भारत के ऊर्जा क्षेत्र के इतिहास में वर्ष 2025 ‘चुनौतियों और उम्मीदों’ के मिले-जुले साल के रूप में याद किया जाएगा। यह मिला-जुला रुझान हैरान करने वाली समानताओं के साथ देश के ऊर्जा क्षेत्र के सभी प्रमुख खंडों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, तेल आयात और जलवायु परिवर्तन में दिखा। यह रुझान स्वच्छ ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने की कोशिशों पर असर छोड़ने के साथ देश की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा और ताकत दोनों के लिए बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
सौर ऊर्जा इसका एक ठोस उदाहरण है जिसकी सफलता का हवाला देते नीति निर्माता और उद्योग जगत की हस्तियां अक्सर थकते नहीं हैं। सौर ऊर्जा उत्पादन जिस तेज गति से आगे बढ़ा है उसकी बराबरी देश के ऊर्जा क्षेत्र के इतिहास में कोई भी ऊर्जा उत्पादन तकनीक नहीं कर पाई है। सौर ऊर्जा खंड की सफलता का श्रेय प्रौद्योगिकी नवाचार और नीतिगत स्तर पर हुई पहल को दिया जा सकता है। आंकड़ों पर सरसरी निगाह डालने से पहली नजर में ही पता चल जाता है कि सौर ऊर्जा उत्पादन कितनी तेजी से नई बुलंदियों को छूता रहा है।
देश में सालाना सौर ऊर्जा क्षमता में प्रभावशाली वृद्धि हुई है जो वर्ष2020-21 में दर्ज 5.6 गीगावॉट से बढ़कर 2021-22 में 12.7 गीगावॉट, 2022-23 में 12.7 गीगावॉट, 2023-24 में 15.0 गीगावॉट और 2024-25 में बढ़कर 23.8 गीगावॉट तक पहुंच गई। चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों (अप्रैल- नवंबर) में ही 27.2 गीगावॉट क्षमता जुड़ चुकी है।
अब चुनौतियों की बात कर लेते हैं। व्यापक आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष आवंटित समग्र नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता (जिसमें सौर ऊर्जा का अहम हिस्सा है) पिछले वित्त वर्ष में दर्ज लगभग 40 गीगावॉट से घटकर केवल 5.8 गीगावॉट रह गई है। इसका कारण बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) द्वारा बिजली खरीद समझौतों पर हस्ताक्षर में देरी है। चूंकि, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के शुरू होने में आम तौर पर लगभग 2-3 वर्ष लग जाते हैं, इसलिए निविदा आवंटित करने के मोर्चे पर दिख रही सुस्ती का असर 2028 में दिखाई देगा। हालांकि, उम्मीदें बरकरार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सौर ऊर्जा को खारिज करना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
लेखा एवं सलाहकार कंपनी डेलॉयट में पार्टनर अनुजेश द्विवेदी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘भारत में सौर क्षमता वृद्धि अपने चरम स्तर पर नहीं पहुंची है। इसकी क्षमता में लगातार इजाफा हो रहा है। देश ने पिछले वित्त वर्ष में 29.5 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी जिसमें सौर ऊर्जा का मुख्य योगदान रहा। भारत में इस साल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि ताप या कोयला संयंत्रों के दौर में दिखी सालाना उच्चतम स्तर से पहले ही आगे निकल चुकी है।’
लेखा एवं सलाहकार कंपनी डेलॉयट में पार्टनर अनुजेश द्विवेदी ने कहा कि इस वर्ष सौर निविदाओं में दिखी सुस्ती के दो प्रमुख कारण रहे हैं। पहला कारण यह है कि शुरू में आई निविदाएं साधारण थीं जिनमें अब दिलचस्पी बहुत अधिक नहीं रह गई है। दूसरा कारण यह है कि पारेषण निकासी के स्तर पर से बाधाएं आई हैं। द्विवेदी ने कहा,‘इसके अलावा डिस्कॉम को इस साल मांग में अधिक वृद्धि नहीं दिखी क्योंकि मॉनसून लंबा और बेहतर रहा। यही कारण है कि इस साल बिजली की कमी नहीं है। इससे पीपीए पर हस्ताक्षर करने की जल्दबाजी भी नहीं महसूस की गई।’
कुल मिलाकर, विशेषज्ञों का अब मानना है कि जब पारेषण की राह में बाधाएं दूर कर ली जाएंगी और कुछ लंबित पीपीए पर हस्ताक्षर हो जाएंगे तो निविदा गतिविधियां और क्षमता निर्माण कुछ महीनों में फिर शुरू हो जाएंगे। उनकी नजर में मौजूदा मंदी अस्थायी है।
साल 2025 कच्चे तेल के आयात की राह में आईं दिक्कतों के लिए भी याद किया जाएगा। तेल भारत में ऊर्जा सुरक्षा की राह में एक दुखती रग है। यह बात खासा परेशान करने वाली है कि देश अपनी लगभग 90 फीसदी तेल आवश्यकता पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर है। अगस्त में अमेरिकी प्रशासन ने रूस-यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा देने का आरोप लगाकर भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए 25फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगा दिया। इसके अलावा, अमेरिका ने रूस की दो सरकारी ऊर्जा कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकऑयल पर प्रतिबंध लगा दिए जिससे रूस से 60 फीसदी तक तेल आयात थम गया। ऐसी आशंकाएं खड़ी हो गईं कि 21 नवंबर से लागू हुए ये प्रतिबंध भारत के तेल आयात की मात्रा और उसके मूल्य पर असर डाल सकते हैं।
