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HAL बनाएगा नया R&D मैन्युअल, एरोस्पेस तकनीक में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

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नई आरऐंडडी मैन्युअल के लागू होने से एचएएल की अनुसंधान गति और तकनीकी क्षमता को वैश्विक एरोस्पेस मानकों के अनुरूप बढ़ाए जाने की उम्मीद की जा रही है

Last Updated- November 09, 2025 | 9:41 PM IST
R&D
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

राजस्व, ऑर्डर बुक और बाजार पूंजीकरण के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी सरकारी रक्षा कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) नई अनुसंधान एवं विकास (आरऐंडडी) मैन्युअल जारी करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही वह सैन्य एरोस्पेस प्रणालियों को डिजाइन और तकनीक संपन्न बनाने की अपनी क्षमता में बढ़ोतरी कर लेगी। एचएएल को वैश्विक एरोस्पेस मानकों के अनुरूप बनाने के लिए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह नई मैन्युअल का औपचारिक रूप से सोमवार को अनावरण करेंगे।

नाम नहीं जाहिर करने पर कंपनी के सूत्रों ने कहा कि एचएएल फिलहाल आरऐंडी पर सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये खर्च करती है। इसके मुकाबले एरोस्पेस क्षेत्र की वैश्विक कंपनियां आमतौर पर अपने राजस्व का 7 से 8 फीसदी निवेश करती हैं। उन्होंने बताया कि आने वाले वर्षों में इसे 10 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है, जो प्राप्त परियोजनाओं की संख्या पर निर्भर करेगा। एचएएल के बोर्ड ने अगले कुछ वर्षों में कई कार्यक्रमों में आरऐंडडी निवेश के लिए आंतरिक संसाधनों से करीब 17,000 करोड़ रुपये रखे हैं।

एक सूत्र ने कहा, ‘एचएएल ने पहले ही जरूरी कदम उठा लिए हैं और मैन्युअल पेश होने के तुरंत बाद उसके निर्देशों को पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा।’ उन्होंने समझाया कि यह मैन्युअल रक्षा उत्पादन विभाग (डीडीपी) की पहल पर की गई कवायद का नतीजा है, जिसने एचएएल की मौजूदा पद्धतियों को वैश्विक एरोस्पेस मानकों के आधार पर परखा है।

नए मैन्युअल का उद्देश्य अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में एचएएल के लचीलेपन और गति में सुधार लाना है। साथ ही अधिक प्रभावी जोखिम मूल्यांकन और बजट आवंटन को सक्षम बनाना है। एक सूत्र ने कहा, ‘इस मैन्युअल से प्रक्रिया मानकीकरण और अनुसंधान गतिविधियों के अनुकूल करने में मदद मिलनी की उम्मीद है।’ उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इसके लागू होने से निश्चित रूप से एचएएल को फायदा होगा।

नया मैन्युअल ऐसे समय आ रहा है जब सरकारी रक्षा उपक्रम अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ा रहा है। वह अपने प्लेटफॉर्म के विकास को उस समय भी तवज्जो दे रहा है जब माना जा रहा है कि लड़ाकू विमान विनिर्माण में इसके एकाधिकार को चुनौती मिल सकती है और सरकार भी सरकारी उपक्रमों और निजी फर्मों के बीच बराबरी के अवसरों के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास कर रही है।

एचएएल को एचएफ-24 मारुत के बाद से किसी भी प्रमुख लड़ाकू विमान के डिजाइन और विकास परियोजना का काम नहीं सौंपा गया है। एचएफ मारुत ने 1961 में अपनी पहली उड़ान भरी थी। 1984 में स्वदेशी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस परियोजना का प्रबंधन करने के लिए गठित, एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) अब सभी भारतीय मानवयुक्त लड़ाकू विमान कार्यक्रमों के डिजाइन और विकास का नेतृत्व संभालती है, जिसमें तेजस मार्क-1ए (एमके1ए), मार्क-2 (एमके2), एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) और प्रस्तावित जहाज-आधारित नौसैनिक लड़ाकू विमान शामिल हैं।

एचएएल तेजस परिवार के जेट विमानों के निर्माण के लिए जिम्मेदार है और एएमसीए प्रोटोटाइप के निर्माण की पात्रता के लिए निजी क्षेत्र के कई प्रतिद्वंद्वियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है। तेजस एमके1ए की आपूर्ति में देरी के कारण भारतीय वायुसेना (आईएएफ) ने भी एचएएल की आलोचना की है।

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First Published - November 9, 2025 | 9:41 PM IST

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