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भारत में विदेशी टीके लाने की कोशिश में जुटी सरकार

Last Updated- December 12, 2022 | 4:22 AM IST

केंद्र सरकार ने गुरुवार को कहा कि कोविड-19 के विदेशी टीकों को देश में लाने का हरसंभव प्रयास किया जा रहा है और वह राज्यों के प्रति अपने दायित्व पर कायम है। नीति आयोग के स्वास्थ्य सदस्य वी के पॉल ने ऐसे कुछ मिथकों को खारिज करने के क्रम में कहा कि टीकों को लेकर राज्यों की वैश्विक निविदाओं के फलीभूत न होने से वही बात पुष्ट हुई है जो केंद्र सरकार पहले दिन से कह रही थी: ‘दुनिया भर में टीकों की आपूर्ति कम है और अल्पावधि के नोटिस पर उनकी खरीद आसान नहीं।’ पंजाब, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने वैश्विक निविदा जारी कर विदेशी टीके खरीदने का प्रयास किया था। मॉडर्ना और फाइजर जैसी कंपनियां कह चुकी हैं कि वे केवल केंद्र सरकार के साथ सौदा करेंगी।
पॉल ने कहा कि ऐसे राज्य जो केंद्र सरकार द्वारा टीकाकरण अभियान शुरू करने के तीन महीनों के दौरान स्वास्थ्यकर्मियों और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों की तादाद भी अच्छी तरह नहीं बढ़ा सके वे टीकाकरण की प्रक्रिया खोलने और ज्यादा विकेंद्रीकरण के पक्ष में थे। पॉल ने कहा, ‘राज्यों को अच्छी तरह पता था कि देश में टीकों की उत्पादन क्षमता कितनी है और विदेशों से सीधे टीके खरीदने में क्या दिक्कत आ सकती है। बल्कि केंद्र सरकार ने जनवरी से अप्रैल तक टीकाकरण अभियान चलाया और मई के हालात की तुलना में उस अवधि में अभियान बेहतर चला।’
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार टीका निर्माताओं को फंड कर रही है और विदेशी टीकों को भारत में लाने के लिए जल्द मंजूरी देने और टीका उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र की उदार टीका नीति भी राज्य सरकारों द्वारा उन्हें ज्यादा अधिकार देने की मांग की बदौलत है। उन्होंने कहा कि देश में कोविड टीकों का उत्पादन बढ़ाने के क्रम में भारत बायोटेक की कोवैक्सीन का उत्पादन अक्टूबर तक एक करोड़ खुराक मासिक से बढ़ाकर 10 करोड़ खुराक मासिक हो जाएगा। इसके अलावा तीन सरकारी कंपनियों के भी दिसंबर तक 4 करोड़ खुराक बनाने का लक्ष्य है।
पॉल ने कहा कि सरकार के प्रयासों की बदौलत ही स्पूतनिक टीके के परीक्षण तेज हुए और उसे समय पर मंजूरी मिल सकी। रूस से इस टीके की दो खेप भारत आ चुकी हैं और तकनीक हस्तांतरण का काम पूरा हो चुका है। जल्दी ही भारत में इस टीके का उत्पादन आरंभ हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि सरकार रूस के साथ मिलकर यह सुनिश्चित कर रही है कि डॉ. रेड्डीज के साथ तालमेल में छह कंपनियां स्पूतनिक टीका बनाएं। सरकार जाइडस कैडिला, बायोई और जेनोवा के टीकों को भी समर्थन दे रही है। इनके लिए कोविड सुरक्षा योजना के तहत फंड आवंटित किए जा रहे हैं और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की ओर से इन्हें तकनीकी समर्थन भी मिल रहा है। पॉल ने कहा, ‘सन 2021 तक हमारे टीका उद्योग द्वारा 2 अरब से अधिक खुराकों के उत्पादन का अनुमान ऐसे ही प्रयासों और साझेदारियों का नतीजा है। आखिर दुनिया के कितने देश ऐसी व्यापक क्षमता हासिल करने का सोच भी सकते हैं। वह भी न केवल पारंपरिक बल्कि उन्नत डीएनए और एमआरएनए पद्धति से?’
अनिवार्य लाइसेंसिंग लागू करने के बारे में उन्होंने कहा कि यह कोई आकर्षक विकल्प नहीं था क्योंकि फॉर्मूला मायने नहीं रखता बल्कि सक्रिय साझेदारी, मानव संसाधन का प्रशिक्षण, कच्चे माल की उपलब्धता और उच्चस्तरीय जैव सुरक्षा प्रयोगशालाएं मायने रखती हैं। पॉल ने कहा, ‘हम अनिवार्य लाइसेंसिंग से एक कदम आगे बढ़ चुके हैं और हम भारत बायोटेक तथा तीन अन्य कंपनियों के बीच सक्रिय साझेदारी सुनिश्चित कर रहे हैं ताकि कोवैक्सीन का उत्पादन बढ़ाया जा सके। स्पूतनिक के लिए भी यही तरीका अपनाया जा रहा है।’
उन्होंने मॉडर्ना को भी उद्धृत किया जिसने अक्टूबर 2020 में कहा था कि वह अपना टीका बनाने वाली किसी कंपनी पर मुकदमा नहीं करेगी। लेकिन इसके बावजूद किसी कंपनी ने ऐसा नहीं किया है। पॉल ने कहा, ‘इससे पता चलता है कि लाइसेंसिंग कोई मसला है ही नहीं। यदि टीका बनाना इतना आसान होता तो विकसित देशों में टीकों की खुराक की कमी क्यों होती?’ उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों के टीकाकरण का निर्णय देश के वैज्ञानिक तभी लेंगे जब परीक्षणों के बाद पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध होंगे। उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई देश बच्चों को टीका नहीं लगा रहा है और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसकी अनुशंसा नहीं की है। पॉल ने कहा कि बच्चों पर टीके के सुरक्षित प्रभाव से जुड़े अध्ययन उत्साह बढ़ाने वाले हैं। भारत में भी बच्चों पर टीकों के परीक्षण जल्दी शुरू होंगे।

First Published - May 27, 2021 | 11:26 PM IST

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