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पाक के लिए क्यों जरूरी सिंधु नदी

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सिंधु जल समझौता स्थगित होने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा असर

Last Updated- May 13, 2025 | 9:32 AM IST
Pakistan
Representative Image

भले ही भारत और पाकिस्तान ने संघर्ष विराम कर समझौता कर लिया है मगर सिंधु जल संधि अभी भी सुर्खियां बटोर रही है। सन 1960 में दोनों देशों के बीच हुई इस संधि को भारत ने बीते 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद स्थगित कर दिया था।

विश्व बैंक की अध्यक्षता में भारत और पाकिस्तान ने यह संधि की थी और इसे दुनिया में सबसे टिकाऊ सीमा पार जल संधियों में से एक माना जाता है। संधि के तहत, भारत का सिंधु बेसिन में रावी, व्यास और सतलज जैसी तीन पूर्वी नदियों पर अधिकार है। वहीं, पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी नदियों पर आंशिक अधिकार है। ये तीनों नदियां के बेसिन के पानी का करीब 80 फीसदी हिस्सा हैं।

भारत के पास सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी का उपयोग जलविद्युत उत्पादन और सिंचाई जैसे कार्यों में करने का अधिकार है। संधि के अनुसार, हालांकि, भारत ऐसा कोई ढांचा नहीं बना सकता है जो इन तीनों नदियों के बहाव को प्रभावित करे। पाकिस्तान के लिए ये तीनों नदियां न केवल उसके कपास और धान के लिए बल्कि बागवानी उत्पादन के एक बड़े हिस्से में सिंचाई के लिए जीवन रेखा है।

पाकिस्तान की खेती-बाड़ी

एक अनुमान के मुताबिक 22 करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान दुनिया का पांचवां सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है। पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती की करीब 23 फीसदी हिस्सेदारी है और इसके 40 फीसदी से अधिक श्रमबल को रोजगार देती है, जिससे यह पड़ोसी मुल्क की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

कपड़ा को पाकिस्तान का सबसे बड़ा विनिर्माण और निर्यात का क्षेत्र माना जाता है, जो कपास  इसके मुख्य कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर है। देश का 75 फीसदी से अधिक निर्यात कृषि क्षेत्र से जुड़े हैं।

पड़ोसी मुल्क के 61 फीसदी से अधिक लोग ग्रामीण इलाकों में बसर करते हैं और मुख्य रूप से फसलों और पशुधन उत्पादन पर निर्भर हैं। कुल मिलाकर, हर तीन में से दो महिलाओं को कृषि-खाद्य क्षेत्र में काम मिलता है।

गेहूं, चावल, गन्ना, मक्का और कपास के साथ-साथ बागवानी की कई फसलें देश में उपजाई जाने वाली प्रमुख फसलों में से एक हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019-20 में पाकिस्तान में करीब 2.74 करोड़ टन गेहूं, 90 लाख टन मक्का, 85 लाख टन चावल, 8.1 करोड़ टन गन्ना और करीब 70.04 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ था। एक गांठ 175 किलोग्राम होती है।

विश्व बैंक की साल 2023 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की कृषि प्रणाली का प्रमुख तत्त्व पशुधन उत्पादन है, जो खासकर छोटे किसानों के लिए आवश्यक क्षेत्र माना जाता है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसमें बचत, पोषण (उप उत्पादों से प्रोटीन और लिपिड), ऊर्जा (जमीन जोतने और परिवहन के जरिये) और फसलों के जरिये पोषण हस्तांतरण (खाद) का एक आवश्यक स्रोत है।

मगर कृषि जीडीपी में करीब 60 फीसदी का योगदान देने वाले पशुधन क्षेत्र में एक फीसदी से भी कम सार्वजनिक निवेश किया जाता है।

आंकड़े दर्शाते हैं कि साल 2019-20 में सिंचाई के तहत इसका करीब 44 फीसदी क्षेत्र नहरों और ट्यूबवेल के जरिये था। पाकिस्तान के खेती का रकबा 2.3 करोड़ हेक्टेयर था, जिसमें से शुद्ध रूप से बोया गया रकबा 1.6 करोड़ हेक्टेयर था। पाकिस्तान के शुद्ध बोये गए रकबे का एक बड़ा हिस्सा पंजाब और सिंध में था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते 50 से 60 वर्षों में कृषि-खाद्य क्षेत्र को बड़े पैमाने पर हुए सार्वजनिक व्यय और समर्थन से फायदा हुआ है। पाकिस्तान की केंद्रीय और प्रांतीय दोनों सरकारों ने इनपुट सब्सिडी, सिंचाई के लिए पानी और बिजली पर सब्सिडी वाले टैरिफ और न्यूनतम गारंटी कीमतों से लेकर विभिन्न संसाधनों के जरिये भी कृषि का समर्थन किया है।

मगर रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बड़े पैमाने पर समर्थन के बावजूद पाकिस्तान का कृषि खाद्य क्षेत्र अन्य देशों के मुकाबले खराब प्रदर्शन करता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि सुधारों के दौरान बड़ी प्रगति के बावजूद पाकिस्तान में कृषि की सालाना वृद्धि साल 1970 से 2000 के बीच चार फीसदी से कम होकर तीन फीसदी से भी कम हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1991 से 2019 के बीच पाकिस्तान में प्रति श्रमिक कृषि उत्पादन सालाना 0.7 फीसदी की दर से बढ़ा, जो इसी अवधि में दक्षिण एशिया के औसतन 2.8 फीसदी के मुकाबले काफी कम है।

