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इतिहास को याद कर रहा आंदोलन

Last Updated- December 10, 2022 | 2:13 AM IST

दिल्ली सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों ने आंदोलन में शहीद हुए 50 से अधिक साथियों को याद करते हुए साल 2020 को अलविदा कहा। दिल्ली सीमा पर आंदोलनरत किसान आंदोलन को 43 दिन से ज्यादा हो गए हैं और वे अभी अगले कई सप्ताह तक इसे जारी रखने की बात पर अड़े हैं। इतने बड़े स्तर पर होने वाले किसी आंदोलन में हिस्सा लेने वाले सभी आंदोलनकारी जानते हैं कि वे केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं।
इसमें शामिल कई लोग जानते हैं कि वे हालिया लड़ाई के मझधार में हैं जिससे उनकी जिंदगी तबाह हो रही है। इनमें से कई दशकों से चले आ रहे शहरीकरण, कृषि क्षेत्र में बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी, जैव विविधता को होने वाले नुकसान और खाद्य लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। कड़कती ठंड में बुजुर्ग महिला एवं पुरुषों का घर से दूर प्रदर्शन स्थल पर बैठना इस बात का गवाह है कि सत्याग्रह के लिए रोज गुजरते दिन के साथ आंदोलन के लिए उनका हौसला लगातार बढ़ रहा है और सरकार तथा राज्य उनके इस हौसले को नहीं डिगा सकते। प्रसिद्ध लेखक एवं कारोबारी अमन बाली ने अपने एक पॉडकास्ट में कहा, ‘यह आंदोलन भारतीय कृषि व्यवस्था में दशकों से चले आ रहे संकट की परिणति है। हरित क्रांति की भूमि पंजाब ने भी कई चुनौतियां देखी हैं, जिसमें जमीन में बढ़ते जहरीले अवयव, कैंसर की दवाइयों की बढ़ती मात्रा, जल स्तर का नीचे जाना और फसलों के विविधीकरण के लिए बनाई गई सरकारी नीतियों का विफल रहना शामिल है।’
इस प्रदर्शन को पंजाब में 100 से ज्यादा तथा दिल्ली सीमा पर 40 दिन हो चुके हैं और युवा किसान सरकार पर भरोसा करने का अपना धैर्य खो रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार सकारात्मक नीयत के साथ बातचीत नहीं कर रही है जिससे किसानों के बीच दरार पैदा करने का प्रयास हो रहा है। वे कुछ प्रमुख किसान संगठनोंं के साथ अलग से समानांतर बातचीत किए जाने की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रदर्शनकारियों पर मामला दर्ज कराकर उन्हें उकसाने एवं इस आंदोलन को हिंसा में बदलने का प्रयास किया जा रहा है।  इस आंदोलन में 472 से भी अधिक संगठन शामिल हैं जो इसे एक बहुत बड़े आंदोलन का स्वरूप देते हैं। इनमें से 32 प्रमुख संगठन आंदोलन की अगुआई कर रहे हैं तो वहीं 40 के करीब संगठन सरकार के साथ बातचीत में शामिल हैं। प्रत्येक संगठन में हजारों की संख्या में छोटे से लेकर बड़े किसान शामिल हैं। प्रदर्शन स्थल पर चल रही बातचीतों में कहीं जाटों का इतिहास खंगाला जा रहा है तो कहीं तीन शताब्दियों पहले के सिख-हिंदू इतिहास पर चर्चाएं जारी हैं। प्रत्येक शाम जाटों तथा सिखों के इतिहास पर बनाई गई फिल्में एवं डॉक्युमेंट्री चलाई जाती हैं। साथ ही, इससे पहले के किसान आंदोलन, विशेषकर वर्ष 1907 के किसान आंदोलन पर बनी वीडियो चलाई जाती हैं। रोज सुबह सिख तथा दूसरे युवा कड़ाके की ठंड में कसरत करते हैं।
समाजसेवी कार्यकर्ता एवं लेखक रविंद्र सिंह कहते हैं कि इस आंदोलन में पंजाबी प्रवासी न सिर्फ सामान देकर आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं बल्कि कम संख्या में ही सही, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर भी आंदोलन को मजबूत कर रहे हैं। शताब्दियों पूर्व उत्तरी अमेरिका गए पंजाबी किसानों ने वहां के किसानों की बदलती स्थिति को करीब से देखा है और उनका मानना है कि हालिया तीन कृषि कानून देश में एक विफल मॉडल की शुरूआत करेंगे। उनके अनुसार, नीति निर्माताओं के बीच शहरी-ग्रामीण विरोधाभास काफी अधिक देखा जाता है। उदाहरण के लिए एक किसान बताते हैं कि पिछले तीन सालों में सरकार द्वारा फसल विविधीकरण पर केवल 45 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं जबकि उन्होंने दर्जनों फ्लाईओवर, प्रतिमाओं और राष्ट्रीय राजधानी में प्रस्तावित सेंट्रल विस्टा के लिए अरबों रुपये खर्च कर दिए।
किसान, विशेषकर युवा मुख्यधारा के अखबारों एवं समाचार चैनलों में आंदोलन के खिलाफ सरकार द्वारा दिए जा रहे संदेश का विरोध भी कर रहे हैं और इसके लिए मुख्यत: सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है। यहां भी, प्रवासी सिख अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं।
किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल का कहना है कि ये तीनों कानून असंवैधानिक भी हैं क्योंकि सरकार ने राज्य सूची के विषय पर कानून बनाया है। आंदोलन के दौरान हो रही चर्चाओं में सरकार के खिलाफ अविश्वास भी दर्शाया गया है और किसानों में जमीन के मालिकाना हक को लेकर भी संशय देखा गया है। पंजाबी सिंगर जश बाजवा द्वारा गाया गया गाना, जाट तगड़ा होजा, शुरुआती सप्ताहों में आंदोलनकारियों का गीत बन गया था।  यहां गाए जा रहे गीतों में तीन शताब्दियों में बार बार भरोसा तोड़े जाने की बातें की जा रही हैं। जिसमें सम्राट औरंगजेब एवं बाद के मुगल राजाओं द्वारा दिल्ली से खदेड़ा जाना, ब्रिटिश राज में झेली गई चुनौतियां और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय को याद किया जा रहा है। गाने तीन केंद्रीय कानूनों को कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार की चाल के तौर पर दिखा रहे हैं। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री एवं कई विशेषज्ञ किसानों को आश्वस्त करने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि तीनों कानूनों के जरिये बड़ी निजी कंपनियों के कृषि क्षेत्र में आने ने ऐतिहासिक तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी के कंपनी राज से जुड़ी यादें ताजा कर दी हैं। अब किसान कुछ कंपनियों के उत्पादों का बहिष्कार कर रहे हैं और पंजाब में एक दूरसंचार कंपनी के मोबाइल टावरों को नुुकसान पहुंचा रहे हैं।  केवल यही नहींं, किसान, विशेषकर युवा किसान अटारी-वाघा बॉर्डर चेकपोस्ट के जरिये पाकिस्तान के साथ होने वाले सीमापार व्यापार को रोकने की बात कर रहे हैं। इस समय, किसानों के भीतर एक क्रांति की ज्वाला जल रही है। सरकार को इस दिशा में कदम बढ़ाने होंगे और कड़े कदमों के बजाय किसी नरम रुख को अख्तियार करना होगा।

First Published - January 6, 2021 | 11:38 PM IST

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