भारत ने 2020-21 में अपने कच्चे तेल के कुल आयात का मुश्किल से 2फीसदी हिस्सा रूस से आयात किया था मगर पिछले वित्त वर्ष में यह बढ़कर 35 फीसदी हो गया। इस तरह, रूस वर्ष 2024-25 में 50 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार मूल्य के साथ भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया। रूस से कच्चे तेल के कुल निर्यात में एशिया की लगभग 95 फीसदी हिस्सेदारी है। चीन शीर्ष खरीदार है और भारत दूसरे स्थान पर है। मगर तब से कई ऐसे बातें सामने आई हैं जिनसे भारत की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
यह सच है कि रूस से तेल आयात अब पहले की तरह नहीं हो रहा है मगर यह भी उतना ही सच है कि आपूर्ति या मूल्य के स्तर पर झटकों को लेकर जताई गई आशंका भी सच नहीं हुई हैं। भारतीय तेल शोधक कंपनियों (रिफाइनरी) ने अमेरिकी प्रतिबंध की जद से बाहर रूसी कंपनियों से आकर्षक दाम पर तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने का मौका हाथ ने नहीं जाने दिया है।
इसके साथ ही भारतीय रिफाइनरी कंनपियों ने पश्चिम एशियाई देशों में भी संभावनाएं तलाशी हैं। ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए मुसीबत बन सकती थी क्योंकि तेल आयात में बाधा उत्पन्न होने से देश में ईंधन की कीमतें बढ़ जातीं मगर कम से कम फिलहाल तो यह झटका टल गया है।
साल 2025 में ऊर्जा के मोर्चे पर एक और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा जिसका असर न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर देने की क्षमता रखता है। ब्राजील के बेलेम में 194 देशों का कॉप30 सम्मेलन आयोजित हुआ था जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन और इसके प्रतिकूल असर से निपटने के विषय पर चर्चा करना था। संघर्ष, बढ़ते कर्ज, व्यापारिक झटकों और आर्थिक परेशानियों के बीच और पेरिस समझौते से अमेरिका के हटने के बीच यह सम्मेलन हुआ। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्यक्रम के लिए अपना आधिकारिक प्रतिनिधित्व नहीं भेजने का निर्णय लिया।
माना जाता है कि अमेरिका से आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल नहीं जाने से जलवायु परिवर्तन के लिए धन जुटाने पर बातचीत जटिल हो गई है जिससे विकासशील देशों के लिए अपने ऊर्जा परिवर्तन का प्रबंधन करने के लिए रकम का प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है। सम्मेलन के बाद जारी बयान में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए किसी औपचारिक समझौते का जिक्र नहीं था।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है और प्रगति की उम्मीद कायम है, भले ही जलवायु पर चर्चा जलवायु वास्तविकता से अलग-थलग पड़ने और पहले से चले आ रहे घटनाक्रम से प्रभावित होने का खतरा भी मौजूद है।
दिल्ली स्थित विचार संस्था ऊर्जा पर्यावरण एवं जल परिषद (सीईईडब्ल्यू) के मुख्य कार्याधिकारी एवं कॉप30 अध्यक्षता के दक्षिण एशिया जलवायु दूत अरुणाभ घोष कहते हैं, ‘ब्राजील में कॉप30 में वास्तविक दुनिया आखिरकार एक साथ एक कमरे में जमा हुई। जलवायु में विभिन्न देशों की भागीदारी को चुनौती मिलने वाले साल में सबसे अच्छा सौदा करने के प्रयास में कोई भी समझौता करने में विफल रहने की तुलना में एक अच्छा सौदा हासिल करना बेहतर था। सच्चाई यह है कि दुनिया केवल हां या ना इन दो विकल्पों के बीच नहीं घूमती है। वास्तविक बदलाव जटिल और कठिन विकासात्मक विकल्पों के बीच होते हैं।’
उन्होंने कहा कि कॉप 30 सम्मेलन में कई अहम बातें सामने आईं जिनमें आखिरकार अनुकूलन वित्त को कम से कम तिगुना करने का आह्वान (भले ही 2035 तक), एक न्यायसंगत बदलाव के लिए विविध राष्ट्रीय योजनाओं को मान्यता देना, जलवायु वित्त पर दो साल का कार्य कार्यक्रम स्थापित करने का निर्णय आदि प्रमुख रहे। इनके अलावा, यह भी ध्यान रखने की कोशिश हुई है कि जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए उठाए गए कदम (जिनमें एकतरफा कदम भी शामिल) मनमाना या अनुचित भेदभाव का जरिया न बनें।
अंत में, अगले साल एक उच्च-स्तरीय संवाद सहित एक वैश्विक कार्यान्वयन त्वरक (ग्लोबल इम्प्लीमेंटेशन एक्सलरेटर) शुरू करने का निर्णय भी अहम रहा।