पाकिस्तान में गेहूं की औसत पैदावार चीन के मुकाबले आधी है और भारत के मुकाबले 15 फीसदी कम है। पाकिस्तान के मुकाबले चीन में कपास की पैदावार 2.3 गुना और बांग्लादेश की 1.7 गुना अधिक है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कृषि कार्यों में पाकिस्तान इतना पानी उपयोग करता है कि वह इसे कृषि जल उत्पादकता के लिहाज से 10 सबसे खराब देशों की जमात में खड़ा करता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान के कृषि खाद्य क्षेत्र का भी अपनी क्षमता के मुकाबले कमतर प्रदर्शन है, जिसमें प्रमुख फसलों की पैदावार क्षेत्र की क्षमता से 1.5 से 4.2 गुना कम है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कृषि अनुसंधान में पाकिस्तान का सार्वजनिक निवेश साल 1996 में कृषि के सकल घरेलू उत्पाद का 0.37 फीसदी था जो साल 2016 में कम होकर 0.12 फीसदी हो गया। भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका 0.3 से 0.6 फीसदी के बीच खर्च कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कृषि अनुसंधान पर होने वाला अधिकांश व्यय अभी भी उच्च मूल्य वाली फसलों और पशुधन उत्पादों के बजाय खाद्यान्न, गन्ना और कपास पर खर्च होता है तथा जलवायु-अनुकूल और बाजार-आधारित नवाचारों को बनाने और मूल्य-संवर्धन के लिए कटाई के बाद की प्रौद्योगिकियों में सुधार पर खर्च किया जाता है।’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान में भूमि वितरण अभी भी असामान्य है और सिर्फ 2 फीसदी किसानों के पास ही 45 फीसदी खेती वाली जमीनों के मालिक हैं। 2.5 एकड़ से कम जमीन वालों की किसानों की करीब 90 फीसदी तादाद है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘फिर भी उन्हें सार्वजनिक सब्सिडी का एक सीमित हिस्सा ही मिलता है, क्योंकि कई सब्सिडी खासकर एकड़ आधारित सब्सिडी से सबसे ज्यादा बड़े किसानों को लाभ पहुंचता है।’

पाकिस्तान में प्रति घन मीटर पानी से फसल उत्पादन में 130 ग्राम पानी की उत्पादकता है, जबकि भारत में यह 390 ग्राम, चीन में 800 ग्राम और अमेरिका में 1,560 ग्राम है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कृषि में पानी के उपयोग की आर्थिक उत्पादकता वैश्विक स्तर पर सबसे कम 10 फीसदी देशों में से एक है।’

पाकिस्तान की मिट्टी

आंकड़ों से पता चलता है कि पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा शुष्क से लेकर अर्ध शुष्क है, मिट्टी में नमक की मात्रा काफी अधिक है। ऊपर उठता पानी लवणों को घोलकर सतह पर ले आता है और वाष्पित हो जाता है। इस तरह सतह की मिट्टी में लगातार नमक शामिल होता रहता है। भूजल स्तर बढ़ने के साथ सतह पर नमक की मात्रा बढ़ती जाती है। जब भूजल स्तर सतह से 3.3 मीटर ऊपर पहुंचता है, तो पानी का नमकीन होना फसलों के उत्पादन और पैदावार को प्रभावित करती है।

पाकिस्तान की कृषि-जलवायु परिस्थिति

पाकिस्तान में पूरे साल जलवायु शुष्क और आर्द्र रहती है और उत्तरी पाकिस्तान के कुछ इलाकों में 700 मिलीमीटर से अधिक बारिश हो जाती है। बलूचिस्तान के अधिकांश हिस्सों और साहीवाल के दक्षिण में पंजाब के बड़े हिस्से और सिंध में सालाना 200 मिलीमीटर से कम बारिश होती है। उत्तरी साहीवाल में बारिश धीरे-धीरे बढ़ती है और शुष्कता कम होती जाती है। मगर आर्द्रता तब भी बनी रहती है जब मैदानी इलाकों में हर साल 1,000 मिलीमीटर और पहाड़ी इलाकों में सालाना 700 मिलीमीटर बारिश हो जाती है। पाकिस्तान में मॉनसून और पश्चिमी विक्षोभ ही वर्षा के दो मुख्य स्रोत हैं। पाकिस्तान में खरीफ सत्र के दौरान जुलाई से सितंबर तक मॉनसून की बारिश शुरू होती है।

जैसा कि नाम से ही पता चलता है पश्चिमी विक्षोभ ईरान और अफगानिस्तान होकर पाकिस्तान में प्रवेश करता है और रास्ते में इसकी नमी खत्म हो जाती है। इससे रबी सत्र के दौरान दिसंबर से मार्च तक पश्चिमी हिस्सों में थोड़ी बारिश होती है। मोटे तौर पर पाकिस्तान छह प्रमुख फसल क्षेत्र हैं, जिनमें कपास-गेहूं, मक्का-गेहूं, चावल-गेहूं, गन्ना-गेहूं, मोटे अनाज- गेहूं और मूंगफली-गेहूं शामिल हैं।

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First Published - May 13, 2025 | 9:03 AM IST

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