भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के बाहरी सदस्य सौगत भट्टाचार्य ने मनोजित साहा के साथ साक्षात्कार में महंगाई के मोर्चे पर उभरते कई जोखिमों के बारे में आगाह किया। हालांकि अभी अत्यधिक वृद्धि के कोई संकेत नहीं हैं। प्रमुख अंश :
कई जोखिम उभरते प्रतीत हो रहे हैं। अल नीनो की स्थिति बनने के शुरुआती आकलन हैं। महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकी में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और निजी निवेश के बाद धातुओं के दाम में तेजी से उछाल आई है। उच्च रक्षा व्यय, आपूर्ति श्रृंखला पुनर्गठन व अन्य रणनीतिक आवश्यकताओं के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं। वैश्विक वृद्धि की संभावनाएं बेहतर हुई हैं। इससे मांग बढ़ेगी। भारत में अर्थव्यवस्था में अत्यधिक दबाव के कोई संकेत नहीं हैं, पर वैश्विक कीमतों के संभावित प्रभावों पर नजर रखना आवश्यक है।
संभावना है कि वृद्धि होगी लेकिन यह मौद्रिक नीति समिति के प्रस्ताव में किए गए पूर्वानुमानों के अनुरूप ही होगी जो पिछली श्रृंखला पर आधारित थे। वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की औसत महंगाई 4 प्रतिशत के लक्ष्य के करीब रहने की संभावना है।
मैं नीतिगत रेपो दर निर्धारण के बॉन्ड बाजारों पर पड़ने वाले प्रभावों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि बाजार की ब्याज दर संरचना (यील्ड कर्व) कई कारकों से प्रभावित होती है जैसे राजकोषीय दबाव, बाहरी परिस्थितियों के संकेत – विशेष रूप से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड – फॉरवर्ड कर्व के माध्यम से व्यक्त होते हैं, ब्याज दर चक्र का अनुमानित चरण और अन्य।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमेरिकी प्रशासन की प्रतिक्रिया धीरे-धीरे सामने आ रही है, जो कई व्यापार कानूनों के तहत क्षतिपूर्ति शुल्क लगाने के लिए उपलब्ध कई विकल्पों का मूल्यांकन कर रही है। कई देश अंतिम स्वरूप व अमेरिका के साथ अपने विशिष्ट व्यापार और शुल्क समझौतों पर अपने पत्ते समय आने पर खोलेंगे।