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Same Sex Marriage Verdict: सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार

पीठ ने कहा कि यह सोचना कि समलैंगिकता केवल शहरी इलाकों में मौजूद है, उन्हें मिटाने जैसा होगा तथा किसी भी जाति या वर्ग का व्यक्ति समलैंगिक हो सकता है।

Last Updated- October 17, 2023 | 11:16 PM IST
supreme court

उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों के पीठ ने मंगलवार को सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला देते हुए समलैंगिक विवाह को विशेष विवाह कानून के तहत कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि इस बारे में कानून बनाने का काम संसद का है। न्यायालय ने हालांकि, समलैंगिक लोगों के लिए समान अधिकारों और उनकी सुरक्षा को मान्यता दी और आम जनता को इस संबंध में संवेदनशील होने का आह्वान किया ताकि उन्हें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़े।

समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दिए जाने का अनुरोध करने संबंधी 21 याचिकाओं पर प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाले पीठ ने सुनवाई की। न्यायालय ने चार अलग-अलग फैसले सुनाते हुए सर्वसम्मति से कहा कि समलैंगिक जोड़े संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में इसका दावा नहीं कर सकते हैं। पीठ ने केंद्र के इस रुख की आलोचना की कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की याचिका शहरी अभिजात्य अवधारणा को प्रदर्शित करती है।

पीठ ने कहा कि यह सोचना कि समलैंगिकता केवल शहरी इलाकों में मौजूद है, उन्हें मिटाने जैसा होगा तथा किसी भी जाति या वर्ग का व्यक्ति समलैंगिक हो सकता है। उन्होंने कहा कि यह कहना ‘गलत है कि विवाह एक स्थिर और अपरिवर्तनीय संस्था है।’ पीठ में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के अलावा न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति हिमा कोहली भी शामिल थीं।

पीठ में कुछ पहलुओं पर मतभेद था, खासकर समलैंगिक जोड़ों के लिए गोद लेने के नियमों के संबंध में। हालांकि पीठ मुख्य मुद्दे पर एकमत थे कि अदालत विशेष विवाह कानून के तहत समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दे सकता है। पीठ ने कहा कि यह कार्य संसद को करना है। न्यायमूर्ति भट्ट, न्यायमूर्ति कोहली और न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने दो अलग-अलग फैसलों में कुछ कानूनी पहलुओं पर प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति कौल से अलग राय व्यक्त किए।

प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि गोद लेने के नियमों को अमान्य माना जाता है क्योंकि वे समलैंगिक लोगों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं और उन्हें गोद लेने के अधिकार से वंचित करते हैं। उनकी राय से असहमत न्यायमूर्ति भट्ट ने कहा कि समलैंगिक जोड़ों को गोद लेने की अनुमति नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि नियम अमान्य हैं। प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि न्यायालय कानून नहीं बना सकता, बल्कि उनकी केवल व्याख्या कर सकता है और विशेष विवाह अधिनियम में बदलाव करना संसद का काम है।

First Published - October 17, 2023 | 11:16 PM IST (बिजनेस स्टैंडर्ड के स्टाफ ने इस रिपोर्ट की हेडलाइन और फोटो ही बदली है, बाकी खबर एक साझा समाचार स्रोत से बिना किसी बदलाव के प्रकाशित हुई है।)

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