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संपूर्ण बीमा कवर या कम प्रीमियम में क्या बेहतर?

Last Updated- December 12, 2022 | 3:28 AM IST

मोहाली के रहने वाले नितिन गुप्ता (नाम बदला हुआ) के पिता की उम्र 75 साल और मां की उम्र 71 साल है। कोविड महामारी की पहली लहर के बाद उन्होंने दोनों के लिए बीमा खरीदने का फैसला किया। नितिन कहते हैं, ‘बीमा पॉलिसी खरीदने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि बुजुर्गों के लिए अगर आप बीमा की रकम ज्यादा रखना चाहते हैं तो प्रीमियम बहुत बढ़ जाता है।’
फैसला लेने में दिक्कत इसलिए भी आती है क्योंकि अलग-अलग बीमा कंपनियों की पॉलिसी में फीचर अलग-अलग होते हैं। वह कहते हैं, ‘यह पता करना मुश्किल होता है कि कौन सा फीचर जरूरी है और कौन सा केवल दिखावे के लिए है।’

क्या करें खरीदार
सबसे पहले पता करें कि बुजुर्ग व्यक्ति को पहले से कोई बीमारी (पीईडी) तो नहीं है। पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के प्रमुख (स्वास्थ्य कारोबार) अमित छाबड़ा कहते हैं, ‘जिन्हें गंभीर किस्म की बीमारी है या जिनकी हालत गंभीर है, उन्हें बीमा देने से कंपनी मना कर सकती है।’ लेकिन जिनकी स्थिति गंभीर नहीं है, उन्हें बीमा मिल सकता है।
कई बार आपको ऐसी पॉलिसी देने की बात कही जा सकती है, जिसमें पीईडी यानी पहले से मौजूद बीमारी को एक खास प्रतीक्षा अवधि के बाद ही बीमा के दायरे में शामिल किया जाता है। रीन्यूबाई डॉट कॉम के सह संस्थापक और प्रिसिपल ऑफिसर इंद्रनील चटर्जी की सलाह है, ‘यदि आपकी उम्र 70 साल हो गई है तो आपको विचार करना चाहिए कि चार साल की प्रतीक्षा अवधि वाली पॉलिसी लेना आपके लिए सही होगा या नहीं।’
इसके बाद तय कीजिए कि आप कितना प्रीमियम चुकाने के लिए तैयार हैं। छाबड़ा बताते हैं, ‘कुछ पॉलिसियों में संपूर्ण या व्यापक कवरेज होता है और कुछ पॉलिसी में कई प्रकार की बंदिशें होती हैं। व्यापक कवरेज वाली पॉलिसी का प्रीमियम ज्यादा होता है।’
खरीदार को यह भी तय करना होता है कि वह किस प्रकार की अंडरराइटिंग यानी जोखिम के आकलन के लिए तैयार है – अस्पताल में स्वास्थ्य जांच, टेली अंडरराइटिंग, पुराने कागजात के आधार पर अंडरराइटिंग या किसी भी प्रकार की अंडरराइटिंग नहीं। इनमें से जो भी विकल्प चुना जाएगा, उसी से तय होगा कि कितनी बीमा कंपनियों से पॉलिसी मिल सकती है।

