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Section 17A: सुप्रीम कोर्ट ने धारा 17ए की वैधता पर दिया बंटा हुआ फैसला; बड़ी पीठ को मामला सौंपा गया

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 17ए पर बंटा फैसला सुनाया; एक ने निरस्त, दूसरे ने स्वतंत्र प्राधिकरण के तहत लागू रखने का सुझाव दिया।

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भाविनी मिश्रा   
Last Updated- January 14, 2026 | 7:54 AM IST

उच्चतम न्यायालय के दो सदस्यीय पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की वैधता पर बंटा हुआ फैसला दिया। यह प्रावधान 2018 में जोड़ा गया था, जिसके तहत किसी लोक सेवक द्वारा आधिकारिक निर्णय से जुड़े कृत्यों के संबंध में जांच शुरू करने से पहले सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने इस प्रावधान को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि यह भ्रष्टाचार-रोधी कानून के मूल उद्देश्य को ही कमजोर करता है। जबकि न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करने से इनकार किया। लेकिन उन्होंने इसके दायरे को सीमित करते हुए निर्देश दिया कि जांच की अनुमति देने का निर्णय कार्यपालिका के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त जैसी किसी स्वतंत्र संस्था के पास होना चाहिए।

दोनों न्यायाधीशों के अलग-अलग मत होने के कारण मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष बड़े पीठ को सौंप दिया गया।  अपने निर्णय में न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि धारा 17ए ईमानदार प्रशासन की रक्षा के नाम पर गलत चीजों को संरक्षण देती है। उन्होंने कहा कि जांच शुरू करने से पहले पूर्व अनुमति की शर्त उन सुरक्षा प्रावधानों को पुन: सामने ले आती है, जिन्हें अदालत पहले ही अमान्य कर चुकी है। इस तरह यह भ्रष्टाचार-रोधी ढांचे के उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है।

दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने माना कि यदि इस प्रावधान को कार्यपालिका के नियंत्रण से अलग कर दिया जाए, तो इसे बनाए रखा जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि निराधार या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से प्रशासन को पंगु होने से बचाने के लिए किसी न किसी प्रकार की पूर्व जांच आवश्यक है, लेकिन यह जांच किसी स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा की जानी चाहिए।

First Published : January 14, 2026 | 7:54 AM IST