट जाता है और रिटर्न कम हो जाता है। लेकिन विकसित और उभरते बाजारों में किए गए DSP के मल्टी-एसेट एनालिसिस से यह दावा गलत साबित होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू शेयर, डेट, अंतरराष्ट्रीय शेयर और सोने को मिलाकर बना एक डायवर्स पोर्टफोलियो ज्यादातर बाजारों में शेयरों जैसे ही रिटर्न देता है, लेकिन उतार-चढ़ाव काफी कम रहता है।
उदाहरण के लिए भारत में, पिछले 20 वर्षों में घरेलू शेयरों ने करीब 11.7% का CAGR दिया, लेकिन इसमें उतार-चढ़ाव ज्यादा रहा। वहीं मल्टी-एसेट रणनीति ने लगभग उतना ही रिटर्न दिया, लेकिन जोखिम यानी वोलैटिलिटी करीब आधी रही।
अमेरिका को छोड़ दें तो जिन सभी बाजारों का अध्ययन किया गया, वहां लोकल करेंसी में मल्टी-एसेट पोर्टफोलियो ने घरेलू शेयरों से बेहतर प्रदर्शन किया।
| देश / क्षेत्र | महंगाई (20 साल CAGR) | शेयर रिटर्न | डेट रिटर्न | अंतरराष्ट्रीय शेयर रिटर्न | सोने का रिटर्न | मल्टी-एसेट रिटर्न | स्टैंडर्ड डिविएशन (घरेलू शेयर) | स्टैंडर्ड डिविएशन (मल्टी-एसेट) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उभरते बाजार (USD) | 6.1% | 3.5% | 5.5% | 6.1% | 11.2% | 6.1% | 19.6% | 12.6% |
| भारत | 6.5% | 11.7% | 7.6% | 9.9% | 15.3% | 12.3% | 21.1% | 11.2% |
| चीन | 2.1% | 8.4% | 3.9% | 7.6% | 10.4% | 10.0% | 25.3% | 13.8% |
| थाईलैंड | 1.6% | 2.9% | 2.9% | 4.7% | 9.8% | 5.1% | 18.3% | 10.3% |
| पाकिस्तान | 10.2% | 15.6% | 10.7% | 14.6% | 20.3% | 16.9% | 19.6% | 11.2% |
| जापान | 0.9% | 3.7% | 0.4% | 7.7% | 12.8% | 5.6% | 21.3% | 12.7% |
| अमेरिका | 2.5% | 8.9% | 2.8% | 2.9% | 11.2% | 7.7% | 19.5% | 11.3% |
| ब्रिटेन | 2.8% | 2.9% | 2.3% | 7.4% | 12.6% | 4.9% | 17.9% | 10.3% |
स्त्रोत: DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट
आंकड़े बताते हैं कि जब किसी एक एसेट का प्रदर्शन कमजोर रहता है, तो दूसरे एसेट अक्सर उसकी भरपाई कर देते हैं। इससे पोर्टफोलियो में उतार-चढ़ाव कम होता है और लंबे समय में कंपाउंडिंग बेहतर होती है। यह एक ऐसा फायदा है, जिसे निवेशक अक्सर सिर्फ एक एसेट से ज्यादा रिटर्न की तलाश में नजरअंदाज कर देते हैं।
संदेश बिल्कुल साफ है, डायवर्सिफिकेशन से रिटर्न खराब नहीं होता। यह जोखिम को कम करने का एक तरीका है, जिसे आंकड़े भी सही साबित करते हैं।
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DSP म्युचुअल फंड की नेत्रा रिपोर्ट ने निवेश से जुड़ी मान्यताओं पर से झूठ का पर्दा उठा दिया है। न तो शेयर हमेशा सोने से बेहतर होते हैं, न ही सोना हर बार शेयरों से आगे रहता है और न ही डायवर्सिफिकेशन अपने आप रिटर्न घटा देता है। असल में लंबे समय के नतीजे इस बात पर निर्भर करते हैं कि निवेश किस वैल्यूएशन पर किया गया, बाजार का चक्र कैसा रहा और पोर्टफोलियो कैसे बनाया गया।
निवेशकों के लिए सीख साफ है। सिर्फ एक सोच या एक कहानी पर भरोसा करने से सफलता नहीं मिलती। सही निवेश वही है, जो अनिश्चित हालात को ध्यान में रखकर किया जाए और ऐसा पोर्टफोलियो बनाया जाए जो हर तरह के बाजार में टिक सके।