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एनएसई बढ़ा सकता है लॉट साइज

Last Updated- December 08, 2022 | 5:41 AM IST

इस समय निफ्टी में अधिकांश कांट्रैक्टों की वैल्यू निर्धारित 2 लाख रुपये से काफी कम हो गई है।


इसको देखते हुए राष्ट्रीय शेयर बाजार (एनएसई) फ्यूचर्स कांट्रैक्ट में बदलाव कर सकता है। इस समय 265 कांट्रैक्टों में से 93 फीसदी भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा अनिवार्य की गई न्यूनतम कांट्र्रैक्ट  वैल्यू से नीचे आ गए हैं।

निर्धारित कांट्रैक्ट साइज के लिए जरूरी है कि लॉट साइज में इजाफा किया जाए ताकि सटोरियों को वायदा बाजार में कम लागत पर शॉर्टिंग से रोका जाए। उदाहरण के लिए एक कारोबारी किंगफिशर के 850 (लॉट साइज)शेयर 25 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से खरीद कर इसे इसी दिन वायदा और विकल्प बाजार में बेच सकता है।

यहां कारोबारी कीमत में हुई किसी भी प्रकार की गिरावट से फायदा बना सकता है। इसके लिए उसे अपनी होल्डिंग भी खोने की जरूरत नहीं। हालांकि डेरिवेटिव कारोबारियों ने इस समय कम वैल्यू वाले स्टॉक फ्यूचर्स में कोई आक्रमक पोजीशन नहीं ली है क्योंकि इस समय इन शेयरों का ओपन इंट्रेस्ट (ओआई) मई 2008 के स्तर का 60 फीसदी ही है।

उस समय निफ्टी 5,000 के स्तर के करीब था। उसके बाद से सूचकांक 2,650 अंक नीचे आया है। आंकड़ों के अनुसार 265 स्टॉक फ्यूचर्स में 163 से अधिक की वैल्यू एक लाख से कम है।

इनमें 44 की वैल्यू 50,000 से और 44 की तो 25,000 से भी कम है। 50 निफ्टी स्टॉकों में से केवल 10 फीसदी की ही कांट्रेक्ट वैल्यू दो लाख से अधिक है।

तीन स्टॉकों की कांट्रैक्ट वैल्यू तो 50,000 से भी कम है। इंडेक्स फ्यूचर्स में निफ्टी की कांट्रैक्ट वैल्यू 3.14 लाख रुपये के सर्वोच्च स्तर से घटकर 1.35 लाख रुपये हो गई तो सीएनएक्स आईटी फ्यूचर्स 2.46 लाख रुपये से कम होकर 1.18 लाख रुपये हो गया।

कीमत के लिहाज से फार्मा क्षेत्र के सबसे महंगे शेयर स्टरलाइट बायोटेक (कांट्रेक्ट वैल्यू 4.79 लाख रुपये), ल्युपिन (3.83 लाख रुपये) और ग्लैक्सो (3.52 लाख रुपये) हैं। एनएसई के शेष 16 स्टाकों में 2 और फार्मा कंपनियां हैं। इसके मायने हैं लगातार गिरते बाजार में भी फार्मा कंपनियों का प्रदर्शन दूसरे क्षेत्रों से बेहतर रहा।

दिसंबर 2007 में प्रमुख सूचकांकों के लगभग दोगुना हो जाने के बाद 105 स्टॉक फ्यूचर्स के कांट्रेक्ट साइज को कम किया था। एनएसई ने 13 फ्यूचर्स कांट्रेक्ट्स के आकार को एक चौंथाई कर, 74 को आधा और 14 को दोगुना कर दिया था।

कांट्रेक्ट साइज को कम किए जाने से छोटे निवेशकों 25 फीसदी मार्जिन मनी (और प्राइस में कमी आने के लिए स्थिति में मार्क टू मार्केट में) पर तीन माह के समय के लिए ब्लू चिप कंपनियों के शेयरों को खरीदने में मदद मिलेगी, बजाय इसके कि वे यह खरीदारी डिलिवरी से करके पूरी राशि चुकाएं।

First Published - November 26, 2008 | 9:23 PM IST

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