सहारा ग्रुप (Sahara Group) के प्रमुख सुब्रत रॉय (Subrata Roy) का मंगलवार को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे। सहारा ने मंगलवार देर रात एक बयान जारी कर यह जानकारी दी।
बता दें कि हाई ब्लड प्रेशर, शुगर और कैंसर समेत कई बीमारियों से लंबे समय से जूझ रहे सुब्रत रॉय (Subrata Roy Demise) का दिल का दौरा पड़ने के कारण रात साढ़े 10 बजे निधन हो गया।
कंपनी ने बताया कि उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद रविवार को उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। कंपनी ने बयान में कहा, ‘‘उनके निधन से हुई क्षति को पूरा सहारा इंडिया परिवार गहराई से महसूस करेगा।’’
ग्रुप ने कहा, “सहारा इंडिया परिवार (Sahara India) रॉय की विरासत को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और संगठन को आगे बढ़ाने में उनके दृष्टिकोण का सम्मान करना जारी रखेगा।”
सुब्रत रॉय का अंतिम संस्कार 16 नवंबर को लखनऊ में किए जाने की संभावना है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार यानी 15 नवंबर को उनके पार्थिव शरीर को लखनऊ लाया जाएगा, जहां उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी जाएगी।
सुब्रत रॉय ने रिटेल सेक्टर के साथ-साथ रियल एस्टेट और फाइनेंशियल सर्विस जैसे सेक्टर में एक विशाल कारोबारिक साम्राज्य खड़ा किया था। हालांकि, इन सबके बावजूद वह विवादों के केंद्र में भी रहे। उन्हें अपने ग्रुप की कंपनियों के संबंध में कई रेगुलेटरी और कानूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ा, जिन पर मल्टी लेवल मार्किटिंग योजनाएं बनाने के लिए नियमों को दरकिनार करने का आरोप लगा था।
सुब्रत रॉय का जन्म 10 जून 1948 को अररिया, बिहार में हुआ था। वह सहारा इंडिया परिवार के संस्थापक थे, जो एंबी वैली सिटी, सहारा मूवी स्टूडियो, एयर सहारा और फिल्मी जैसे बिजनेस ऑपरेट करता था। अपने परिवार के सबसे बड़े बेटे के रूप में, रॉय ने अपना डिप्लोमा पूरा किया और बाद में अपने पिता, सुधीर चंद्र की मृत्यु के बाद उन्हें काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उनकी यात्रा एक लैंब्रेटा स्कूटर से शुरू हुई, जहां वे “जया प्रोडक्ट्स” नामक उद्यम के तहत नमकीन स्नैक्स बेचते थे। हालांकि, उद्यम विफल रहा। उन्होंने अपनी पत्नी स्वप्ना रॉय के साथ एक और उद्यम भी शुरू किया, लेकिन उसका भी वही हश्र हुआ।
1978 में रॉय ने गोरखपुर में सहारा समूह की स्थापना की। उद्यम ने रिक्शा चालकों और चाय स्टाल मालिकों जैसे छोटे निवेशकों को पैसा निवेश करने और बदले में सुनिश्चित आय प्राप्त करने की अनुमति दी। इसका संचालन समूह की प्रमुख कंपनी सहारा इंडिया फाइनेंशियल द्वारा किया जाता था।
कंपनी ने लाखों भारतीयों को अपने एजेंटों के रूप में नियुक्त किया जो इन योजनाओं को उन भारतीयों को बेचते थे जिनकी देश में औपचारिक बैंकिंग प्रणाली तक पहुंच नहीं थी।
अगले तीन दशकों में, समूह ने रियल एस्टेट, मीडिया और विमानन सहित विभिन्न क्षेत्रों में अपनी धाक जमा ली थी। मगर 2000 के बाद सहारा का पतन होना शुरू हो गया।
कंपनी 1990 के दशक में कई वित्तीय परेशानियों में घिर गई थी, लेकिन बड़ी दिक्कत 2009 में आई जब इसकी शाखा सहारा प्राइम सिटी ने आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (IPO) के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास अपना ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दायर किया। मसौदे में वैकल्पिक रूप से पूर्ण परिवर्तनीय डिबेंचर (OFCD) से संबंधित कुछ कर संबंधी मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 2011 में सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (SIREL) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (SHICL) को वैकल्पिक रूप से पूर्ण परिवर्तनीय बॉन्ड (OFDC) के रूप में पहचाने जाने वाले कुछ बॉन्डों के जरिए करीब तीन करोड़ निवेशकों से जुटाए गए धन को वापस करने का आदेश दिया था।
नियामक ने आदेश में कहा था कि दोनों कंपनियों ने उसके नियमों और विनियमों का उल्लंघन करके धन जुटाया था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने 31 अगस्त 2012 को सेबी के निर्देशों को बरकरार रखा और दोनों कंपनियों को निवेशकों से एकत्र धन 15 प्रतिशत ब्याज के साथ वापस करने को कहा था।
(भाषा के इनपुट के साथ)