भले ही सरकार अमेरिका से व्यापार वार्ता में हालिया दोस्ती पर जश्न मना रही है लेकिन अभी ऊर्जा के मोर्चे पर किसी भी महत्त्वपूर्ण व तत्काल लाभ का दावा करना जल्दबाजी है। वर्तमान समय में भारत अमेरिका से कच्चे तेल, एलएनजी, एलपीजी और कोकिंग कोल का 12 अरब डॉलर से अधिक का सालाना आयात करता है।
माल ढुलाई की उच्च लागत, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रिफाइनरी संरचनाओं से उत्पन्न तकनीकी सीमाएं और रूस के अधिक गाढ़े व सल्फर वाले कच्चे तेल यूराल से अमेरिकी तेल ग्रेड में बदलाव की भू-राजनीतिक जटिलताएं हैं। ये सभी कारक भारत के लिए अमेरिका से ऊर्जा आयात में तेजी से वृद्धि करने में बाधा बनेंगे।
नॉर्वे स्थित ऊर्जा अनुसंधान व खुफिया फर्म रायस्टैड एनर्जी के कमोडिटी मार्केट्स ऑयल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पंकज श्रीवास्तव ने कहा, ‘रूस द्वारा भारत को दी जा रही मौजूदा छूट को ध्यान में रखते हुए प्रति बैरल अनुमानित अतिरिक्त लागत 12-15 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास होगी। अन्य महत्त्वपूर्ण कारक लंबी समुद्री यात्रा का समय है, जो पहले के 25-30 दिनों की तुलना में अब 32 से 40 दिन तक है।’
वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) पर मिलने वाली छूट भविष्य में भारत को आपूर्ति बढ़ाने का प्रमुख कारक होगी, लेकिन कच्चे तेल की गुणवत्ता व यील्ड में महत्त्वपूर्ण अंतर के कारण रूसी यूराल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई को सीधे तौर पर एक-दूसरे का विकल्प नहीं माना जा सकता है।
उन्होंने कहा, ‘अमेरिका के कच्चे तेल (डब्ल्यूटीआई) और रूस के कच्चे तेल (यूराल) के गुणों में महत्त्वपूर्ण अंतर को देखते हुए परस्पर बदलाव संभव नहीं है।’ भारत अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान और विमान के पुर्जे, कीमती धातुएं, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोयला खरीदने का इरादा रखता है।
बयान में ऊर्जा क्षेत्र में व्यापार को मिलने वाली संभावित वृद्धि के बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी गई। अमेरिकी कच्चे तेल की नए सिरे से खरीद की अतिरिक्त लागत पर टिप्पणी करने के लिए पूछे जाने पर वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि विदेश मंत्रालय इस संबंध में विस्तृत जानकारी देगा। हालांकि श्रीवास्तव ने यह कहा कि रूस की जगह अमेरिका के पारंपरिक कच्चे तेल को खरीदने पर भारत की रिफाइनरियों की करीब 25 प्रतिशत क्षमता कम होगी।