कितना को-पेमेंट सही
बुजुर्गों की बीमा पॉलिसी में अहम पैमाना यह भी होता है कि आप कितना को-पेमेंट करने के लिए तैयार हैं। को-पेमेंट वह रकम होती है, जो इलाज के लिए बीमा ग्राहक को अपनी जेब से भरनी होती है और इसे फीसदी में तय किया जाता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि अस्पताल का बिल 5 लाख रुपये है और 20 फीसदी को-पेमेंट की शर्त है। अब बीमा कंपनी सबसे पहले कंज्यूमेबल सामग्री को बिल में से हटा देगी क्योंकि वह ग्राहक को ही अपनी जेब से भरनी पड़ती है। मान लेते हैं कि उसकी कीमत 50,000 रुपये थी तो बिल घटकर 4.5 लाख रुपये रह जाता है। ग्राहक को इसका 20 फीसदी हिस्सा यानी 90,000 रुपये अपनी जेब से चुकाने पड़ेंगे। इस तरह बीमा कंपनी केवल 3.60 लाख रुपये देती है, जबकि बीमा लेने वाले को पूरे 1.40 लाख रुपये अपनी जेब से देने पड़ते हैं।
को-पेमेंट में यही होता है। को-पेमेंट ज्यादा रखने पर कंपनी आपका प्रीमियम तो कम कर देती है मगर इसमें आपको दावा करते वक्त अपनी जेब से ज्यादा रकम भरनी पड़ती है। को-पेमेंट के बजाय डिडक्टिबल की शर्त वाली बीमा पॉलिसी बेहतर हो सकती हैं। इसमें एक तय रकम (कई बार बीमा राशि का कुछ फीसदी हिस्सा) चुकानी होती है। अगर आपकी पॉलिसी में 50,000 रुपये डिडक्टिबल की शर्त है तो बिल में से 50,000 रुपये बीमा खरीदने वाला चुकाएगा और बाकी पूरी रकम बीमा कंपनी को चुकानी पड़ेगी।
अस्पताल के कमरे के किराये की सीमा भी अहम बात होती है। हो सकता है कि बीमा कंपनी एक रात के लिए कमरे का किराया बीमा राशि के 1 फीसदी के बराबर ही रखे। ऐसे में 10 लाख रुपये बीमा राशि होने पर ग्राहक 1 रात के लिए अधिकतम 10,000 रुपये किराये वाला कमरा ही ले सकता है। पॉलिसी में कमरे के किराये की अधिकतम सीमा कम रखी जाए तो प्रीमियम भी कम हो जाता है मगर यह समझदारी नहीं होगी। प्रीमियम बेशक ज्यादा हो मगर अधिकतम किराये की अधिक सीमा वाली पॉलिसी ही लें।
अंत में पहले से मौजूद बीमारियों के लिए प्रतीक्षा अवधि पर नजर डालनी चाहिए। पॉलिसी में प्रतीक्षा अवधि जितनी कम हो उतना ही अच्छा होगा। इन सभी पहलुओं पर विचार कर तय करें कि आपके लिए कितने प्रीमियम वाला बीमा सही होगा।

क्या करें आप
ऐसी पॉलिसी खरीदना सही होगा, जिसमें अधिक व्यापक कवरेज मिल रहा हो। व्यापक कवरेज वाली यानी कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी और सीमित कवरेज यानी बंदिशों वाली पॉलिसी के प्रीमियम में कुछ हजार रुपये का ही फर्क होगा। मगर दावा करते समय आपको अपनी जेब से जो रकम अपनी जेब से चुकानी पड़ती है (यदि आपने अधिक को-पे वाली पॉलिसी चुनी है) तो आपको लाखों रुपये की चपत लग सकती है।
यदि आप को-पेमेंट और डिडक्टिबल में से सही विकल्प नहीं चुन पा रहे हैं तो छाबड़ा की सलाह सुन सकते हैं। वह कहते हैं, ‘अगर दावा राशि यानी अस्पताल का बिल बड़ा होना तय है तो डिडक्टिबल ही चुनना सही रहेगा।’ यदि डिडक्टिबल एक तय राशि है तो आपकी देनदारी भी सीमित हो जाएगी। यदि आपने को-पे का विकल्प चुना है तो बिल की राशि बढऩे के साथ ही आपकी जेब से निकलने वाली रकम भी बढ़ती जाएगी।
मैक्स बूपा हेल्थ इंश्योरेंस की हाल ही में आई सीनियर फस्र्ट पॉलिसी समेत कई बीमा पॉलिसी में टेलीफोन पर ही अंडरराइटिंग की सुविधा मिल रही है। अगर आपको दावा खारिज होने के जोखिम से बचना है तो पॉलिसी खरीदते समय एकदम ईमानदारी से बता दें कि अतीत में आपको कौन सी बीमारी हो चुकी हैं, कितनी दुर्घटना हो चुकी हैं और कितनी बार आपका ऑपरेशन हो चुका है। साथ ही यह भी बताएं कि अभी आपको कोई बीमारी या स्वास्थ्य समस्या तो नहीं है।

First Published - June 20, 2021 | 11:50 PM IST

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